रंग बदलता है कश्मीर के खीर भवानी मंदिर का कुंड, जानें खासियत
सुमित कुमार/aajtak.in
10 जून 2019,
अपडेटेड 5:01 PM IST
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खीर भवानी मंदिर में सोमवार को होने वाले वार्षिक महोत्वस के लिए कई प्रवासी कश्मीरी पंडित यहां पहुंच चुके हैं. उत्तरी कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित तुलमुल गांव में स्थित माता राग्नी का खीर भवानी मंदिर कश्मीरी पंडितों के लिए आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है. आइए आपको इस धार्मिक स्थल के इतिहास और विशेषता के बारे में बताते हैं.
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खीर भवानी मेला कश्मीरी पंडितों का सालाना त्योहार है. ऐसा कहा जाता है कि रावण के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर मां राज्ञा माता (क्षीर भवानी या राग्याना देवी) प्रकट हुई थीं. इसके बाद रावण ने उनकी स्थापना कुलदेवी के रूप में करवाई. हालांकि कुछ समय बाद रावण के व्यवहार और बुरे कर्म के चलते देवी नाराज हो गईं और रावण की नगरी छोड़कर चली गईं.
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इसके बाद भगवान राम ने जब रावण का वध किया तो राम ने हनुमान से कहा कि वह राग्याना देवी की स्थापना किसी उपयुक्त स्थान पर करवाएं. इसके बाद हनुमान की मदद से कश्मीर के तुलमुल में देवी की स्थापना की गई.
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इस मंदिर का निर्माण 1912 में महाराजा प्रताप सिंह ने कराया था. इसके बाद महाराज हरी सिंह ने इशका जीर्णोद्वार कराया. कश्मीर में अमरनाथ गुफा के बाद इसे दूसरा सबसे पवित्र स्थान माना जाता है. 1989 में आतंकी घटनाओं से वहां के कश्मीरी पण्डित विस्थापित हो गए थे.
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हालांकि साल 2007 के बाद श्रद्धालु फिर से इसी मूल मंदिर में आने लगे. ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में एक कश्मीरी पुरोहित को माता ने सपने में बताया कि उनके मंदिर का नाम खीर भवानी ही रखें. शायद इसी वजह से हर साल पूजा से पहले मंदिर के कुंड में दूध और खीर की भेंट चढ़ाई जाती है.
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इस विचार से यहां के मुसलमान और पंडित दोनों सहमत हैं. यहां के मुस्लिमों का मानना है कि, ये हमारे लिए तीर्थ है, हमारी मुराद पूरी होती है.