Holika Dahan 2024: होलिका दहन की लपटें बहुत शुभकारी होती हैं. होलिका दहन की अग्नि में हर चिंता खाक हो जाती है, दुखों का नाश हो जाता है और इच्छाओं को पूर्ण होने का वरदान मिलता है. बुराई पर अच्छाई की जीत के इस पर्व में जितना महत्व रंगों का है उतना ही होलिका दहन का भी है. ये मान्यता है कि विधि विधान से होलिका पूजा और दहन करने से मुश्किलों को खत्म होते देर नहीं लगती.
होलिका दहन पौराणिक कथा
हिंदू पुराणों के अनुसार, हिरण्यकशिपु नाम का एक राजा, कई असुरों की तरह, अमर होने की कामना करता था. इस इच्छा को पूरा करने के लिए, उन्होंने ब्रह्मा जी से वरदान पाने के लिए कठोर तपस्या की. प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने हिरण्यकशिपु को वरदान स्वरूप उसकी पांच इच्छाओं को पूरा किया: कि वह ब्रह्मा द्वारा बनाए गए किसी भी प्राणी के हाथों नहीं मरेगा, कि वह दिन या रात, किसी भी हथियार से, पृथ्वी पर या आकाश में, अंदर या बाहर नष्ट नहीं होगा, पुरुषों या जानवरों, देवों या असुरों द्वारा नहीं मरेगा, वह अप्रतिम हो, कि उसके पास कभी न खत्म होने वाली शक्ति हो, और वह सारी सृष्टि का एकमात्र शासक हो.
वरदान प्राप्ति के बाद हिरण्यकशिपु ने अजेय महसूस किया. जिस किसी ने भी उसके वर्चस्व पर आपत्ति जताई, उसने उन सभी को दंडित किया और मार डाला. हिरण्यकशिपु का एक पुत्र था प्रह्लाद. प्रह्लाद ने अपने पिता को एक देवता के रूप में पूजने से इनकार कर दिया. उसने विष्णु में विश्वास करना और उनकी पूजा करना जारी रखा.
प्रह्लाद की भगवान विष्णु के प्रति आस्था ने हिरण्यकशिपु को क्रोधित कर दिया, और उसने प्रह्लाद को मारने के लिए कई प्रयास किए, जिनमें से सभी असफल रहे. इन्हीं प्रयासों में, एक बार, राजा हिरण्यकशिपु की बहन होलिका ने प्रह्लाद को मारने के लिए अपने भाई का साथ दिया. विष्णु पुराण के अनुसार, होलिका को ब्रह्माजी से वरदान में ऐसा वस्त्र मिला था जो कभी आग से जल नहीं सकता था. बस होलिका उसी वस्त्र को ओढ़कर प्रह्लाद को जलाने के लिए आग में आकर बैठ गई. जैसे ही प्रह्लाद ने भगवान विष्णु के नाम का जाप किया, होलिका का अग्निरोधक वस्त्र प्रह्लाद के ऊपर आ गया और वह बच गया, जबकि होलिका भस्म हो गई थी.
मान्यता है, कि तब से ही बुराई पर अच्छाई की जीत के उत्साह स्वरूप सदियों से हर वर्ष होलिका दहन मनाया जाता है. होलिका दहन की कथा पाप पर धर्म की विजय का प्रतीक है.
अन्य कथा
एक और कथा राक्षसी धुंधी की है. रघु राज्य की राक्षसी धुंधी भोले-भाले लोगों और विशेष रूप से छोटे बच्चों को परेशान करती थी. धुंधी को भगवान शिव का वरदान था कि वह देवताओं, पुरुषों द्वारा नहीं मारी जाएगी और न ही गर्मी, सर्दी या बारिश से या किसी भी शस्त्र से पीड़ित होगी. इन आशीर्वादों ने उसे लगभग अजेय बना दिया लेकिन उसमें एक कमजोर बिंदु भी था. उसे भगवान शिव ने भी श्राप दिया था कि वह चंचल लड़कों से खतरे में होगी जो उसे परेशान करेंगे.
राजा ने पुजारी से परामर्श किया, उन्होंने बताया कि फाल्गुन को शीत ऋतु समाप्त हो जाती है और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ हो जाता है. धुंधी को दूर भगाने के लिए यह उपयुक्त समय होगा. समय आने पर गांव के साहसी लड़कों ने उससे हमेशा के लिए छुटकारा पाने और उसे गांव से भगाने का फैसला किया. लड़कों ने लकड़ी और घास का ढेर इकट्ठा किया, उसमें मंत्रों से आग लगा दी, ताली बजाई, आग के चारों ओर चक्कर लगाने लगे.
वे भांग के नशे में चूर हो गए और फिर धुंधी के पीछे- पीछे गांव की सीमा तक, नगाड़े बजाते, शोरगुल करते, गाली-गलौज करते रहे और ऐसा तब तक करते रहे जब तक कि धुंधी हमेशा के लिए गांव से बाहर नहीं निकल गई. गालियों की मार ने उसके मन की स्थिति को बर्बाद कर दिया, वह भीतर से कमजोर और असहाय महसूस कर रही थी. यहां पर भी बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में होलिका दहन की प्रथा प्रचलित हुई. आज भी इस मान्यता के सम्मान में लड़के होलिका दहन की रात ढोल नगाड़े बजाते हुए, शोर करते हुए होलिका दहन का पर्व मनाते है.