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वरुण गांधी के ताजातरीन हृदय परिवर्तन से मोदी-शाह का दिल पिघल पाएगा क्या?

वरुण गांधी नई बीजेपी में मिसफिट रहे हैं. तेवर तो 2019 के पहले ही बदल गये थे, बाद में आक्रामक होते गये. किसान आंदोलन के दौरान तो लगा जैसे किसी और पार्टी के नेता हों. अभी अभी उनके रुख में बड़ा बदलाव महसूस किया जा रहा है - वो मौका चूक गये हैं, या टिकट मिलने की गुंजाइश बची है?

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मोदी-शाह से वरुण और मेनका गांधी के जैसे भी रिश्ते रह गये हों, लेकिन बीजेपी में महत्व नहीं खत्म हुआ है.
मोदी-शाह से वरुण और मेनका गांधी के जैसे भी रिश्ते रह गये हों, लेकिन बीजेपी में महत्व नहीं खत्म हुआ है.

वरुण गांधी के सामने जब भी बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व के विरोध की बात होती है, वो सीधे सीधे खारिज कर देते हैं. वो खुद को 33 साल की उम्र में बीजेपी का राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्य का प्रभारी बनाये जाने की मिसाल देते हैं - और कहते हैं ये बीजेपी ही है जिसने कम उम्र में उनको ये सब दिया है. 

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बात में दम तो है. लेकिन बढ़ती उम्र के साथ तरक्की न हो तो सवाल उठते ही हैं. और तब तो और भी ज्यादा सवाल उठते हैं जब उसी पार्टी में महत्व मिलना कम होने लगे, बल्कि ऐसा लगे जैसे हाशिये पर पहुंचा दिया गया हो. 

हो सकता है, खुद को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए वरुण गांधी लोगों के साथ खड़े होने की कोशिश करते हैं. और ऐसा करने से उनकी ये दलील तो दमदार हो ही जाती है कि वो मुद्दों की बात करते हैं. जन विरोधी मुद्दों पर लोगों की आवाज बनने की कोशिश करते हैं - और आखिर में ये कहने की भी गुंजाइश बनाये रखते हैं कि व्यक्ति से उनका विरोध थोड़े ही है. 

वरुण गांधी को बीजेपी में जो कुछ मिला वो 2014 से पहले ही मिला, जब बीजेपी की कमान राजनाथ सिंह के हाथ में हुआ करती थी. अव्वल तो वरुण गांधी ने अपने पहले ही लोक सभा चुनाव 2009 में अपना रंग दिखा दिया था - हिंदुओं के खिलाफ उठने वाले हाथ काट डालने जैसे बयान देकर. उस बयान के लिए उनको जेल भी जाना पड़ा था, और बाद में अदालत से बरी भी हो गये थे.

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अगर 2014 के चुनावों के दौरान एक छोटी सी गलती नहीं हुई होती तो बीजेपी के फायरब्रांड नेता कहे जाने वाले अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं से वो कहीं आगे नजर आते, लेकिन बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर सवाल उठाना बहुत भारी पड़ा - और अमित शाह के कमान संभालते ही खेल खत्म करने की कोशिश शुरू हो गई. असल में, मोदी की एक सभा में जिस भीड़ को बीजेपी दो लाख से ऊपर बता रही थी, वरुण गांधी ने ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि वहां तो मुश्किल से 50 हजार लोग ही आ सकते हैं. 

वरुण गांधी जैसे पढ़े-लिखे बीजेपी में कम ही नेता हैं. उनकी किताबें ही नहीं, पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख भी मुद्दों की गंभीरता और उनकी गहरी समझ को दर्शाते हैं - लेकिन काफी दिनों से उनकी राजनीति उनके संसदीय क्षेत्र पीलीभीत और सोशल मीडिया साइट X (पहले ट्विटर पर भी) तक ही सीमित नजर आती है. 

हाल फिलहाल उनकी पोस्ट में भी भारी बदलाव देखने को मिला है. वरुण गांधी अब पुरानी बातें भुलाने की कोशिश कर रहे लगते हैं - और दिल पर पत्थर रख कर फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया पोस्ट को रिपोस्ट करने लगे हैं.

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क्या वरुण गांधी ने सिद्धांतों से समझौता कर लिया?

2014 के बाद नजरअंदाज किये जाने के बाद भी वरुण गांधी यूपी का मुख्यमंत्री बनने के लिए कोशिशों में कोई कमी नहीं कर रहे थे. जून, 2016 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग के दौरान शहर में लगे पोस्टर और होर्डिंग ही नहीं, जितना बड़ा काफिला लेकर वरुण गांधी पहुंचे थे - मोदी-शाह को तो बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा होगा. 

और जब योगी आदित्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री बन गये तो उन पर क्या बीती होगी, एक वायरल वीडियो से साफ हो गया था. वरुण गांधी के भाषण के दौरान एक साधु के फोन पर बात करने पर उनके समर्थक रोकने लगते हैं. उनको रोकते हुए वरुण गांधी कहते हैं, अरे... उन्हें टोको मत... क्या पता कब महाराज सीएम बन जायें?

2022 के यूपी विधानसभा चुनावों से पहले भी वरुण गांधी किसानों की आवाज बन कर बीजेपी नेतृत्व को घेरते रहे - और एक वीडियो शेयर करते हुए यहां तक लिखा था कि वे भी हमारे ही खून हैं. 

2019 के लोक सभा चुनाव से पहले जोरदार चर्चा रही कि मेनका गांधी या वरुण गांधी में से किसी एक का टिकट कट सकता है. लेकिन मेनका गांधी के आरएसएस कनेक्शन के असर और चुनाव क्षेत्र बदलने का सुझाव बीजेपी नेतृत्व मान गया - और मेनका गांधी को सुल्तानपुर और वरुण गांधी को पीलीभीत शिफ्ट कर दिया गया - और एक शर्त भी रखी गई थी. 

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शर्त का पता तब चला जब वरुण गांधी ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया, 'मेरे परिवार में भी कुछ लोग प्रधानमंत्री रहे हैं... लेकिन जो सम्मान मोदी ने देश को दिलाया है, वो बहुत लंबे समय से किसी ने देश को नहीं दिलाया.'

ये पहला मौका था जब वरुण गांधी ने अपने परिवार को लेकर कोई गंभीर बात कही थी. मेनका गांधी को कभी ऐसी बातों से परहेज नहीं रहा, क्योंकि उनको अपने साथ हुआ व्यवहार याद कभी भूला नहीं होगा. 

वरुण गांधी और उनकी चचेरी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के बीच अच्छी केमिस्ट्री की बात कही जाती है, और राहुल गांधी के साथ भी ठीक ठाक ही रिश्ता है. आम तौर पर दोनों पक्ष एक दूसरे के प्रति बोलने से बचते हैं.

बहरहाल, अपडेट ये है कि बीते 9 फरवरी से वरुण गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातें X पर रीपोस्ट करने लगे हैं - और इसी लिए उनके इस कदम को पुराने राजनीतिक स्टैंड से यू-टर्न के रूप में देखा जाने लगा है.  

कांग्रेस में तो नो-एंट्री का बोर्ड हट ही नहीं रहा है

2019 के आम चुनाव से ठीक पहले प्रियंका गांधी की कांग्रेस में औपचारिक एंट्री हुई थी. कांग्रेस महासचिव बनाये जाने के साथ ही प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था. तब भी वरुण गांधी और प्रियंका गांधी के रिश्तों की दुहाई देते हुए उनके कांग्रेस ज्वाइन करने की खूब चर्चा हुई - लेकिन सारी चर्चाएं बकवास साबित हुईं. 

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भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वरुण गांधी का सवाल राहुल गांधी के सामने भी उठा. जवाब में राहुल गांधी ने कहा, 'मेरा जो परिवार है उसकी एक विचारधारा है... एक अलग थिंकिंग सिस्टम है... जो वरुण हैं... उन्होंने एक समय, और शायद आज भी उस विचारधारा को अपना लिया है, जिसे मैं स्वीकार नहीं कर सकता... उस विचारधारा को मेरे लिए स्वीकार करना संभव नहीं है... मैं आरएसएस के दफ्तर नहीं जा सकता... चाहे मेरा गला काट दिया जाए... वरुण से मिल सकता हूं, और गले लगा सकता हूं - लेकिन उनकी विचारधारा को नहीं अपना सकता.'

राहुल गांधी की इन बातों को वरुण गांधी के लिए कांग्रेस में नो-एंट्री के बोर्ड के रूप में देखा गया था - लेकिन क्या राहुल गांधी को तब भी आपत्ति होगी जब वरुण गांधी उस विचारधारा को छोड़ कर कांग्रेस ज्वाइन करने को तैयार हों?

क्या राहुल गांधी ने कभी वरुण गांधी के बारे में ऐसा विचार किया है? फिर वो कैसे कहते हैं कि जो संघ और बीजेपी से डरते हैं उनको कांग्रेस से बाहर भेज दो, और उधर जो अच्छे लोग हैं उनको कांग्रेस में लाओ.

आखिर राहुल गांधी को वरुण गांधी अच्छे क्यों नहीं लगते? 

हाल की X पोस्ट छोड़ दें तो वरुण गांधी तो वही सब बोलते रहे हैं जो राहुल गांधी गांधी को पसंद है - ऐसा कैसे हो सकता है कि राहुल गांधी को अखिलेश यादव दोबारा पसंद आ जाते हैं, और वरुण गांधी एक बार भी नहीं. 

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बीजेपी को वरुण गांधी की कितनी जरूरत है

बीजेपी के लिए वरुण गांधी की उपयोगिता उनके नाम में गांधी भर ही रह गई है. मेनका गांधी, पिछली मोदी सरकार में मंत्री भी रहीं, लेकिन दूसरी पारी में उनको दूर ही रखा गया. एक वजह वरुण गांधी भी हो सकते हैं, लेकिन खुद मेनका गांधी का चुनावों के दौरान विवादित हो जाना भी एक वजह हो सकती है. 

अभी अभी ये भी चर्चा होने लगी थी कि वरुण गांधी अमेठी से चुनाव लड़ेंगे. सपा और कांग्रेस उनका सपोर्ट करेंगे. जिस किसी ने भी ये चर्चा शुरू की हो, लेकिन ऐसी बातों का कोई मतलब नहीं बनता. अब तो वरुण गांधी की तरफ से भी ऐसी बातों को खारिज कर दिया गया है. भला स्मृति ईरानी के खिलाफ वरुण गांधी क्यों लड़ेंगे? अगर कांग्रेस नेतृत्व पार्टी में लेकर ऐसा कहे तो एक बात जरूर है, या स्मृति ईरानी किसी और सीट का रुख करती हैं तो भी बात और है.

वरुण गांधी के बारे में मोदी-शाह के मन में जो भी कड़वाहट हो, वो अलग चीज है. वो तो योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं को लेकर भी है, लेकिन राजनीति तो चल ही रही है. वरुण गांधी बीजेपी के लिए अब भी बड़े काम के हैं. हो सकता है मां-बेटे में से किसी एक को ही टिकट मिले - लेकिन दोनों ही खारिज कर दिये जायें, ऐसा तो नहीं लगता. अभी तो ऐसा नहीं लगता. 

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