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दुष्यंत-शकुंतला, नल-दमयंती, अनिरुद्ध-ऊषा... प्रेम की परिभाषा है इन किरदारों की पौराणिक कथाएं

कई ऐसे पौराणिक चरित्र रहे हैं, जिनकी कथाओं में प्रेम की पराकाष्ठा देखी जा सकती है. इन कहानियों में प्रेम के तप, त्याग, निष्ठा और आत्मसमर्पण के सारे स्वरूप नजर आते हैं. इन पौराणिक चरित्रों में नल-दमयंती, दुष्यंत-शकुंतला, ऊषा-अनिरुद्ध का नाम भी प्रेम के सबसे बड़े उदाहरणों में लिया जाता है.

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पौराणिक कथाओं में शामिल है दिव्य प्रेम
पौराणिक कथाओं में शामिल है दिव्य प्रेम

प्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक ऐसी दिव्य शक्ति है जो आत्मा को विस्तृत और ऊंचे स्तर तक ले जाती है. यह केवल मनुष्य और मनुष्य के बीच नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच का भी सेतु है. भारतीय संस्कृति में प्रेम को सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धि माना गया है. भारतीय पौराणिक और धार्मिक कथाएं तो प्रेम की इस पराकाष्ठा का सुंदर उदाहरण हैं.

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दिव्य है राधा-कृष्ण का प्रेम
यहां राधा-कृष्ण का प्रेम दिव्यता और आत्मसमर्पण जैसे शब्दों के लिए नजीर है तो वहीं, अगर प्रेम की आध्यात्मिक गहराई को समझना हो, तो राधा-कृष्ण का प्रेम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. यह प्रेम किसी सांसारिक बंधन में नहीं बंधा, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक बना. राधा का प्रेम न केवल भक्तिपूर्ण था, बल्कि उसमें सम्पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना थी. यह प्रेम लौकिक और अलौकिक के बीच का पुल बन जाता है, जहां खुद का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और केवल प्रेम ही शेष रह जाता है.

प्रेम

मीरा का प्रेम है आध्यात्मिक
राधा का नाम आता है तो मीरा की याद भी अनायास ही आ जाती है. मीरा का प्रेम भी इस आध्यात्मिक यात्रा का एक प्रमुख उदाहरण है. उन्होंने अपने आराध्य कृष्ण को अपना सब कुछ मान लिया और संसार की हर बाधा को प्रेम के पथ पर न्योछावर कर दिया. उनका प्रेम एक साधारण प्रेम नहीं था, बल्कि आत्मा का परमात्मा में विलय था. मीरा के प्रेम में सामाजिक बंधनों का अतिक्रमण भी देखने को मिलता है, जहाँ उन्होंने समाज की सभी सीमाओं को पार करते हुए केवल अपने आराध्य में ही जीवन का लक्ष्य देखा.

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लेकिन पौराणिक कथाएं सिर्फ इतनी ही नहीं है, बल्कि यहां कई ऐसे पौराणिक चरित्र रहे हैं, जिनके कथाओं में प्रेम की पराकाष्ठा देखी जा सकती है. इन कहानियों में प्रेम के तप, त्याग, निष्ठा और आत्मसमर्पण के सारे स्वरूप नजर आते हैं. इन पौराणिक चरित्रों में नल-दमयंती, दुष्यंत-शकुंतला, ऊषा-अनिरुद्ध का नाम भी प्रेम के सबसे बड़े उदाहरणों में लिया जाता है.

ऊषा और अनिरुद्ध की प्रेम कहानी
भागवत पुराण में जब श्रीकृष्ण के जीवन के प्रसंग क्रमबद्ध तरीके से सुनाए जाते हैं तो कई बार कान उनके जीवन के उत्तरार्ध (अंतिम समय से कुछ पहले) की घटनाओं पर केंद्रित हो जाते हैं. यह वह समय है, जब श्रीकृष्ण भी बेटे-बहू वाले हो चुके हैं. इसी दौरान की उनकी एक कथा है. कृष्ण के समकालीन एक असुर राजा था वाणासुर. उसकी राजधानी शोणितपुर में थी. ऊषा इसी शोणितपुर के राजा वाणासुर की कन्या थी. पार्वती के वरदान से उषा ने स्वप्न में अनिरुद्ध के दर्शन किये और उन पर रीझ गई. ऊषा की मनोदशा जानकर उसकी एक सहेली चित्रलेखा ने चित्र बनाया. चित्रलेखा, सिर्फ हुलिया सुनकर हूबहू वैसा ही चित्र बनाने में माहिर थी और इसके साथ ही वह योग विद्या में भी निपुण थी. 

ऊषा ने हावभाव द्वारा चित्रलेखा के सामने अनिरुद्ध की छवि बनाई, जिसे देखकर ऊषा ने अपना प्रेम सामने रखा. तब चित्रलेखा ने योग बल से द्वारिका जाकर सुप्तावस्था में अनिरुद्ध का अपहरण किया और दोनों का गान्धर्व-विवाह कराकर चार मास तक दोनों को गुप्त स्थान में रखा. वाणासुर को सेवकों के जरिए जब यह रहस्य पता चला तो उसने अनिरुद्ध को पकड़ने के लिए उन्हें भेजा लेकिन अनिरुद्ध से कोई जीत नहीं सका. इस पर वाणासुर ने उन्हें माया युद्ध में पराजित कर बंदी बना लिया. बाद में युद्ध बढ़ा तो श्रीकृष्ण आए और दोनों की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ. इस युद्ध वाणासुर की हार हुई, लेकिन कृष्ण ने उन्हें जीवनदान दिया. सूरदास कृत सूरसागर में इस कथा का पदों के रूप में वर्णन है.

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इसमें श्रीकृष्ण पहले गुप्त तरीके से ऊषा से मिलते हैं और पूछते हैं कि तुमने अनिरुद्ध को बंदी बनाया था, तुमने उसका हरण किया था, ऐसा क्यों किया? तब ऊषा उन्हें सच बताते हुए कहते है कि मैं इन्हें सपने में ही पति मान चुकी थी, इसलिए यह मेरा धर्म है और मेरे धर्म की रक्षा आप कीजिए. ऊषा के प्रेम की इस दृढ़ता को देखकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह युद्ध मैं सिर्फ प्रेम के लिए लड़ूंगा और तुम्हारे लिए करूंगा. भारतीय साहित्य में यह एक अनोखी प्रेम कथा है, जिसे लेकर कई आख्यान रचे गए हैं. 

यह भी पढ़ेंः श्रीकृष्ण, कामदेव और अनंग त्रयोदशी... सनातन में वैलेंटाइन वाले प्रेम को किस नजरिए से देखते हैं ओशो और स्वामी विवेकानंद

प्रेम

महाभारत के वन पर्व में है नल-दमयंती की कथा
इसी तरह महाभारत के वनपर्व में एक और मार्मिक प्रेम कथा का वर्णन मिलता है. वनवास भोग रहे युधिष्ठिर एक दिन अपनी स्थिति को लेकर बहुत दुखी होते हैं और द्रौपदी के साथ ऋषियों का सत्संग करने के दौरान उनसे पूछते हैं, कि हे मुनियों, मुझे बताइए कि क्या मेरे जैसा अभागा कोई और भी इस धरती पर जन्मा है? जिसे भाइयों ने निकाल दिया, राज्य छीन लिया और दर-दर की ठोंकरे खाने के लिए मजबूर कर दिया.

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तब ऋषि कहते हैं कि, हे युधिष्ठिर! शोक न कीजिए. आप तो फिर भी अपने चार भाइयों और पत्नी के साथ इस वन में हैं, लेकिन इतिहास में तो एक ऐसा भी दुर्भाग्य वाला राजा रहा है, जिसने यही सबकुछ अकेले भोगा और तो और उसका अपनी पत्नी से वियोग भी हो गया. फिर वह दोनों तेरह वर्ष के बाद ही मिल सके थे. उस राजा का नाम नल और उसकी प्राणप्रिया पत्नी का नाम दमयंती था
इनकी कथा कुछ ऐसी है. 

निषध देश के राजा वीरसेन के पुत्र नल और विदर्भराज भीम की पुत्री दमयंती ने हंसों से एक-दूसरे की प्रशंसा सुनी तो वह मन ही मन प्रेम करने लगे. नल ने हंस के माध्यम से अपना प्रेम संदेश दमयंती तक पहुंचाया. उधर, दमयंती के पिता ने स्वयंवर रचाया तो इस स्वयंवर में भाग लेने इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम भी आए, जिन्होंने नल का ही रूप धारण कर लिया, लेकिन दमयंती ने अपनी बुद्धिमत्ता से असली नल को पहचाना और विवाह कर लिया. देवता इस विवाह और दमयंती की चतुराई से बहुत प्रसन्न हुए लेकिन कलयुग राजा नल से जलन करने लगा. 

देवताओं ने नल को अनेक वरदान दिए, लेकिन कलियुग ने नल को श्राप देकर जुए में फंसा दिया. एक दिन नल पर कलयुग सवार हुआ और वह अपने चचेरे भाई पुष्कर से जुआ खेलते-खेलते राज्य और धन दोनों ही गंवा बैठे. अब वचन के अनुसार नल और दमयंती को वनवास भोगना था. एक रात नल बहुत दुखी होकर दमयंती को छोड़कर चले गए. दुखी दमयंती अनेक कठिनाइयों के बाद अपने पिता के पास पहुंची.

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उधर, राजा नल को नागराज कर्कोटक ने डंस लिया, लेकिन इससे राजा मरा नहीं, बल्कि उसका रूप बदल गया. इस तरह नल बाहुक नाम से अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के पास गया. दमयंती ने नल को खोजने के लिए एक दूसरा स्वयंवर आयोजित करने का संदेश भिजवाया. ऋतुपर्ण अपने सखा बाहुक (नल) को लेकर विदर्भ पहुंचे, जहां एक बार फिर दमयंती ने उसे पहचानकर वरमाला उसके गले में डाल दी. ऐसा होते ही नल फिर से अपने स्वरूप में वापस आ गया. उसने राजा ऋतुपर्ण से द्यूत कला सीखकर पुष्कर को हराया और वचन के अनुसार अपना राज्य फिर से पा लिया.

अद्भुद क्लासिक है दुष्यंत-शकुंतला की प्रेम कहानी
महाभारत के ही वन पर्व में दुष्यंत और शकुंतला की कथा भी आती है. इनकी प्रेम कथा तो भारतीय चित्रकारों के लिए अनमोल निधि रही है और प्रख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा ने दुष्यंत-शकुंतला के कई चित्र बनाए हैं. महाकवि कालिदास ने इसी पुराण कथा पर आधारित अपना महाकाव्य अभिज्ञान शाकुंतलम् रचा है. मेनका अप्सरा की बेटी शकुंतला भी बेहद रूपवान थी. वह ऋषि कण्व के आश्रम में पली और वहीं बड़ी हुई थी. 

एक दिन हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत शिकार करते हुए ऋषि कण्व के आश्रम तक पहुंच गए, वहां उन्होंने वन में शकुंतला को देखा और उस पर मोहित हो गए. शकुंतला भी राजा दुष्यंत को पसंद करने लगी थीं, इसलिए राजा दुष्यंत ने जब उन्हें विवाह का प्रस्ताव दिया तो शकुंतला ने हामी भर दी. इसके बाद दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया. विवाह के बाद कुछ समय शकुंतला के साथ बिताने के बाद राजा दुष्यंत वापस अपने राज्य हस्तिनापुर लौटने लगे तो उन्होंने दौबारा लौटकर शकुंतला को अपने साथ ले जाने का वचन दिया और निशानी के रूप में अपनी राज मुद्रिका शकुंतला की उंगली में पहना दी.

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एक दिन कण्व ऋषि के आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे, शकुंतला वहीं द्वार पर बैठी हुई दुष्यंत की यादों में खोई हुई थीं, इस कारण ऋषि का सत्कार नहीं कर पाई. ऋषि को लगा कि शकुंतला उनका अपमान कर रही हैं और उसी क्षण ऋषि ने शकुंतला को श्राप दिया कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया है, वह तुम्हें भूल जाएगा. यह सुनकर शकुंतला का ध्यान टूटा तो उन्होंने ऋषि से क्षमा मांगी, जिसके बाद ऋषि ने शकुंतला के उपाय बताया कि उसका दिया कोई प्रतीक चिन्ह होगा, जिसे देखकर उसे तू याद आ जाएगी और यह कहकर ऋषि वहां से चले गए.

जब ऋषि तीर्थ यात्रा से वापस लौटे तब शकुंतला ने उन्हें पूरा वृतांत सुनाया, जिसके बाद ऋषि ने अपने शिष्यों के साथ शकुंतला को हस्तिनापुर भेज दिया, रास्ते में प्यास लगी और जल पीते वक्त अंगूठी पानी में गिर गई जिसे मछली ने निगल लिया. उसके बाद शकुंतला जब राजा दुष्यंत के दरबार में पहुंचीं तो, ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण राजा दुष्यंत उन्हें भूल चुके थे. वह शकुंतला को भला बुरा कहने लगे, तब शकुंतला निराश होकर फिर से कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंच गई. 

शकुंतला पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष कहलाया देश
उधर, एक दिन वह मछली मछुआरे के जाल में फंस गई. जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट से अंगूठी निकली. मछुआरे ने देखा कि यह अंगूठी तो राजमुद्रिका है. उसे लेकर महाराज को देने गया. अंगूठी को देखते ही राजा दुष्यंत को सब कुछ याद आ गया और वह शकुंतला की तलाश में जुट गए. वह फिर से कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंचे. दुष्यंत ने देखा कि ऋषि के आश्रम में सुंदर सा बालक शेर के साथ खेल रहा है. दरअसल ये बालक कोई और नहीं शकुंतला का पुत्र था. वह बालक से पूछकर उसकी माता से मिलने गए और उसके रूप में अपनी शकुंतला को देखकर सुधबुध खो बैठे. उन्होंने शकुंतला को पहचान लिया और अपनी पिछली भूल के लिए क्षमायाचना की. वह शकुंतला और अपने पुत्र को लेकर हस्तिनापुर आ गए. राजा दुष्यंत ने अपने पुत्र का नाम भरत रखा जो बाद में एक प्रतापी सम्राट बने और कहते हैं कि उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ.
 

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