2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 'बुलडोजर बाबा' का खिताब मिला था. देश में दस साल से चल रहे ब्रांड मोदी की तरह देखते ही देखते बुलडोजर बाबा भी उत्तर प्रदेश में पॉलिटिकल ब्रांड बन गया - लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर एक्शन पर एक तरीके से फिलहाल ब्लैंकेट-बैन लगा दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी राज्य सरकारों को कह दिया है कि सिर्फ आरोपी ही नहीं, अदालत से दोषी करार दिये जाने के मामलों में भी इस तरह का कोर्स ऑफ एक्शन कोर्ट ही तय करेगा. कोर्ट के दिशानिर्देश तय किये जाने के बाद ही आगे कोई भी कार्रवाई हो सकेगी. सुनवाई की अगली तारीख 17 सितंबर, 2024 तय की गई है.
मामले से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ साफ कहा है, हम पूरे देश के लिए दिशानिर्देश तय करेंगे... लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि किसी भी अनधिकृत निर्माण को संरक्षण देंगे.
देखा जाये तो लव जिहाद और घर वापसी जैसी मुहिम की बदौलत यूपी के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे योगी आदित्यनाथ की राजनीति को आगे बढ़ाने में एनकाउंटर पॉलिटिक्स और बुलडोजर जस्टिस का ही हाथ रहा है - सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से सबसे ज्यादा अभी योगी आदित्यनाथ की ही राजनीति प्रभावित होने वाली है.
एक्शन लीगल, प्रमोशन पॉलिटिकल
सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से जस्टिस बीआर गवई ने पूछा, किसी का घर महज इस आधार पर कैसे ढहाया जा सकता है कि वो किसी मामले में आरोपी है?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील थी, 'हमने एफिडेविट के माध्यम से दिखाया है... नोटिस काफी पहले ही भेजा गया था. बोले, ढहाने की प्रक्रिया का किसी भी अपराध से कोई संबंध नहीं है.
तुषार मेहता के जवाब में याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी कर रहे सीनियर वकील दुष्यंत दवे और सीयू सिंह का कहना था, घर इस कारण ढहाये गये, क्योंकि वो किसी मामले में आरोपी हैं.
जस्टिस बीआर गवई ने साफ साफ बता दिया, कोई व्यक्ति दोषी भी है तो कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किये बगैर उसका घर ढहाया नहीं जा सकता.
2017 में यूपी का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने एक एक करके ऐसी कई मुहिम चलाई जिनके असर का आकलन तो अलग से किया जा सकता है, लेकिन पाया तो यही गया कि असर से ज्यादा विवाद हुए. एंटी रोमियो स्क्वॉयड, और पुलिस एनकाउंटर जिनमें एक पुलिस वाले के मुंह से ही ठांय-ठांय बोलने से लेकर गाड़ी पलटने तक के किस्से जुड़ते चले गये. एक अघोषित मुहिम को दबी जबान में पुलिस महकमे में ऑपरेशन लंगड़ा भी कहा जाता था, जिसमें कथित अपराधियों से एनकाउंटर के दौरान उनकी टांग में गोली मार दी जाती रही, ताकि वे अपराध को अंजाम देने लायक न रहें.
और बुलडोजर एक्शन तो अलग ही दहशत पैदा करने वाला रहा है. वैसे तुषार मेहता और यूपी सरकार के हलफनामे से लगता है कि ऐसी कार्रवाई स्थानीय स्तर पर विकास प्राधिकरणों या नगर निगम की तरफ से की जाती रही है. ये भी बताया जा रहा है कि कार्रवाई इसलिए हुई क्योंकि वे निर्माण अवैध थे. हो सकते हैं, ये भी हो सकता है कि उसके लिए उनको नोटिस भी दिये गये हों. ऐसा भी देखने को मिलता है कि स्थानीय स्तर पर नोटिस दिये जाने के बाद संबंधित पक्ष कर्मचारियों और अधिकारियों से मिलकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं, जिसमें ज्यादा संबंधों और राजनीतिक रसूख के अलावा भ्रष्टाचार के तौर तरीकों का इस्तेमाल होता है - और ये सिलसिला चलता रहता है, तब तक जब तक कि प्रशासन को बिल्डिंग गिरा डालने की मजबूरी न पैदा हो जाये.
कारण बहुत सारे हो सकते हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ को बुलडोजर एक्शन का राजनीतिक तौर पर बहुत फायदा मिला है - और कुछ हुआ हो न हो, योगी आदित्यनाथ अपने समर्थकों के बीच बुलडोजर बाबा तो बन ही गये हैं.
छवि बनाये रखने के लिए नया टूल खोजना होगा
ऐसा भी नहीं है कि बुलडोजर एक्शन यूं ही चलता ही रहा है. लखनऊ के कुछ इलाकों में कुछ घरों पर निशान लगाये जाने के बाद लोग परेशान हो उठे थे. ऐसे लोग जब अपनी फरियाद लेकर मुख्मयंत्री आवास पहुंचे तो योगी आदित्यनाथ ने उनको भरोसा दिलाया और कार्रवाई रोक दी गई. तब योगी आदित्यनाथ ने कहा था, पंतनगर हो या इंद्रप्रस्थ नगर, वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा और शांतिपूर्ण जीवन के लिए सरकार प्रतिबद्ध है. एनजीटी के आदेशों के क्रम में फ्लड प्लेन जोन में जो निशान लगाये गये हैं, वहां निजी भूमि भी है, लेकिन निजी भूमि को खाली कराने की न तो कोई आवश्यकता है, और न ही कोई प्रस्ताव.
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती को समझें तो, अब नहीं लगता कि ऐसी स्थिति फिर से आने वाली है. ऐसे में योगी आदित्यनाथ को ऐसी ही कोई नई मुहिम शुरू करनी होगी, जो बुलडोजर बाबा की उनकी छवि को आगे न भी बढ़ा पाये, तो कम से कम बरकरार तो रख सके.
मुमकिन है, ममता बनर्जी से प्रेरित होकर योगी आदित्यनाथ की तरफ से भी पश्चिम बंगाल जैसा कोई कदम उठाया जाये. जैसे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी बलात्कार के मामलों में त्वरित न्याय के लिए एंटी रेप बिल ला रही हैं, यूपी में भी योगी आदित्यनाथ चाहें तो बुलडोजर चलाने के लिए कोई कानून तो बना ही सकते हैं.
असर का पता तो उपचुनावों के नतीजों से ही चलेगा
ऐसा भी नहीं कि बुलडोजर एक्शन सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिला है, कांग्रेस की सरकार रहते राजस्थान में अशोक गहलोत ने भी वैसे ही मामलों में बुलडोजर चलवाया था, जैसे योगी आदित्यनाथ कराते रहे हैं - और कंगना रनौत के दफ्तर पर मुंबई में जब बीएमसी का बुलडोजर चला था, तब तो महाविकास आघाड़ी की ही सरकार थी, जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी, और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री हुआ करते थे.
कट्टर हिंदू नेता होने के साथ साथ योगी आदित्यनाथ की एक सख्त प्रशासक के रूप में भी छवि गढ़ी जाने लगी थी. ऐसा नेता जिसके हिंदुत्व की राजनीतिक लाइन में जो आड़े आता है उसके साथ वो बुलडोजर स्टाइल में ही पेश आते हैं. चुनावों के दौरान योगी आदित्यनाथ का एक बयान काफी चर्चित रहा, '10 मार्च के बाद गर्मी शांत कर देंगे.' 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में 10 मार्च को ही नतीजे आये थे, और उसके पहले से ही योगी आदित्यनाथ बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से ठनी होने के बावजूद आत्मविश्वास से लबालब नजर आ रहे थे.
योगी आदित्यनाथ की अब तक जो छवि निखर कर आई है, लव जिहाद और घर वापसी कैंपेन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. योगी आदित्यनाथ की छवि को निखारने में पहले जो भूमिका हिंदू युवा वाहिनी की हुआ करती थी, बाद में बुलडोजर ने भी कुछ कुछ वैसा रोल निभाया. चुनाव कैंपेन के दौरान योगी की रैलियों में बुलडोजर भी वैसे ही रखा जाने लगा था, जैसे एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसे इमरजेंसी इंतजाम किये जाते हैं - सुप्रीम कोर्ट के ताजा फरमान का असली असर यूपी में होने जा रहे उपचुनावों के नतीजों में भी देखने को मिल सकता है.