हर किसी को भाई-बहन के पावन प्रेम के प्रतीक रक्षाबंधन का इंतजार रहता है. देश के अलग-अलग भागों में यह पर्व रीति-रिवाज में थोड़े अंतर के साथ मनाया जाता है.
रक्षाबंधन श्रावण महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है. आम रीति के अनुसार, इस अवसर पर बहनें अपने भाई की दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं. भाई अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार देता है. रक्षाबन्धन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्व है. राखी कच्चे सूत से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे या सोने-चांदी के तारों से बनी हो सकती है.
आम तौर पर बहनें भाई को ही राखी बांधती हैं, लेकिन ब्राह्मण या गुरु हर किसी को रक्षासूत्र बांधते हैं. सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर लड़कियां और महिलाएं पूजा की थाली सजाती हैं. थाली में राखी के साथ रोली या हल्दी, चावल, दीपक और मिठाई होते हैं. वे भाइयों को रोली या हल्दी से टीका लगाती हैं. भाइयों की आरती उतारी जाती है, तब दाहिनी कलाई पर राखी बांधी जाती है. रक्षाबंधन का अनुष्ठान पूरा होने के बाद ही भोजन किया जाता है. यह पर्व भारतीय समाज में इस तरह समाया हुआ है कि धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फिल्में भी इससे अछूते नहीं हैं.
इंद्राणी ने बांधी थी अपने पति को राखी
राखी के बारे में भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ, तब दानव हावी होते नजर आने लगे. भगवान इंद्र घबराकर बृहस्पति के पास गए. वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी. उन्होंने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया. संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था.
राजा बलि से जुड़ी कथा
स्कंध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है. दानवेंद्र राजा बलि का अहंकार चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और ब्राह्मण के वेश में राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए. भगवान ने बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि की मांग की. भगवान ने तीन पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नाप लिया और राजा बलि को रसातल में भेज दिया. बलि ने अपनी भक्ति के बल पर भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया. भगवान को वापस लाने के लिए नारद ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया. लक्ष्मीजी ने राजा बलि को राखी बांध अपना भाई बनाया और पति को अपने साथ ले आईं. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी.
महाभारत में भी रक्षाबंधन
रक्षाबंधन की कथा महाभारत से भी जुड़ती है. जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं, तब भगवान कृष्ण ने उनकी और उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी.
कृष्ण और द्रौपदी से संबंधित प्रसंग में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था, तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई. द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी थी. यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था. कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया था.
राखी से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग
इस त्योहार से कई ऐतिहासिक प्रसंग जुड़े हैं. राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे, तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम लगाने के साथ-साथ हाथ में रेशमी धागा बांधती थीं. यह विश्वास था कि यह धागा उन्हें विजयश्री के बाद वापस ले आएगा.
मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर आक्रमण करने की सूचना मिली. रानी उस समय लड़ने में असमर्थ थी, इसलिए उन्होंने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना की. हुमायूं ने राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह के विरुद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ाई लड़ी. हुमायूं ने कर्मावती व उनके राज्य की रक्षा की.
एक अन्य प्रसंग में कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पोरस (पुरू) को राखी बांधकर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन ले लिया. पोरस ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान किया और सिकंदर पर जानलेवा हमला नहीं किया.