महाभारत कालीन महात्मा विदुर बहुत ज्ञानी महापुरुष माने जाते हैं. उन्होंने राजधर्म और धर्मनीति का बड़ा ही व्यवहारिक विवेचन किया है. उनकी नीतियां आज भी प्रासंगिक हैं. महात्मा विदुर की नीतियां भारतीय दर्शन, अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष पर आधारित हैं. महात्मा अपने नीति शास्त्र (Vidur Niti) में बताते हैं कि कैसे एक बुद्धिमान व्यकित असफल होने पर भी चिंता नहीं करते और उनकी सफलता का मार्ग क्या व कैसा होना चाहिए. आइए जानते हैं इसके बारे में...
तथैव योगविहितं यत्तु कर्म न सिध्यति ।
उपाययुक्तं मेधावी न तत्र गल्पयेन्मनः ।।
इस श्लोक में महात्मा विदुर का कहना है कि किसी भी कार्य को करने लिए हमेशा अच्छे और सात्विक प्रयास करने चाहिए. इसके बाद भी अगर कार्य सिद्ध भी न हो तो व्यक्ति को किसी तरह का शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि उस कार्य को करने में सद्प्रयास के बाद भी आप विफल रहे लेकिन आप किसी भी विपत्ति में नहीं पड़े और यह कम श्रेयस्कर नहीं है.
इसके विपरीत अगर आप गलत तरीके से कार्य करना चाहते तो हो सकता था आप भटक जाते और नई मुसीबत में फंस जाते. महात्मा विदुर की नीतियों को दूसरे ढंग से कथा के रूप में समझते हैं...
एक अधिकारी भाई अपनी बहन की शादी धूमधाम से करने के लिए भ्रष्टाचार करता है, बहन की शादी तो हो जाती है परंतु उसका भ्रष्टाचार खुल जाता है और उसकी नौकरी छूट जाती है. यहां अधिकारी भाई की नीयत ठीक है, लेकिन उस कार्य को करने के लिए उसके द्वारा अपनाया गया तरीका गलत है.
इसके विपरीत अगर वह अधिकारी भाई अपनी बहन की शादी अपनी आय के अनुसार थोड़े कम सम्पन्न वर से करता या हो सकता है उसके द्वारा उस समय अपने बहन की शादी न कर पाना भी श्रेष्ठ होता, क्योंकि बाद में वह अपनी क्षमता के अनुसार अपनी बहन की धूमधाम से शादी कर सकता था.
देखने में यदि बहन का विवाह न लगे तो यह कार्य सिद्ध नहीं माना जाएगा, लेकिन विदुर कहते हैं कि बुद्धिमानी इसी में है कि अच्छे मन से और अच्छे तरीकों से कार्य करने का प्रयास करना चाहिए अगर कार्य सिद्ध न हो तो उस पर मन में कोई ग्लानि नहीं करनी चाहिए. वह कार्य बाद में भी सिद्ध हो जाएगा.