scorecardresearch
 

अयोध्या पर आया फैसला, जानिए मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को लेकर क्या है विवाद?

मथुरा की अदालत में याचिका दायर की गई है जिसमें श्री कृष्ण की जन्मभूमि मुक्त कराने की मांग की गई है. याचिका में मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर 1968 में हुए समझौते को गलत बताया गया है और इस समझौते को रद्द करने की बात कही गई है.

Advertisement
X
श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर विवाद
श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर विवाद
स्टोरी हाइलाइट्स
  • श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर विवाद
  • मथुरा की अदालत में याचिका दायर
  • 1968 का समझौता रद्द करने की मांग

सदियों से चले आ रहे राम जन्म भूमि विवाद का फैसला होने के बाद अब देश में नया विवाद जन्म लेता नज़र आ रहा है. अयोध्या में रामलला के बाद अब मथुरा में श्रीकृष्ण विराजमान ने भी अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया है. मथुरा की अदालत में एक सिविल मुकदमा दायर कर श्री कृष्ण विराजमान ने अपनी जन्मभूमि मुक्त कराने की गुहार लगाई है. ये वाद भगवान श्रीकृष्ण विराजमान, कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर की ओर से उनकी अंतरंग सखी के रूप में अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री, विष्णु शंकर जैन और पांच अन्य लोगों ने दाखिल किया है. तो चलिए आज आपको विस्तार से बताते हैं कि इस मुकदमे के ज़रिए क्या मांग की जा रही है और साथ ही इतिहास को टटोलने की कोशिश करेंगे और बात करेंगे कि ये विवाद आखिर है.

Advertisement

सबसे पहले बात करते हैं मुकदमे की

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ भूमि के स्वामित्व और शाही ईदगाह को हटाने की मांग को लेकर सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में एक वाद दायर किया गया है. इस याचिका में ज़मीन को लेकर 1968 में हुए समझौते को ग़लत बताया गया है और इस समझौते को रद्द करने की बात कही गई है. याचिकाकर्ताओं में से एक वकील विष्णु शंकर जैन के आजतक पर दिए एक बयान की मानें तो 1968 का समझौता ग़लत था और उसे Evidence Act के सेक्शन 44 के तहत चैलेंज किया है. विष्णु जैन का ये भी कहना है कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ भूमि जो राजा पटनीमल ने 1815 में खरीदी थी उनके पास इस भूमि खरीद के डॉक्युमेंट हैं. इस याचिका में इतिहासकार जदुनाथ सरकार और इटालियन ट्रैवलर निकोला मानुची का भी ज़िक्र किया गया है जो इस बात की ओर इशारा करते हैं जन्मस्थान पर कटरा केशव देव में एक कृष्ण मंदिर मौजूद था और इसे जनवरी / फरवरी 1670 में मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था. हालांकि इस याचिका को लेकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान संस्थान ट्रस्ट का कहना है कि इस केस से उनका कोई लेना देना नहीं है.

Advertisement

1968 का समझौता आखिर है क्या? 
 
मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद कृष्ण जन्मभूमि से सटी हुई है. 1935 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के हिंदू राजा को उस ज़मीन के कानूनी अधिकार सौंप दिए थे जिस पर मस्जिद खड़ी थी. 7 फरवरी 1944 को जुगल किशोर बिरला ने मदन मोहन मालवीय के कहने पर कटरा केशव देव की ज़मीन राजा पटनीमल के वंशजों से खरीद ली. 1951 में यह तय हुआ कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और ट्रस्ट उसका प्रबंधन करेगा. लेकिन ट्रस्ट की स्थापना से पहले ही मुथार के मस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने 1945 में एक रिट दायर कर दी थी जिसका फैसला साल 1953 में आया और उसके बाद ही मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो सका जो फरवरी 1982 में जाकर पूरा हुआ.

इसी दौरान साल 1964 में इस संस्था ने पूरी जमीन पर नियंत्रण के लिए एक सिविल केस दायर किया, लेकिन 1968 में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ समझौता कर लिया. इस समझौते के बाद मुस्लिम पक्ष ने मंदिर के लिए अपने कब्ज़े की कुछ जगह छोड़ी और इसके बदले में मुस्लिम पक्ष को पास की जगह दे दी गई. बस यही वो समझौता जिसके खिलाफ ये याचिका दायर की गई है. जिसमें कहा गया है कि मस्जिद की ज़मीन श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट के नाम पर है. इससे पहले भी इसी समझौते को कैंसिल करने के लिए मथुरा के सिविल जज की अदालत में एक याचिका दायर की जा चुकी है जिसे 20 जुलाई 1973 को दोनों पक्षों में हुए समझौते के आधार पर बंद कर दिया गया था.  
 
हालांकि इस याचिका को लेकर मथुरा के पुजारी ही भड़के हुए हैं. अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा की ओर से अदालत में याचिका दायर किए जाने को गलत बताया गया है. महासभा के प्रमुख महेश पाठक का कहना है कि कुछ बाहरी लोग मथुरा की शांति को भंग करना चाहते हैं. उन्होंने भी 1968 में हुए फैसले को ही सही बताया है.

Advertisement

सियासी गलियारों की हलचल 

अब मामला धर्म का है तो सियासी गलियारों में इसकी चर्चा होनी तो लाज़िमी थी. आज से 30 साल पहले अयोध्या आंदोलन के दौरान एक नारा लगा करता था अभी तो पहली झांकी है मथुरा काशी बाकी है. अब इस नारे को लेकर ये सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस मामले में कहीं RSS या BJP का हाथ तो नहीं. इस मामले में यूपी सरकार के मंत्री श्रीकांत शर्मा ने भी बयान दिया, उन्होंने कहा कि हर किसी को अपने धर्म का अनुसरण करने की छूट है. केस दर्ज होने पर उन्होंने कहा कि उसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, देश में लोकतंत्र है और कोई भी केस दायर कर सकता है.

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जनवरी में संघ के एक जिज्ञासा सत्र में ये बात साफ की थी कि काशी मथुरा फिलहाल संघ के एजेंडा में नहीं है. उधर असदउद्दीन औवैसी ने भी ट्वीट किया, 'शाही ईदगाह ट्र्रस्ट और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने इस विवाद का निपटारा साल 1968 में ही कर लिया था. इसे अब फिर से जीवित क्यों किया जा रहा है? हालांकि श्रीकृष्ण जन्मस्थान से जुड़ी इस याचिका के लिए Place of worship Act 1991 रास्ते का रोड़ा बन सकता है. इस ऐक्ट के मुताबिक, आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस संप्रदाय का था, उसी का रहेगा. इस ऐक्ट के तहत सिर्फ रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को छूट दी गई थी.

Advertisement

 

 

Advertisement
Advertisement