गणेश चतुर्थी पर आज नए संसद भवन का शुभारंभ हुआ है. साथ ही संसद का विशेष सत्र भी चल रहा है. संसद सत्र का आज दूसरा दिन है. संसद के विशेष सत्र में सोमवार को महिला आरक्षण बिल को भी मंजूरी मिल गई. नए संसद के विशेष सत्र में आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कहा, "यह समय अतीत की हर कड़वाहट को भुलाने का समय है. उन्होंने कहा कि मेरी तरफ से सभी को मिच्छामी दुक्कड़म. " लेकिन, पीएम नरेंद्र मोदी ने मिच्छामी दुक्कड़म शब्द का इस्तेमाल क्यों किया और क्या है मिच्छामी दुक्कड़म शब्द का अर्थ. चलिए जानते हैं.
क्या है मिच्छामी दुक्कड़म?
दरअसल, आज जैन धर्म का संवत्सरी पर्व है, जिसका दूसरा नाम क्षमा वाणिका पर्व भी है. इस क्षमा वाणिका पर " मिच्छामी दुक्कड़म " कहकर सभी से माफी मांगी जाती है. जैन धर्म के मुताबिक, मिच्छामी का अर्थ क्षमा करने से और दुक्कड़म का अर्थ गलतियों से है. इसका मतलब होता है कि मेरे द्वारा जाने-अनजाने में की गई गतलियों के लिए मुझे क्षमा करें.
जैन धर्म का पर्युषण पर्व- मिच्छामी दुक्कड़म
जैन संप्रदाय के लोग श्वेतांबर भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी और दिगंबर भाद्रपद शुक्ल की पंचमी से चतुर्दशी तक पर्यूषण पर्व मनाते हैं. इस पर्व के समापन के दौरान लोग एक दूसरे को मिच्छामी दुक्कड़म कहते हैं. जैन धर्म की परंपरा के अनुसार, पर्यूषण पर्व के आखिरी दिन क्षमावाणी दिवस यानी मैत्री दिवस पर सभी लोग आपस में एक दूसरे से मिच्छामी दुक्कड़ कहकर माफी मांगते हैं. साथ ही यह भी कहते हैं कि अगर मुझसे कोई भूल हुई हो तो उसके लिए मैं दिल से माफी मांगता हूं. "मिच्छामि दुक्कड़म" शब्द का प्रयोग पर्यूषण पर्व के दिन का करना बेहद शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है.
जैन धर्म को एक दूसरे से जोड़ता है ये शब्द
जैन धर्म की मान्यता है, कि इस दिन सभी लोग एक दूसरे से "मिच्छामी दुक्कड़म" इसलिए कहते हैं कि अनजाने में कभी भी किसी व्यक्ति के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति को गलत कहा हो तो उसकी माफी मांग ली जाए. ऐसे में यदि इस खास दिवस के अवसर पर एक दूसरे से क्षमा याचना यदि हम मांग लें, तो हमारे द्वारा की गई सभी गलतियों से मुक्ति मिल जाती है.
जैन धर्म में लोग का कहना है, कि हम कभी ना कभी जाने अनजाने में किसी अन्य व्यक्ति को दुखी कर देते हैं. ऐसे में यदि हम उस व्यक्ति के समक्ष जाकर "मिच्छामी दुक्कड़म" बोल दें तो सारी कड़वाहट मिठास में परिवर्तित हो जाती है और रिश्तों में एक नया भाव भी उत्पन्न होने लगता है. किसी पर्व के दिन किसी कार्य को करना अनिवार्य होता है, तो ठीक उसी प्रकार से पर्यूषण पर्व के दिन "मिच्छामि दुक्कड़म" कहने का अपना एक अलग ही महत्व है.