नवरात्रि के पावन नौ दिनों में हर घर में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना हो रही है. ये नौ स्वरूप एक साथ मिलकर नौदुर्गा कहलाते हैं. मां दुर्गा का स्वरूप इतना व्यापक है कि इसे गिनती में बांध पाना असंभव है. वे स्त्री शक्ति का प्रतीक हैं, जो प्रकृति के हर कण में समाई हैं.
इतना ही नहीं, पुरुषों के पौरुष में जो शक्ति है, उसकी चेतना भी देवी की आत्मिक शक्ति से ही उत्पन्न होती है. पौराणिक कथाएं इसकी साक्षी हैं, और इसका सबसे सुंदर उदाहरण हैं प्रथम पूज्य श्रीगणेश, जिनकी स्त्री शक्ति को विनायकी कहा जाता है. लेकिन विनायकी कौन हैं? क्या वे गणेश का स्त्री अवतार हैं या कोई स्वतंत्र देवी? यह प्रश्न हमें भारतीय मिथकों की गहराई में ले जाता है.
विनायकी देवी, गणेश से अलग या उनका अवतार
हाथी के मुख वाली देवी विनायकी को अक्सर गणेश समझने की भूल हो जाती है. लेकिन प्राचीन मूर्तियों और ग्रंथों में उनका स्त्रीत्व स्पष्ट है. वे षोडश मातृकाओं और 64 योगिनियों में शामिल हैं, जहां उनका 41वां स्थान है. मध्य प्रदेश के गुना में स्थित प्राचीन 64 योगिनी मंदिर उनकी मौजूदगी का साक्षी है. लेकिन विनायकी की पहचान केवल इन सूचियों तक सीमित नहीं है. वे गणेश की शक्ति हैं, जो उनके साथ एक सूत्र में बंधी हैं, फिर भी उनका अपना विशिष्ट अस्तित्व है.
तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में थानुमलायन मंदिर इस रहस्य को और गहरा करता है. यह मंदिर त्रिदेवों, ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित है. इसके प्रांगण में 33 मंदिर हैं, जो 33 कोटि देवताओं का प्रतीक माने जाते हैं. '33 कोटि' का अर्थ विद्वानों में विवाद का विषय है, कुछ इसे 33 प्रकार के देवता मानते हैं, तो कुछ 33 करोड़. इन मंदिरों के बीच एक मंदिर ऐसा है, जहां श्रद्धालु ठहर जाते हैं. यहां सुखासन में विराजमान एक प्रतिमा है, पतला-कोमल शरीर, चार हाथों में कुल्हाड़ी, शंख, आशीर्वाद की मुद्रा और एक पुष्प. चेहरा देखकर पहली नजर में लगता है कि यह गणेश हैं, लेकिन यह विनायकी हैं, गणेशजी का स्त्री स्वरूप.
पौराणिक कथा, अंधक वध में आता है विनायकी का जिक्र
विनायकी का उल्लेख शिवमहापुराण में एक रोमांचक कथा के साथ मिलता है. असुर अंधक ने कैलाश पर आक्रमण किया और देवी पार्वती को अपनी पत्नी बनाने की कोशिश की. शिव ने त्रिशूल से उसका वध किया, लेकिन अंधक के रक्त की हर बूंद से एक नया अंधक जन्म लेने लगा. तब पार्वती ने सभी देवताओं की शक्तियों का आह्वान किया. इस युद्ध में गणेश ने अपनी स्त्री शक्ति विनायकी को प्रकट किया. विनायकी ने अंधक के रक्त को जमीन पर गिरने से रोका, जिससे उसका अंत संभव हुआ. इस कथा में उन्हें गजानिनि भी कहा गया. यह घटना बताती है कि विनायकी गणेश की चेतना का हिस्सा हैं, जो संकट के समय उनकी शक्ति बनकर उभरती हैं.
देवताओं की स्त्री शक्ति, पत्नी या आंतरिक चेतना?
भारतीय मिथकों में हर देवता के साथ उनकी स्त्री शक्ति का वर्णन है. आमतौर पर इन्हें उनकी पत्नियां माना जाता है—विष्णु की लक्ष्मी, शिव की पार्वती, इंद्र की इंद्राणी, वरुण की वारुणी, चंद्र की रोहिणी और सूर्य की छाया. लेकिन एक मत यह भी है कि यह शक्ति उनकी पत्नी नहीं, बल्कि उनकी चेतना का हिस्सा है. जैसे विष्णु की शक्ति योगमाया है, और शिव की शक्ति शिवानी, जिसे पार्वती के रूप में देखा जाता है. इसी तरह, गणेश की पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि हैं, लेकिन उनकी आंतरिक शक्ति विनायकी हैं. यह द्वंद्व विनायकी की पहचान को और रहस्यमयी बनाता है.
थानुमलायन मंदिर में मिलते हैं विनायकी का प्रमाण
1300 साल पुराना थानुमलायन मंदिर विनायकी के स्वरूप को संजोए हुए है. यहां उनकी प्रतिमा गणेश से मिलती-जुलती है, लेकिन उनका स्त्रीत्व स्पष्ट है. वे मादा हाथियों की नेता, विघ्नेश्वरी, गणेश्वरी और गनेशी कहलाती हैं. यह मंदिर इस बात का प्रमाण है कि विनायकी गणेश की तरह विनय, बुद्धि और सिद्धि की देवी हैं. लेकिन लोकप्रियता में वे गणेश की पत्नियों से पीछे रह गईं.
प्राचीन ग्रंथों और मूर्तियों में विनायकी
विनायकी का पहला उल्लेख मत्स्य पुराण (550 ईस्वी) में मिलता है, जहां उन्हें शिव के रूपों में सूचीबद्ध किया गया. धर्म और अध्यात्म पर अपने विचार रखने वाले देवदत्त पटनायक बताते हैं कि विष्णु धर्मोत्तर पुराण और वनदुर्गा उपनिषद भी विनायकी देवी की चर्चा करते हैं. इसके साथ ही उन्हें पार्वती की सखी मालिनी के तौर पर भी देखा जाता है, जिनका मुख गजमुख की तरह था. हो सकता है कि वह भी किसी गण प्रमुख रही होंगी.
राजस्थान के रायगढ़ में पांचवीं शताब्दी की टेराकोटा प्रतिमा, ओडिशा के हीरापुर में नृत्य करती खंडित मूर्ति, और मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के मंदिरों में उनकी दुर्लभ मूर्तियां उनकी प्राचीनता की गवाही देती हैं. शोधकर्ता बालाजी मुंदकुर अपने शोधपत्र "द एनेग्मा ऑफ विनायकी" में कहते हैं कि विनायकी को गणेश जितनी मान्यता नहीं मिली. वे न मानव रूप में पूजी गईं, न ही उन्हें शिव की शक्ति के समकक्ष दर्जा मिला.
विनायकी चतुर्थी में देवी का नाम
हर माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी चतुर्थी कहते हैं. उत्तर भारत में यह व्रत लोकप्रिय है, लेकिन लोग यह नहीं सोचते कि इसे विनायकी चतुर्थी क्यों कहा जाता है, विनायक चतुर्थी क्यों नहीं? यह नाम विनायकी की सूक्ष्म मौजूदगी को दर्शाता है. लेखक पृथ्वी अग्रवाल अपनी किताब "देवी विनायकी: द फीमेल गनेसा" में लिखते हैं कि हीरापुर के चौंसठ योगिनी मंदिर में उनकी नृत्य करती मूर्ति अद्भुत है, हालांकि खंडित होने से यह स्पष्ट नहीं है.
तांत्रिक परंपरा में विनायकी
विनायकी तांत्रिक प्रथाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जहां स्त्री शक्ति को पुरुष से श्रेष्ठ माना जाता है. तंत्र में स्त्री को उत्पादक शक्ति का स्रोत देखा जाता है. कुछ विद्वान मानते हैं कि विनायकी की मूर्तियां पार्वती की सहेली मालिनी की भी हो सकती हैं, जो गणेश की आया थीं और जिनका मुख भी हाथी जैसा था. वैदिक परंपराओं में गणेश को विघ्नहर्ता पुरुष देवता के रूप में पूजा गया, जबकि तांत्रिकों ने विनायकी को उनकी शक्ति माना. यह अंतर भारतीय दर्शन के दो पहलुओं—अमूर्त वैदिक और मूर्त तांत्रिक—को दर्शाता है.
अंधक वध, जिसमें सजी देवियों की रणभूमि
अंधक वध की कथा में पार्वती ने सभी देवताओं की स्त्री शक्तियों को बुलाया. इंद्राणी, वैष्णवी, ब्राह्मणी सहित विनायकी ने अंधक के रक्त को पीकर उसका अंत किया. यह कथा बताती है कि हर देवता की शक्ति उनके स्त्री स्वरूप में भी मौजूद है. विनायकी का यह रूप 16वीं शताब्दी से मूर्तियों में दिखाई देने लगा, जो उनकी प्राचीनता और विकास को दर्शाता है.
विनायकी का अनछुआ पहलू
विनायकी भारतीय संस्कृति के उस अनमोल खजाने का हिस्सा हैं, जिसे समझने के लिए गहराई में जाना जरूरी है. गणेश की पत्नियों—ऋद्धि-सिद्धि—को जितनी प्रसिद्धि मिली, विनायकी उससे वंचित रहीं. फिर भी, ग्रंथों, मूर्तियों और मंदिरों में उनकी मौजूदगी सनातन परंपरा में उनके महत्व को रेखांकित करती है. विनायकी चतुर्थी का नाम और उनकी कथाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या यह खोज अभी अधूरी है, और इसके रहस्यों को खोलने के लिए हमें और कितनी गहराई में उतरना होगा.