आज देश भर में विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है. हालांकि कुछ जगहों पर 16 सितंबर को भी विश्वकर्मा पूजा की जा चुकी है. विश्वकर्मा जयंती साल में दो बार मनाई जाती है. ज्यादातर लोग कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा मनाते हैं. वहीं राजस्थान और गुजरात में भगवान विश्वकर्मा का जन्म 7 फरवरी को मनाया जाता है. कहा जाता है कि अश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि को भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था. आज के दिन लोग भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति स्थापित करते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं. विश्वकर्मा को दुनिया को सबसे पहला इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है. इसलिए इस दिन उद्योगों, फैक्ट्रियों और हर तरह के मशीन की पूजा की जाती है.
विश्वकर्मा पूजा की विधि
भगवान विश्वकर्मा की पूजा और यज्ञ विशेष -विधान से होता है. इसकी विधि यह है कि यज्ञकर्ता पत्नी सहित पूजा स्थान में बैठे. इसके बाद विष्णु भगवान का ध्यान करें. हाथ में पुष्प, अक्षत लेकर मंत्र पढ़े और चारों ओर अक्षत छिड़के. अपने हाथ में रक्षासूत्र बांधे एवं पत्नी को भी बांधे. पुष्प जलपात्र में छोड़ें. इसके बाद हृदय में भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करें. दीप जलाएं, जल के साथ पुष्प एवं सुपारी लेकर संकल्प करें. शुद्ध भूमि पर अष्टदल बनाए. उस पर जल डालें. इसके बाद पंचपल्लव, सप्त मृन्तिका, सुपारी, दक्षिणा कलश में डालकर कपड़े से कलश की तरफ अक्षत चढ़ाएं. चावल से भरा पात्र समर्पित कर विश्वकर्मा बाबा की मूर्ति स्थापित करें और वरुण देव का आह्वान करें.
कैसे हुई भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति
विश्वकर्मा जी के जन्म को लेकर अलग-अलग कहानियां हैं. एक कहानी के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म थे जिनकी पत्नी का नाम वस्तु था. वस्तु के सातवें पुत्र थे वास्तु, जो शिल्प शास्त्र के आदी थे. उन्हीं वासुदेव की अंगीरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ था. वहीं स्कंद पुराण में बताया जाता है कि धर्म ऋषि के आठवें पुत्र प्रभास का विवाह गुरु बृहस्पति की बहन भुवना ब्रह्मवादिनी के साथ हुआ था. ब्रह्मवादिनी ही विश्वकर्मा जी की मां थीं. इसके अलावा वराह पुराण में इस बात का उल्लेख है कि सब लोगों के उपकारार्थ ब्रह्मा परमेश्वर ने बुद्धि से विचारक विश्वकर्मा को पृथ्वी पर उत्पन्न किया था.