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सचिन पायलट और 11 तारीख का संयोग... अनशन, पदयात्रा के बाद अब क्या 11 जून को करेंगे कोई बड़ी घोषणा?

Pilot vs Gehlot: राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट एक दूसरे का खुलकर विरोध कर रहे हैं. पायलट ने गहलोत सरकार के खिलाफ धरना से लेकर पदयात्रा तक कर ली है. इतना ही नहीं उन्होंने सरकार के खिलाफ एक बड़े आंदोलन की भी चेतावनी दी है. अब माना जा रहा है कि वह 11 जून को अपने पिता की पुण्यतिथि पर कोई बड़ा ऐलान कर सकते हैं. 

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सचिन पायलट ने अशोक गहलोत के खिलाफ खोल रखा है मोर्चा (फाइल फोटो)
सचिन पायलट ने अशोक गहलोत के खिलाफ खोल रखा है मोर्चा (फाइल फोटो)

Sachin Pilot vs Ashok Gehlot: कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस जल्द ही इस साल के अंत में कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर अपना फोकस करेगी. इन राज्यों में राजस्थान भी शामिल है लेकिन वहां कांग्रेस इस समय संगठन के भीतर ही नेताओं के आपसी टकराव की स्थिति से जूझ रही है. राजस्थान के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ( Ashok Gehlot) के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. वह लगातार खुले मंच से सरकार की नाकामियों को उजागर कर रहे हैं. वादाखिलाफी पर उन्हें घेर रहे हैं.

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सचिन पायलट (Sachin Pilot) के तेवर पार्टी के खिलाफ माने जा रहे हैं. राजस्थान कांग्रेस में एक धड़ा पायलट के रवैये को अनुशासनहीनता मान रहा है. अब इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि सचिन पायलट विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ अपना सफर खत्म कर सकते हैं. दरअसल वह खुद को राजस्थान के सीएम का प्रबल दावेदार मानते हैं लेकिन अशोक गहलोत अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं. दोनों मनमुटाव बढ़ा और अब ऐसे हालात हो गए हैं कि अब दोनों नेता खुलकर आरोप-प्रत्यारोप करने लगे हैं.  

गहलोत सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे

सचिन पायलट ने गत महीने पहले 11 सिविल लाइंस में आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर कहा था कि वसुंधरा राजे शासन में हुए भ्रष्टाचार के मामलों की जांच की मांग को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को लिखे उनके पत्रों का कोई जवाब नहीं आया है.

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इसके बाद उन्होंने घोषणा कर दी थी वह 11 अप्रैल को सांकेतिक उपवास पर बैठेंगे ताकि गहलोत सरकार से उन मामलों की जांच शुरू करने का आग्रह किया जा सके, जो उन्होंने और गहलोत दोनों ने विपक्ष में रहते हुए उठाए थे.

हालांकि 7 मई को अशोक गहलोत ने ढोलपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए दावा कर दिया कि बीजेपी के तीन विधायकों, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (vasundhara raje scindia) का भी नाम शामिल है, ने उनकी सरकार को बचाने में मदद की थी.

इस दौरान गहलोत का सबसे तीखा तेवर तब देखने को मिला जब उन्होंने पायलट खेमे के विधायकों से कथित रूप से गहलोत सरकार को गिराने के लिए बीजेपी के अमित शाह से ली गई 10 करोड़ रुपये की रिश्वत वापस करने के लिए कह दिया.

इस पर पायलट ने जवाब दिया कि बीजेपी विधायकों के लिए तालियां और अपनी पार्टी के विधायकों के लिए ऐसे आरोप स्वीकार्य नहीं होंगे. उन्होंने कहा कि गहलोत का हालिया भाषण दर्शाता है कि उनकी नेता सोनिया गांधी नहीं, बल्कि वसुंधरा राजे हैं.

इस चुनावी वर्ष में अशोक गहलोत द्वारा पायलट गुट के विधायकों पर उनकी सरकार को गिराने के लिए अमित शाह से रिश्वत के पैसे लेने का आरोप लगाना शायद इस बात को हवा देने के लिए पर्याप्त है कि सचिन पायलट कांग्रेस से नाता छोड़ सकते हैं.

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'मुझे निकम्मा, नाकारा, गद्दार कहा गया'

पायलट ने पलटवार करते हुए कहा- "मुझे कोरोना, निकम्मा, नाकारा, गद्दार, देशद्रोही जैसे कई अलग-अलग नामों से बुलाया गया, अपने ही नेताओं का अपमान किया जा रहा है, बीजेपी नेताओं की सराहना की जा रही है. मैं स्पष्ट रूप से गहलोत द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज करता हूं. वे नेता तो पिछले 30-40 साल से लोगों के बीच काम कर रहे हैं, उन पर चंद पैसों के लिए बिक जाने का आरोप लगाना गलत है.''

अजमेर से जयपुर तक निकाली यात्रा

इसके बाद पायलट ने 9 मई को घोषणा कर दी कि वह 11 मई से अजमेर से जयपुर के लिए 125 किलोमीटर लंबी 5 दिवसीय जन संघर्ष पदयात्रा निकालेंगे. पायलट ने अजमेर से यात्रा शुरू करने के पीछे तर्क दिया कि यहां राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) का कार्यालय है, जो पेपर लीक के मामलों के कारण काफी सुर्खियों में रहा था. कुछ विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस यात्रा से पायलट के आगामी विधानसभा चुनाव अजमेल से लड़ने की संभावना का संकेत मिलता है.

हालांकि पायलट ने अपनी यात्रा के दौरान दिए गए साक्षात्कारों में एक बार भी कांग्रेस छोड़ने या आम आदमी पार्टी (आप) और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) जैसे स्थानीय संगठन के साथ गठबंधन करने की संभावना से इनकार नहीं किया है.

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पायलट, चुनाव और उनका प्रदर्शन

- 2013 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में लड़े गए राज्य के चुनावों में 200 विधानसभा सीटों में कांग्रेस को 21 सीटें ही मिली थीं. पायलट को कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान में पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए चुना था.

- 2014 में मोदी लहर में कांग्रेस सभी 25 सीटों पर हार गई, लेकिन इसके बाद कांग्रेस को जमीन पर खड़ा करने के लिए पायलट के प्रयासों को याद नहीं किया गया. अगले साढ़े चार वर्षों में, पार्टी ने उपचुनाव की जीत हासिल की, विशेष रूप से अलवर और अजमेर की लोकसभा सीट पर भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज कराई.

- जब दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनाव आए तो पायलट ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) प्रमुख के रूप में पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व किया. बहुमत के आंकड़े से दो सीटें कम होने के कारण कांग्रेस 99 पर अटक गई हालांकि इसके बाद भी वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. अगले कुछ दिनों में तक चले उतार-चढ़ावों के बाद गहलोत पायलट को सीएम पद के लिए इस आधार पर पछाड़ने में कामयाब रहे कि उनके पास ज्यादा विधायकों का समर्थन है.

- 2018 के चुनाव परिणामों के बाद हुए घटनाक्रम के दौरान गहलोत खेमा पार्टी आलाकमान को यह समझाने में कामयाब रहा कि वे निर्दलीय विधायक, जो लंबे समय से गहलोत के वफादार थे, उन्होंने पायलट द्वारा टिकट ने दिए जाने के बाद कांग्रेस छोड़ दी थी और अपने दम पर चुनाव लड़ा था. उन निर्दलीय विधायकों ने पायलट के बजाय गहलोत को सीएम बनाए जाने की स्थिति में ही कांग्रेस को समर्थन देने का वादा किया है. गहलोत राजस्थान में बसपा के सभी छह विधायकों का समर्थन हासिल करने में भी कामयाब रहे, जिन्होंने कांग्रेस में विलय के लिए अपनी मूल पार्टी छोड़ दी थी.

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- 2018 में लोकसभा चुनावों से करीब छह महीने पहले पार्टी हाईकमान ने बयान दे दिया कि पायलट की बजाए गहलोत पार्टी को स्थिरता प्रदान करने और राजस्थान में मोदी के रथ को चुनौती देने के लिए ज्यादा सक्षम हैं. हालांकि, निचले सदन के लिए 2019 के चुनावों में कांग्रेस फिर से जोधपुर सीट समेत राजस्थान की सभी 25 सीटों पर हार गई.

जोधपुर से अशोक गहलोत के बेटे वैभव को रिकॉर्ड अंतर से हार का सामना करना पड़ा था. गहलोत ने बाद में तत्कालीन पीसीसी चीफ पर अपने बेटे की हार का दोष मढ़ते हुए कहा कि पायलट को जवाब देना चाहिए कि उनका बेटा क्यों हार गया.

इसके बाद राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच राजनीतिक लड़ाई बढ़ती गई. जुलाई 2020 में पायलट ने खुले तौर पर बगावत कर दी. इसके बाद उन्हें डिप्टी सीएम और पीसीसी के पद से हटाया जाना उनके लिए सबसे कड़वा अध्याय रहा. 

सरकार के समने 3 मांगें और चेतावनी

पायलट अपनी यात्रा को अंतिम दिन जयपुर में थे. वह मंच से करीब 50,000 की भीड़ को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान पायलट ने खुले तौर पर राजस्थान सरकार से तीन मांगों को पूरा करने की मांग की. उन्होंने कहा कि अगर सरकार मांगों को पूरा करने में विफल रहती है तो गहलोत सरकार को राज्य में आंदोलन का सामना करना पड़ेगा.

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उन्होंने कहा- अब तक सांकेतिक अनशन और जनसंघर्ष पदयात्रा निकालने में मैं शांतिपूर्ण रहा हूं, लेकिन अगर इस महीने के अंत तक गहलोत सरकार पेपर लीक से प्रभावित सभी छात्रों को मुआवजा देने, आरपीएससी को भंग कर इसका पुनर्गठन करने के अलावा वसुंधरा राजे के शासन में सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन नहीं करती है तों राज्य में आंदोलन होगा.

तो क्या खुद कांग्रेस को नहीं छोड़ना चाहते

पायलट शायद जानते हैं कि गहलोत से अपनी मांगों को मानने पर मजबूर नहीं कर पाएंगे और शायद इसी में पायलट की भविष्य की रणनीति का जवाब छिपा है. एक राजनीतिक विशेषज्ञ ने इंडिया टुडे का कहना है, "पायलट विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं. वह खुद से कांग्रेस को नहीं छोड़ना चाहेंगे, लेकिन वह पार्टी नेतृत्व को ऐसी स्थिति में लाने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे गहलोत के खिलाफ उनकी खुली निंदा से पार्टी को नुकसान पहुंचने की आशंकाओं के कारण पार्टी ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दे.”

यह है विशेषज्ञों को कहना-

- विशेषज्ञ ने कहा, "पायलट को लगता है कि अगर उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाता है, तो उनकी संभावना बढ़ जाएगी क्योंकि उन्हें चुनावों में सहानुभूति की लहर का फायदा मिल सकता है."

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- राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना ​​​​है कि पिछले साल सितंबर में होने वाली कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) की बैठक के तुरंत बाद पायलट ने अपने विकल्पों पर विचार शुरू कर दिया था लेकिन इसके साथ ही मौजूदा कार्यकाल में उनके सीएम बनने की उम्मीदों को झटका लग गया. वहीं इस साल जनवरी में उन्होंने जयपुर पहुंचने से पहले नागौर, हनुमानगढ़, झुंझुनू, पाली का दौरा किया और गहलोत सरकार से पेपर लीक के मास्टरमाइंड के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. कई और तीखी टिप्पणियां भी कीं.

- राजस्थान के राजनीतिक जानकारों का मानना ​​है कि राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री के बीजेपी में शामिल होने की संभावना बेहद कम है. पायलट ने खुद भी स्वीकार किया है कि वह बीजेपी में शामिल नहीं होंगे. वह मानते हैं कि बीजेपी उनके और उनके पिता के राजस्थान में आदर्शों के अनुरूप नहीं है.

- हालांकि, अगर कांग्रेस उनके खिलाफ कार्रवाई करने का फैसला करती है और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर देती है, तो पायलट शायद अलग मोर्चे के गठन की घोषणा कर सकते हैं और आम आदमी पार्टी और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने का फैसला कर सकते हैं.

हर विरोध के लिए 11 तारीख ही क्यों चुनी

दिलचस्प बात यह है कि 11 अप्रैल को जयपुर में सांकेतिक उपवास रखने और 11 मई को अजमेर से अपनी यात्रा शुरू करने के बाद पायलट के अब 11 जून भी कोई बड़ी घोषणा करने की उम्मीद है. दरअसल 11 जून को उनके पिता राजेश पायलट की पुण्यतिथि है. जो भी हो सचिन पायलट और अशोक गहलोत के रिश्ते जल्द खत्म होने के आसार बनते दिख रहे हैं क्योंकि दोनों नेताओं के बीच का झगड़ा अपने चरम पर पहुंच चुका है.

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