सांसारिक भोगों में एक विचित्र आकर्षण होता है. यही कारण है कि वे मनुष्य को सहज ही अपनी ओर खींच लेते हैं, किन्तु इससे भी अद्भुत बात यह है कि यह जितनी ही अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं, मनुष्य का आकर्षण उतना ही उनकी ओर बढ़ता जाता है और शीघ्र ही वह दिन आ जाता है, जब मनुष्य इनमें डूब कर नष्ट हो जाता है.
संयम मनुष्य की शोभा ही नहीं, शक्ति भी है. अपनी इस शक्ति के सहारे उसे
अपनी रक्षा करनी चाहिए. इस प्रकार सस्ते में उसका अंत कर डालना न उचित है, न
कल्याणकारी. कठिन साधनाएं न करने पर भी जो वीर्य (स्पर्म) को अखण्ड रख लेते हैं, वे
अपने अन्दर शक्ति का अक्षय भण्डार अनुभव करते हैं और कुछ भी कर सकने की
क्षमता रखते हैं. जीवन में कुछ अच्छा और बड़ा करना चाहते हैं तो आपको अपनी इस ताकत को बचाकर रखना होगा.
भारत के आध्यात्मिक गुरु ओशो ने कहा था, ब्रह्माचर्य सेक्सुअलिटी का विरोध नहीं है, बल्कि इसका ट्रांसफॉर्मेशन है. यौन ऊर्जा का अधोगमन है, नीचे की तरफ बह जाना है, ब्रह्मचर्य ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन है, ऊपर की तरफ उठ जाना है.
अगर पवित्र विचारों के जरिए सेक्सुअल एनर्जी को ओजस या आध्यात्मिक ऊर्जा
में बदल लिया जाए तो इसे सेक्ससबलीमेशन कहा जाता है. यह किसी तरह का दमन
नहीं है बल्कि एक सकारात्मक और स्थानांतरण की प्रक्रिया है. यौन ऊर्जा पर
अपना नियंत्रण स्थापित करके इसे संचित करके दूसरी तरफ मोड़ देना है.
धीरे-धीरे आप इसे ओजस शक्ति में भी तब्दील कर लेंगे. जैसे ऊष्मा प्रकाश और
विद्युत में परिवर्तित कर ली जाती है वैसे ही भौतिक ऊर्जा को आध्यात्मिक
ऊर्जा में बदला जा सकता है. रासायनिक पदार्थों में होने वाले परिवर्तनों की तरह सेक्सुअल पावर को साधना
के जरिए आध्यात्मिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है.
इस प्रक्रिया से गुजरते हुए आत्मा के स्तर को ऊपर उठाना, शुद्ध विचारों की तरफ बढ़कर यौन ऊर्जा को ओजस शक्ति में परिवर्तित होकर दिमाग में संचित होती जाती है. इस संचित ऊर्जा को आप बड़े से बड़े कामों में लगा सकते हैं. अगर आपको बहुत क्रोध आता है या आपके पास शारीरिक बल ज्यादा है तो उसे भी ओजस शक्ति में ट्रांसफॉर्म किया जा सकता है. जिसके दिमाग में ओजस शक्ति संचित हुई रहती है, उसकी मानसिक ताकत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. वह बहुत ही बुद्धिमान हो जाता है. उसके चेहरे के पास एक दैवीय तेज झलकने लगता है. वह कुछ शब्द बोलकर ही दूसरों पर अपना प्रभाव छोड़ सकता है. उसका व्यक्तित्व फिर सामान्य नहीं रह जाता है, वह आसाधारण हो जाता है.
शंकराचार्य, ईसा मसीह आदि महापुरुष जीवन भर ब्रह्मचारी रहे. ऊँचे उठे हुए बुद्धिजीवी लोग अधिकतर संयमी जीवन ही बिताने की चेष्टा किया करते हैं. वैज्ञानिक, दार्शनिक, विचारक, सुधारक तथा ऐसी ही उच्च चेतना वाले लोग संयम का ही जीवन जीते दृष्टिगोचर होते हैं. संयम से तात्पर्य मात्र शारीरिक ही नहीं, मानसिक व आध्यात्मिक ब्रह्मचर्य से भी है.
यह एक सत्य है कि भोगों की अधिकता मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार की शक्तियों का नुकसान कर देती है. यह रोग युवावस्था में ही अधिक लगता है. यद्यपि उठती आयु में शारीरिक शक्ति ज्यादा होती है, साथ ही कुछ-न-कुछ जीवन तत्व का नव निर्माण होता रहता है. इसलिए उसका बुरा असर शीघ्र नहीं दिखलाई पड़ता; लेकिन युवावस्था के ढलते ही इसके बुरे परिणाम सामने आने लगते हैं.
युवा कई तरह की कमजोरियों के शिकार बन जाते हैं. थोड़ी आयु और ढलने पर
सहारा खोजने लगते हैं. इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और जीवन एक भार बन
जाता है. शरीर का तत्व वीर्य जो कि मनुष्य की शक्ति और वास्तविक जीवन कहा
गया है, का अपव्यय होता चला जाता है, जिससे सारा शरीर एकदम खोखला हो जाता
है. तमाम सिद्धहस्तों ने इसी वीर्य की ताकत का संचय कर बड़े-बड़े चमत्कार किए हैं. इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है कि हमारी अधिकतर ऊर्जा यौन ऊर्जा में संचित होती है. दृढ़ इच्छा शक्ति के जरिए हम अपनी यौन ऊर्जा को अद्भुत क्रिएटिविटी में तब्दील कर सकते हैं. इस प्रक्रिया को अपने जीवन में उतारने वाले कई विश्वप्रसिद्ध हस्तियों के उदाहरण हैं, जैसे- निकोलस टेस्ला, महात्मा गांधी, रिचर्ड वेंगर, दान्ते, होमर, हेनरी थोरू और लियोनार्डो द विन्सी.
विदेशी प्रचारकों ने भी इसकी कम प्रशंसा नहीं की है. प्रसिद्ध प्राणी विज्ञानी डॉ. बोनहार्ड ने अपनी पुस्तक 'सेलिबेसी एण्ड रिहेबिलिटेश' में लिखा, 'ब्रह्मचारी यह नहीं जानता कि व्याधिग्रस्त दिन कैसा होता है. उसकी पाचन शक्ति सदा नियंत्रित रहती है और उसको वृद्धावस्था में भी बाल्यावस्था जैसा आनन्द आता है.' अमेरिकी प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. बेनीडिक्ट लुस्टा ने अपनी पुस्तक 'नेचुरल लाइफ' में कहा है कि जितने अंशों तक जो मनुष्य ब्रह्मचर्य की विशेष रूप से रक्षा और प्राकृतिक जीवन का अनुसरण करता है, उतने अंशों तक वह विशेष महत्व का कार्य कर सकता है.
स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे कि जैसे दीपक का तेल बत्ती के ऊपर चढ़कर
प्रकाश के रूप में परिणत होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अंदर का वीर्य
तत्व सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान दीप्ति में
परिवर्तित हो जाता है. रेतस का जो तत्व रति (काम, यौन संबंध) बनाने के समय काम में लगता है,
जितेन्द्रिय होने पर वही तत्व, प्राण, मन और शरीर की शक्तियों को पोषण देने
वाले एक दूसरे ही तत्व में बदल जाता है.
आधुनिक विज्ञान इतना विकसित हो जाने पर भी वीर्य की उत्पत्ति का कोई सिद्धान्त निश्चित नहीं कर पाया है. सामान्य रासायनिक रचना के अतिरिक्त उन्हें इतना ही पता है कि वीर्य का एक कोश (स्पर्म) स्त्री के डिम्ब (ओवम्) से मिल जाता है. यही वीर्य कोश पुनः उत्पादन आरंभ कर देता है और अपनी तरह तमाम कोश माँ से प्राप्त आहार द्वारा कोशिका विभाजन-प्रक्रिया के अनुसार विभक्त होता चला जाता है. कहना न होगा कि वीर्य का सूक्ष्मतम स्प चेतना का एक अति सूक्ष्म अंश है. इनकी लम्बाई 1/1600 से 1/1700 इंच तक होती है, जिसमें न केवल मनुष्य शरीर, वरन् विराट विश्व के शक्ति बीज छिपे होते हैं. सृष्टि को बहुगुणित बनाने की व्यवस्था भी इन्हीं बीजों में निहित होती है. उसकी शक्ति का अनुमान किया जाना कठिन है.
भ्रूण काल के निर्माण के बाद शिशु जब विकसित होना प्रारम्भ करता है, तो ओजस उसके मस्तिष्क में ही संचित होता है. यही कारण है कि गर्भ में सन्तान का सिर नीचे की ओर होता है. जन्म के समय 10 रत्ती वीर्य बालक के ललाट में होता है. शास्त्रों के अनुसार नौ से बारह वर्ष तक वीर्य शक्ति भौंहों से उतर कर कण्ठ में आ जाती है. प्रायः इसी समय बच्चे के स्वर में सुरीलापन आता है. इससे ठीक पूर्व दोनों की ध्वनि एक जैसी होती है. 12 से 16 वर्ष तक की आयु में वीर्य मेरुदण्ड से उपस्थ की ओर बढ़ता है और धीरे-धीरे मूलाधार चक्र में अपना स्थायी स्थान बना लेता है.
काम विकार पहले मन में आता है, उसके बाद तुरन्त ही मूलाधार चक्र उत्तेजित
हो उठता है और उसके उत्तेजित होने से वह सारा ही क्षेत्र जिसमें कि
कामेन्द्रिय भी सम्मिलित होती है, उत्तेजित हो उठती है, ऐसी स्थिति में
ब्रह्मचर्य की संभावना कठिन हो जाती है. 24 वर्ष तक की आयु में यह शक्ति
मूलाधार चक्र में से समस्त शरीर में किस प्रकार व्याप्त हो जाती है इसका
उल्लेख करते हुए शास्त्रकार कहते हैं कि जिस प्रकार दूध में घी, तिल में
तेल, ईख में मीठापन तथा काष्ठ में अग्नि तत्व सर्वत्र विद्यमान रहता है,
उसी प्रकार वीर्य सारी काया में व्याप्त रहता है.
यदि 25 वर्ष की आयु तक आहार-विहार को दूषित नहीं होने दिया जाय और ब्रह्मचर्यपूर्वक रहा जाय तो इस आयु में शक्ति की मस्ती और विचारों की उत्फुल्लता देखते ही बनती है. ऐसे बच्चे प्रायः जीवन भर स्वस्थ रहते हैं एवं इस प्रकार रेतस का रचना-पचना प्रायः हर क्षेत्र में उत्साह और सफलता के रूप में सामने आता है.
ऊर्ध्वरेता बनना अर्थात् जीवन को, ओज को अपने उद्गम स्थल ललाट में लाना, जहाँ से वह मूलाधार तक आया था, योग विद्या का काम है. कुण्डलिनी साधना में विभिन्न प्राणायाम साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को प्रज्ज्वलित कर इसी वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है, तब फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरु दण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है. साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचाता है. शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहस्रार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है.