आज फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष का प्रदोष व्रत है. हर महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत किया जाता है. यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है. पुराणों के अनुसार जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा से इस व्रत को करता है उसे अच्छी सेहत और लम्बी आयु की प्राप्ति होती है. यह व्रत महीने में दो बार आता है. 11 मार्च को महाशिवरात्रि होने की वजह से आज पड़ने वाले प्रदोष व्रत का महत्व और बढ़ गया है. भक्त दो दिनों तक लगातार शिव आराधना करेंगे.
प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी प्रारम्भ – 10 मार्च को दोपहर 02 बजकर 40 मिनट से
त्रयोदशी तिथि समाप्त – 11 मार्च को 02 बजकर 39 मिनट तक
प्रदोष व्रत की विधि
स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनें और पूजा की सारी सामग्री एकत्रित कर लें. बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल से भगवान शिव की पूजा करें. प्रदोष व्रत करने वाले को आज पूरे दिन उपवास रखना होता है. सूर्यास्त से कुछ देर पहले दोबारा स्नान कर लें. गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध कर लें. उत्तर-पूर्व दिशा में मुंह करके आसन पर बैठ जाएं. अब भगवान शिव के मंत्र का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाएं.
प्रदोष व्रत का महत्व
कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में शाम के समय को प्रदोष कहा गया है. मान्यता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर नृत्य करते हैं. इसलिए भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए इस दिन प्रदोष व्रत रखा जाता है. जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. आज के दिन शिव भगवान की विशेष कृपा मिलती है. प्रदोष व्रत में शाम का समय पूजा के लिए अच्छा माना जाता है. इस दिन सभी शिव मन्दिरों में शाम के समय प्रदोष मंत्र का जाप किया जाता है.
प्रदोष व्रत कथा
स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती थी और संध्या को लौटती थी. एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था. शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था. उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी. ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया.
कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई. वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई. ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भ देश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था. ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी. ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया.
एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई. ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त 'अंशुमती' नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे. गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए. कन्या ने विवाह हेतु राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया.
दूसरे दिन जब वह पुन: गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है. भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया. इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया. यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था. स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एकाग्र होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती.