सावन का महीना शुरू हो चुका है. घर से लेकर शिवायलों तक हर हर महादेव की गूंज सुनाई देगी. सावन का महीना देवों के देव महादेव की कृपा प्राप्ति का श्रेष्ट माह माना जाता है. इस बार सावन का महीना 25 जुलाई दिन रविवार से शुरू हो चुका है. इसका समापन 22 अगस्त दिन रविवार को होगा.
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हिंदू धर्म में सावन के महीने का बहुत महत्व है. माना जाता है कि इस महीने काल सर्प दोष, राहु-केतु संबंधी दोष आदि सभी ग्रह दोषों को शांत करने के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं. आइए जानते हैं ज्योतिर्विद दिवाकर त्रिपाठी से कि क्या है सावन के महीने की महिमा. आखिर क्यों ये महीना ग्रह दोषों को शांत करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है.
क्यों कहते इसे श्रावण मास- भगवान शिव को सावन का महीना बहुत प्रिय है. पौराणिक कथा के अनुसार, सनत कुमार ने भगवान शिव से पूछा कि आपको सावन का महीना क्यों प्रिय है. सनत कुमार की ये बात सुनकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने सनत कुमार से कहा कि आप इस माह के फल को श्रवण (सुनना) चाहते हैं. इसी के आधार पर इस माह का नाम श्रावण पड़ा. इसके अलावा, पूर्णिमा तिथि में श्रवण नक्षत्र का संयोग बनता है. इसलिए भी इसे श्रावण मास कहा जाता है.
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ज्योतिर्विद दिवाकर त्रिपाठी कहते हैं कि सावन के महीने में प्रत्येक दिन एक व्रत और अनुष्ठान होता है. कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि तक कोई ना कोई व्रत और अनुष्ठान जरूर होता है. इस महीने में पूजा-पाठ, यज्ञ और अनुष्ठान करने से जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और ग्रह दोष समाप्त होते हैं.
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इस महीने में चारों आश्रमों के लोग अपने-अपने तरीके से पूजा-अनुष्ठान कर सकते हैं. ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम के लोग अपने तरीके से पूरे विधि-विधान के साथ भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं.
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ज्योतिर्विद दिवाकर त्रिपाठी बताते हैं कि जब भगवान शिव कल्याण रूप में होते हैं तो उन्हें 'शिव' कहा जाता है. वहीं जब वे पाप समूह का नाश करने के रूप में होते हैं तो उन्हें 'हर' कहते हैं. अर्थात जब भगवान शिव व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता को दूर कर उसके पाप दोष को समाप्त करते हैं तो उन्हें 'हर' कहा जाता है. इसलिए सावन के महीने में हर हर महादेव के जयकारे लगाए जाते हैं. ऐसा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है.
सावन के महीने में कांवड़िए भी कांवर ले जाते हुए हर हर महादेव के जयकारे लगाते हैं और शिवलिंग पर जल अभिषेक कर लाभ प्राप्त करते हैं.
सावन के महीने में महदेव को बेलपत्र, धतूरा, भांग और जल अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा है. कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला, तो ये विष चारों ओर फैलने लगा. पूरी सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया. इसलिए महादेव को नीलकंठ भी कहा जाता है.
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विष के प्रभाव से भगवान शिव के शरीर में ताप बढ़ने लगा और उनका मस्तक गर्म होने लगा. इसके कारण आसपास का वातावरण जलने लगा. तब देवी-देवताओं ने भगवान शिव को बेलपत्र आदि अर्पित किया और जल से स्नान करवाया गया. इसके बाद भगवान शिव के शरीर में उत्पन्न गर्मी शांत होने लगी. तभी से भगवान पर बेलपत्र आदि चढ़ाने और जल अभिषेक की परंपरा चल आ रही है.