सबरीमाला में अय्यप्पा स्वामी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मांग वाली याचिका को राज परिवार की तरफ से वरिष्ठ वकील राधा कृष्णन ने हिंदू धर्म पर हमला बताया है. उन्होंने कहा कि ये याचिका हिन्दू धर्म को नुकसान पहुंचाने के मकसद से दाखिल की गई है. इसके बाद कई लोग ये याचिका भी ला सकते हैं कि गणेश शिव-पार्वती के पुत्र ही नहीं हैं. ये लोग हिन्दू धर्म को निशाने पर लिए हुए हैं. उन्होंने ये भी कहा कि कोर्ट को ऐसे धार्मिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए जिनका लोग पीढ़ियों से पालन करते आ रहे हैं.
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस पूरे मामले पर कहा कि, हम केवल संवैधानिक पहलुओं पर सुनवाई करेंगे इसके अलावा और कुछ नहीं करेंगे.
बता दें, सीनियर एडवोकेट राधाकृष्णन ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसे लोग हैं जिनकी भगवान अयप्पा में कोई रुचि नहीं हैं. केवल मंदिर की गरिमा पर हमला करने के लिए यह याचिका की गई है.
मंदिर की 18 पवित्र सीढ़ियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन पर चढ़ने वालों को 41 दिन का संकल्प अनुष्ठान करना होता है. ये सब अयप्पा स्वामी की इच्छा और मर्जी से होता है. राधाकृष्णन ने कहा कि हिन्दू धर्म में सभी देवताओं का अपना चरित्र होता है. ये केवल अय्यपा मंदिर में ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग मंदिरों में अपनी-अपनी परंपरा प्रचलित हैं. उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 में जो नैतिकता का जिक्र किया गया है उसके पीछे लोक शब्द लगाना चाहिए, ताकि इसे लोक नैतिकता के संदर्भ में समझा जाए.
राधाकृष्णन के बाद मुख्य पुजारी की तरफ से हाईकोर्ट के पूर्व जज और वरिष्ठ वकील वी गिरी ने कहा कि मूर्ति पूजा हिन्दू धर्म का सार और आधार होता है. सभी देवताओं की पूजा शास्त्रों के मुताबिक होती है. हर एक देवता का अपना अलग अनूठा और विशिष्ट चरित्र है. इसके अलावा वी गिरी ने कहा कि हर मंदिर की अपनी अलग परम्पराएं होती हैं, जिसको सुरक्षित और संरक्षित रखने की जरूरत है. हिन्दू धर्म में मूर्ति की स्थापना के साथ ही उसमें देवता की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. उन्हें जीवित देवता के तौर पर पूजा जाता है.
वी गिरी का मानना है कि भक्तों की विशिष्ट उपासना पद्धति उनकी शक्ति और ऊर्जा को बनाए रखती है. तभी तो शिव और विष्णु के मंदिर की पूजा पद्धति अलग-अलग है. उन्होंने आगे कहा कि केरल हाईकोर्ट में भी मन्दिर के तन्त्री यानी मुख्य पुजारी ही देवता के गार्जियन और गुरु हैं. उस तरह मन्दिर के रीति रिवाज में इनका आदेश और विचार ही अंतिम होता है. इसलिए मन्दिर की परंपराओं का सम्मान होना चाहिए. मन्दिर में प्रवेश करने वालों को देवता में विश्वास रखना चाहिए. इन्हें ये भी मानना चाहिए कि अयप्पा ब्रह्मचारी हैं. ये उनका मूल चरित्र है.