ढाई महीने से दिल्ली के तीन बॉर्डर जाम हैं. किसान तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग पर कायम हैं. सरकार समझाने पर कायम है. सब पूछ रहे हैं भईया ये दीवार टूटती क्यों नहीं.आज हम बताएंगे कि क्या ये मुमकिन है. किसान आंदोलन के दौरान ऐसे मौके कई बार आए थे जब लगा था कि अब शायद सरकार और किसानों के बीच कोई सहमति बन सकती है लेकिन वैसा हुआ नहीं. जब विदेशों में आंदोलन के समर्थन में बापू की प्रतिमा तोड़ी जाने लगी तब लगा कि इसमें कुछ भारत विरोधी विदेशी ताकतें भी अपना खेल कर रही हैं. इसके बाद जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेलेक्टिव सेलिब्रिटीज खुल कर सामने आने लगी हैं, उससे आंदोलन की आड़ में भारत विरोध की मानसिकता का पता मिलता है. राजनीति देश के अंदर लगातार हो रही है. दिलों की दीवारें शायद सड़कों पर आ चुकी हैं. फर्क बस इतना है कि पहले मतभेद थे, अब ये कंक्रीट, कंटीले तारों से भरी हैं. शासन-प्रशासन अतिरिक्त चुस्त है. मंजर देश की राजधानी से सटे क्षेत्रों के हैं लेकिन हालात सरहदों जैसे? यानि साफ है कि अविश्वास की दीवार भी खिंच चुकी है और ये दीवार भी टूटती क्यों नहीं, हमारा सवाल यही है. देखें दस्तक, श्वेता सिंह के साथ.