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संदेह छोड़ आगे बढ़ो, शक के आगे जीत है...

हर किसी को कामयाबी चाहिए. जो कामयाब हैं, वे इसे बरकरार रखने का उपाय ढूंढते हैं. पर सफलता के रास्ते में समस्याएं हैं. बड़ा लक्ष्य, तो चुनौतियां भी बड़ी. कई बार चुनौतियों के आगे मन हारने लगता है. अपने पास मौजूद साधन मामूली जान पड़ते हैं. ऐसे में मन में संदेह उठना एकदम स्वाभाविक है.

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रण में जीत दिलाने वाले रूप में श्रीराम
रण में जीत दिलाने वाले रूप में श्रीराम

हर किसी को कामयाबी चाहिए. जो कामयाब हैं, वे इसे बरकरार रखने का उपाय ढूंढते हैं. पर सफलता के रास्ते में समस्याएं हैं. बड़ा लक्ष्य, तो चुनौतियां भी बड़ी. कई बार चुनौतियों के आगे मन हारने लगता है. अपने पास मौजूद साधन मामूली जान पड़ते हैं. ऐसे में मन में संदेह उठना एकदम स्वाभाविक है.

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इस तरह के संदेहों से उबरने और कामयाबी हासिल करने का एक अचूक उपाय रामचरितमानस के लंकाकांड में बताया गया है. प्रसंग है राम-रावण युद्ध का. रणभूमि में लंकापति रावण के पास हर तरह के साधन मौजूद हैं, जबकि राम वनवासी के वेष में हैं. पैरों में जूते तक नहीं. ऐसे में विभीषण के मन में जीत को लेकर संदेह हो गया. जब राम ने विभीषण को समझाया, तब जाकर विभीषण को ज्ञान हुआ.

आज के दौर में जीत के इस अचूक मंत्र की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. इसमें बताए गए रास्ते पर चलने के प्रयास भर से जीत की राह आसान हो जाती है. यह पूरी तरह से कर्म और आचरण से जुड़ा मामला है. जब भी मन में संदेह आए, तो इसके पाठ से संदेह अवश्य ही दूर हो जाते हैं. नीचे रामचरितमानस की पंक्तियां और उसके अर्थ बताए गए हैं. कहानी खुद स्पष्‍ट हो जा रही है...

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रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।।
अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।।

रावण को रथ पर सवार और श्रीराम को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गए. श्रीराम से अधिक प्रीति होने के कारण उनके मन में यह संदेह पैदा हो गया कि वे भला इस रावण को जीतेंगे कैसे.

नाथ न रथ नहिं तन पद त्राणा। केहि बिधि जितब वीर बलवाना।।
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होई सो स्यंदन आना।।

विभीषण ने रामजी की वंदना करके कहा, ‘हे नाथ, आपके पास न तो रथ है, न तन पर कवच है, न पैरों में जूते हैं. ऐसे में आप रावण को कैसे जीत सकेंगे?’ इस पर श्रीराम ने कहा, ‘हे मित्र! सुनो, जिसे रथ से जीत मिलती है, वह रथ कुछ दूसरे तरह का होता है.’

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य‘ सील दृढ़ ध्वजा पताका।।
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।

‘जिस रथ से जीत मिलती है, उसके दो पहिए होते हैं- शौर्य और धैर्य. रथ पर लहराने वाली ध्वीजा और पताकाएं हैं- सत्य- और शील (सदाचार). बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये उस रथ के चार घोड़े हैं. ये घोड़े क्षमा, दया और समता रूपी रस्सीं से रथ में जोड़े हुए हैं.’

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ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।।

‘ईश्वर का भजन उस रथ को चलाने वाला सारथी है. वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है. दान फरसा है, बुद्धि प्रचंड शक्ति है, श्रेष्ठा विज्ञान कठिन धनुष है.’

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।।
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।।

‘निर्मल और स्थिर मन तरकस के समान है. शम (मन का वश में होना), यम और नियम आदि बहुत से बाण हैं. ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद कवच है. जीत के लिए इससे बड़ा दूसरा कोई उपाय नहीं है.’

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहं न कतहुं रिपु ताकें।।
‘हे मित्र, ऐसा धर्ममय रथ जिसके पास हो, उसके लिए जीतने को कहीं शुत्र ही नहीं है.’

रामजी ने कहा कि हे विभीषण, जिसके पास ऐसा मजबूत रथ हो, वह दुर्जय शत्रु को भी आसानी से जीत सकता है. यह सुनने के बाद विभीषण का संदेह दूर हो गया. आगे की कहानी सबों को मालूम ही है.

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