
देश में 74 साल बाद चीतों ने वापसी की है. लेकिन हिन्दुस्तान की सरजमीं पर चीतों का एक शानदार इतिहास रहा है. मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक चीतों से जुड़ी कई कहानियां आपको इतिहास के पन्नों में मिल जाएंगी. पर क्या आप जानते हैं कि 'पिंक सिटी' जयपुर में एक दौर में 'चीतों वालों का मोहल्ला होता था'. यहां अफगानिस्तान से आए चीता ट्रेनर रहा करते थे. जयपुर और चीतों से जुड़ी ऐसी कई और ऐतिहासिक कहानियां हैं.
राजा के लिए शिकार करते थे चीते
'अकबरनामा' में बताया गया है कि अकबर के समय मुगलों के पास चीतों की एक पूरी फौज होती थी. दरअसल इन चीतों के माध्यम से सम्राट और अन्य लोग शिकार किया करते थे. इसके लिए चीतों को बाकायदा प्रशिक्षित किया जाता था. इतना ही नहीं जयपुर के पास सांगानेर के जंगलों में अकबर अक्सर शिकार के लिए आता था और चीतों की मदद से हिरण का शिकार किया करता था.
चीतों वालों का मोहल्ला और निजाम महल
चीतों का जयपुर कनेक्शन सिर्फ सांगानेर के जंगलों तक ही सीमित नहीं है. यहां की वाल्ड सिटी (पुराना जयपुर शहर या पिंक सिटी एरिया) में एक 'चीतों वालों का मोहल्ला' होता था. इस मोहल्ले में एक मकान था 'निजाम महल', 18वीं सदी के अंत में ये जगह चीता ट्रेनर्स का एपिसेंटर होती थी. महाराजा सवाई जय सिंह प्रथम के शासन काल में यहां अफगानिस्तान से आए वाजिद खान रहा करते थे, जिन्हें महाराज ने चीतों को शिकार के लिए प्रशिक्षित करने के लिए नियुक्त किया था. उनकी मौत के बाद उनके वारिसों ने इस परंपरा को आगे चलाए रखा.
जब हैदराबाद के निजाम से मांगे चीते
सवाई माधो सिंह द्वितीय के शासन काल के दौरान 1914 में चीता जयपुर और आसपास के इलाकों से गायब या विलुप्त हो गया. इसके बाद माधो सिंह ने हैदराबाद के निजाम को पत्र लिखकर कुछ चीते जयपुर भेजने के लिए कहा. हालांकि निजाम ने जवाब में भेजा कि हैदराबाद के जंगलों में भी चीता विलुप्त हो चुका है.
इंग्लैंड से जयपुर आए दो चीते
भारत में विदेश से चीते आज पहली बार नहीं आए हैं. आज आने वाले 8 चीते नामीबिया से आए हैं, लेकिन जब सवाई माधो सिंह द्वितीय के समय जयपुर से चीते खत्म हो गए और निजाम ने भी अपनी असमर्थता जताई, तब उन्होंने इंग्लैंड में अपने दो दोस्तों से चीते भेजने का अनुरोध किया. इसके बाद इंग्लैंड से दो चीते समुद्र मार्ग से मुंबई आए और फिर सड़क मार्ग से जयपुर पहुंचे. इनमें से एक 5 साल बाद मर गया और दूसरा चीता 1931 तक जीवित रहा, जो रामनिवास बाग की शान हुआ करता था.
(रिपोर्ट : जयकिशन शर्मा)