आजादी के बाद से फसलों के एमएसपी (MSP) यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून बनाने की मांग हो रही है. सत्ता में नहीं रहने वाले दल किसानों से इस बात का वादा करते रहे हैं कि उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलाया जाएगा. पर एमएसपी पर कानून कभी नहीं बन सका. हालांकि कुछ राज्यों ने आधे-अधूरे तरीकों से एमएसपी पर कानून जरूर बनाया पर उसकी सफलता संदिग्ध ही रही. अगर ये कहा जाए कि ये समस्या कृषि या आर्थिक नहीं है बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक है तो गलत नहीं होगा. जिस तरह 2024 के लोकसभा चुनावों से ऐन पहले एक बार फिर देश की राजधानी को बंधक बनाने की कोशिश की जा रही है और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ट्वीट करके कह रहे हैं कि अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो वो 15 करोड़ किसान परिवारों को एमएसपी की कानूनन गांरटी देंगे. राहुल गांधी के इस बयान के बाद यह तय हो गया है कि यह मामला राजनीति में पूरी तरह गुंथ चुका है.
1-एमएसपी की मांग पूरी तरह राजनीतिक है
लोकसभा चुनावों को नजदीक देखते हुए जिस तरह किसान संगठन सक्रिय हुए हैं और उन्हें खुलकर विपक्ष का सपोर्ट मिल रहा है उससे यह आंदोलन क्या राजनीतिक नहीं हो गया है? मंगलवार को आज राहुल गांधी ने किसान आंदोलन को सपोर्ट करते हुए सोशल मीडिया एक्स पर लिखा है कि 'किसान भाइयों आज ऐतिहासिक दिन है! कांग्रेस ने हर किसान को फसल पर स्वामीनाथन कमीशन के अनुसार MSP की कानूनी गारंटी देने का फैसला लिया है. यह कदम 15 करोड़ किसान परिवारों की समृद्धि सुनिश्चित कर उनका जीवन बदल देगा.न्याय के पथ पर यह कांग्रेस की पहली गारंटी है.'
अब देखिए चुनाव के मौके पर राहुल गांधी को किसानों का दर्द याद आ गया है. विधानसभा चुनाव के मौके पर भी राजस्थान के घोषणा पत्र में किसानों से वादा किया गया कि कांग्रेस सरकार बनने पर राजस्थान के लोगों को एमएसपी की गारंटी दी जाएगी. सवाल यह है कि अशोक गहलोत जब 5 साल मुख्यमंत्री थे तो उनको ये बात क्यों नहीं याद आई? राहुल गांधी को चाहिए कि कर्नाटक और हिमाचल में एमएसपी की गारंटी कानून लाकर बीजेपी को आइना दिखाते.
2-सालाना 10 लाख करोड़ वहन कर सकती है सरकार?
देश के आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि एमएसपी लागू करने का मतलब सरकार का दिवाला निकलना हो सकता है.वित्त वर्ष 2020 में कृषि उपज का कुल मूल्य 40 लाख करोड़ रुपये था. इसमें डेयरी, खेती, बागवानी, पशुधन और एमएसपी फसलों के उत्पाद शामिल हैं.पर 24 फसलें जो एमएसपी के दायरे में शामिल हैं उनका कुल कृषि उपज का बाजार उसी वित्त वर्ष में मूल्य 10 लाख करोड़ रुपये था. पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान इस तरह का माहौल बनाया गया कि एमएसपी भारत के कृषि कार्यों का अभिन्न अंग है. जबकि सच्चाई से बहुत दूर है. वित्त वर्ष 2020 के लिए कुल एमएसपी खरीद रु. 2.5 लाख करोड़, यानी कुल कृषि उपज का 6.25 प्रतिशत थी और एमएसपी के तहत उपज का लगभग 25 प्रतिशत थी. सवाल यह उठता है कि यदि एमएसपी गारंटी कानून सरकार ले कर आए तो क्या होगा? सरकार की नजर अतिरिक्त व्यय पर भी होगी जो सालाना यानी हर साल कम से कम 10 लाख करोड़ का होगा.
इसे दूसरी तरह से देखा जाए तो यह लगभग उस व्यय (11.11 लाख करोड़ रुपये) के बराबर है जो इस सरकार ने हाल के अंतरिम बजट में बुनियादी ढांचे के लिए अलग रखा है. हालांकि इसके खिलाफ दो तर्क दिए जाते हैं. पहला कि इसमें सरकार खरीदने का खर्च, भंडाररण , ट्रांसपोर्टेशन का खर्च तो बताती है पर इसे बेचकर मिलने वाली आय को नहीं बताती.इसी तरह दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि कार्पोरेट जगत का लाखों करोड़ सरकार माफ करती है तो फिर किसानों का क्यों नहीं.दरअसल एमएसपी के पक्ष में दिए जाने वाले दोनों तर्कों का आधार नहीं है. पहली बात सरकार का काम अनाज का व्यापार करना नहीं है. दूसरे कॉर्पोरेट जगत का सर्वाइवल भी जरूरी है. कॉर्पोरेट देश में लाखों लोगों को नौकरियां मुहैय्या कराता है जिसके चलते प्रॉडक्शन की चेन चलती है. अगर इस चेन पर संकट हुआ तो किसानों का भी नुकसान होगा. क्योंकि एक आर्थिक चेन के जरिए सभी जुड़े हुए हैं.
3- केवल 6 परसेंट किसान ही क्यों लाभ उठाएं
शरद पवार जब कृषि मंत्री थे उन्होंने सदन में कहा था कि 71 फीसदी लोगों को पता ही नहीं कि एमएसपी क्या है . पवार की बात पंजाब और हरियाणा या पश्चिमी यूपी के किसानों को हास्यास्पद लग सकती है पर पूर्वी यूपी में रहने वाले लोग सही में एमएसपी के बारे में कुछ साल पहले तक नहीं जानते रहे हैं. दरअसल एमएसपी का असली फायदा पंजाब और हरियाणा के किसान ही उठाते रहे हैं.नीति आयोग की जनवरी 2016 की एक रिपोर्ट कहती है कि महज़ छह फीसदी किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है.
पंजाब और हरियाणा की फसल की बिक्री एमएसपी पर सबसे ज्यादा इसलिए भी हो पाती है क्योंकि इन राज्यों की मंडी व्यवस्था दुरुस्त है. पंजाब में हर 5-6 किलोमीटर की दूरी पर कोई न कोई मंडी मिल जाएगी. यही हाल हरियाणा में भी है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में करीब 1,850 ख़रीद केंद्र, 152 बड़ी मंडियां (अनाज मंडी) और 28,000 के आसपास रजिस्टर्ड आढ़ती हैं. यूपी में जिस तरह एमएसपी के बारे में लोग नहीं जानते उसी तरह आढ़तियों के बारे में कम ही लोगों को पता है. इसलिए जरूरी यह है कि एमएसपी पर गारंटी देने के पहले देश भर में मंडी व्यवस्था को पहले दुरुस्त किया जाए. नहीं तो एमएसपी का सारा फायदा मुट्ठी भर किसान ही उठाते रहेंगे.
4-कई बार एमएसपी से अधिक कीमतें बाजार में मिलती हैं
किसान तक में छपी खबर के अनुसार पिछले साल तुअर और उड़द सहित 5 खरीफ फसलों का मंडी भाव MSP से भी है ज्यादा रहा. देश की 11 प्रमुख खरीफ फसलों में से 5 का मंडी भाव उनके एमएसपी से भी अधिक है. सोयाबीन और मूंगफली का मंडी भाव बेंचमार्क दरों के बराबर है. वहीं, मूंग,मक्का, रागी और बाजरा ऐसी खरीफ फसल हैं, जो बेंचमार्क दरों से नीचे का कारोबार कर रही हैं.
पिछले साल ज्वार, तुअर, कपास, उड़द और धान (गैर-बासमती) की अखिल भारतीय औसत कीमतें उनके एमएसपी से 5 से 38 प्रतिशत तक अधिक थीं .पर राजस्थान में मूंग की कीमतें एमएसपी से नीचे थी. इसी तरह कर्नाटक में मक्के की कीमतें एमएसपी से अधिक थीं, लेकिन पूरे भारत में वे कम दिख रही थीं. जो अन्य राज्यों में कम गुणवत्ता के कारण हो सकता है. दरअसल कीमतों का यह उतार-चढ़ाव ही एमएसपी पर गारंटी के लिए सबसे बड़े बाधक के रूप में सामने आता है. कई तरह की जटिलताओं के चलते सामर्थ्यवान लोगों के लिए एमएसपी बहुत फायदे का सौदा हो जाएगा . गरीब किसानों रोता ही रह जाएगा.
5-फल और सब्जियों उगाने वालों को सरकार एमएसपी से क्यों करेगी इनकार
एमएसपी अगर सरकार 23 फसलों के लिए गारंटी वाला कानून लेकर आती है तो अन्य किसान भी अपनी फसलों, जैसे फलों और सब्जियों, के लिए इसकी मांग लेकर सामने आएंगे. मौजूदा एमएसपी व्यवस्था के कारण, सरकार अपने पास 41 लाख टन का बफर स्टॉक होने के बावजूद करीब 110 लाख टन गेहूं और धान की खरीद करती है. अगर हम इसमें कुछ और फसलें जोड़ दें, तो उन्हें कैसे खरीदा और संग्रहित किया जाएगा? यानि कि मुद्दा 10 लाख करोड़ से बढ़कर कहां तक पहुंचेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. दूसरे कैश क्रॉप में रिस्क और ज्यादा होता है. तो जाहिर है कि फल-सब्जियों के किसानों को सरकार कैसे एमएसपी की गारंटी से अलग रख सकती है. ये तो कुछ किसानों के साथ अन्याय माना जाएगा. सब्जी उगाने वाले किसान अधिकतर छोटी जोत वाले गरीब किसान हैं उनको इस कानून से क्या फायदा मिलेगा.