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झुंझुनूं की अनोखी मूक रामलीला... 177 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवंत, कलाकार इशारों में निभाते हैं भूमिका

राजस्थान के झुंझुनूं में अनोखी मूक रामलीला (Silent Ramlila) का आयोजन हो रहा है. लोगों का कहना है कि ये 177 साल पुरानी परंपरा है, जिसमें बिना किसी संवाद के पात्र इशारों और मुखौटों के माध्यम से अपनी भूमिकाएं निभाते हैं. ढोल-नगाड़ों की धुन पर चलने वाली यह अनूठी रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी है.

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177 साल पुरानी मूक रामलीला का मंचन करते कलाकार.
177 साल पुरानी मूक रामलीला का मंचन करते कलाकार.

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के बिसाऊ कस्बे में हर साल होने वाली मूक रामलीला (Silent Ramlila) अपने आप में एक अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा को सहेजे हुए है. लगभग 177 साल पुरानी इस रामलीला की सबसे खास बात यह है कि इसका पूरा मंचन बिना किसी संवाद के मूक अभिनय द्वारा किया जाता है. सभी पात्र अपने-अपने किरदार को मुखौटों के माध्यम से जीवंत करते हैं, और संवाद की जगह केवल इशारों से अपनी भूमिकाओं को निभाते हैं.

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रामलीला का यह मंचन खुले मैदान में किया जाता है, जहां शाम के समय ढोल-नगाड़ों की धुन पर यह अनोखी लीला शुरू होती है. खास बात यह है कि ढोल-नगाड़े बजाने का काम स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग करते हैं, जो इस आयोजन को सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बनाता है.

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मूक रामलीला का इतिहास करीब 177 साल पुराना है. इतिहासकार त्रिलोकचंद शर्मा के अनुसार, इस रामलीला की शुरुआत साध्वी जमना ने की थी, जिन्होंने गांव के बच्चों को एकत्रित कर रामलीला के मंचन की शुरुआत की. मुखौटे पहनने के बाद बच्चों को संवाद बोलने में कठिनाई हुई, जिसके कारण यह लीला मूक रूप में खेली जाने लगी, और यह परंपरा आज तक चली आ रही है.

इस रामलीला की एक और खास बात यह है कि मंचन के दौरान रामायण के पात्र ढोल-नगाड़ों की धुन पर बिना किसी संवाद के अपनी भूमिकाएं निभाते हैं. लंका, अयोध्या और पंचवटी की सजावट के लिए लकड़ी के ढांचे बनाए जाते हैं. मैदान में बालू और मिट्टी डालकर पानी का छिड़काव किया जाता है, जिससे प्राकृतिक माहौल तैयार किया जाता है. रामलीला का मंचन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक, यानी 15 दिनों तक चलता है.

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यह भी पढ़ें: अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम एकता की अनोखी मिसाल, 1963 से रामलीला के मंचन में मुस्लिम समुदाय के लोग लेते हैं हिस्सा

एक और अनूठी बात यह है कि रामलीला में रावण का दहन दशहरे के दिन नहीं, बल्कि चतुर्दशी को होता है. विजयादशमी के चार दिन बाद रावण वध की परंपरा निभाई जाती है, जो इसे अन्य रामलीलाओं से बिल्कुल अलग बनाती है.

विदेशी पर्यटकों का आकर्षण

यह मूक रामलीला केवल स्थानीय निवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि विदेशियों और अप्रवासी भारतीयों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुकी है. हर साल बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी इस अनूठी रामलीला का हिस्सा बनने के लिए यहां आते हैं और इसे देखने का आनंद लेते हैं.

लक्ष्मीपत सिंघानिया का योगदान

इस ऐतिहासिक रामलीला के आयोजन और सजावट के लिए प्रसिद्ध उद्योगपति लक्ष्मीपत सिंघानिया ने अपनी पैतृक हवेली को रामलीला कमेटी को दान कर दिया है. इसी हवेली से रामलीला की साज-सज्जा की सभी व्यवस्थाएं की जाती हैं. इसे आज भी एक धरोहर के रूप में संभालकर रखा गया है.

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