सती और शिव का संबंध अटूट था. भगवान भोले में बसती थीं सती और शक्ति के हृदय में रहते थे शिव. लेकिन सती की अग्निसमाधि के बाद जब शिव सती का शरीर लेकर समूचे ब्रह्मांड में भटक रहे थे, तो जहां सती का हृदय गिरा, वहीं पर माता अंबा का मंदिर बना. सती माता का हृदय जहां गिरा, वहीं पर बना सबसे पवित्र शक्तिपीठ. पौराणिक मान्यता ये भी है कि भगवान कृष्ण का मुंडन नंद-यशोदा ने यहीं करवाया था. भगवान राम और लक्ष्मण, सीता माता की खोज करते हुए यहीं से गुजरे थे और यहीं माता ने उन्हें रावण को मारने का बाण भी दिया था. इतना ही नहीं वाल्मिकी मुनि ने रामायण लिखने की शुरुआत इसी तपोभूमि से की थी.
भक्त देते हैं मां को न्यौता
अंबाजी में भादो पूर्णिमा का खास महत्व है क्योंकि इसी दिन से नवरात्रों के लिए भक्त मां को अपने घर आने का न्यौता देते हैं. भक्त यहां भगवती की पताका लेकर आते हैं और मां के मंदिर में चढ़ाते हैं, मां को अपने घर बुलाते हैं. ये अंबे की महिमा ही है कि यहां आनेवाला कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता. लेकिन इस मंदिर की सबसे खास बात ये है कि यहां गर्भगृह में मां की मूर्ति की नहीं बल्कि यंत्र की पूजा की जाती है. अंबा देवी का यंत्र गुप्त रखा जाता है, जिसे खुले में देखना भी निषेध है. पुजारी आंखों में पट्टी बांधकर इसकी पूजा करते हैं.
शक्तिपीठ अंबाजी में नवरात्र उत्सव की शुरुआत भादो की पूर्णिमा से होती है और नवरात्र के दौरान इसकी छटा देखते ही बनती है. यही वजह है कि ‘जय जय अंबे’ के घोष के साथ यहां लाखों भक्त पैदल चलकर मां के दरबार में दस्तक देने आते हैं.
अंबा मां के एक भक्त जीतूभाई भी हैं जिनके जीवन में मां ने वो चमत्कार कर दिखाया जिसकी उन्हें उम्मीद तक नहीं थी. 20 साल से गूंगी इनकी बहन की आवाज आ गई और उन्होंने मां के दरबार में हाजिर होकर श्रद्धा सुमन अर्पित करने का फैसला किया. वो लाखों भक्तगणों के साथ मां का जयकारा लगाते हुए अंबा माता के दर्शनों के लिए निकल पड़े.
‘जय जय अंबे’ के जयघोष करते, शरीर पर गुलाल मले और मां की चुन्नी लपेटे लाखों भक्त भादो पूर्णिमा के दिन अंबा माता के मंदिर पहुंचने के लिए पैदल निकलते हैं. देश के अलग-अलग राज्यों से आए लाखों भक्तगण हाथों में ध्वजा-पताका लिए हुए, मां के भजनों में लीन होकर मां के दर्शनों के लिए कदम बढ़ाते हैं. पैरों पर पड़ते छाले हों या फिर लंबी यात्रा की थकान, मां के दर्शनों के लिए आतुर इन भक्तों को किसी बात की कोई चिंता नहीं रहती.
सभी भक्त अपनी छोटी-छोटी टुकड़ियां बनाकर आते हैं और साथ में मां अंबा का रथ भी लाते हैं. जब लंबी पदयात्रा के बाद भक्तजन मंदिर तक पहुंचते हैं तो माहौल किसी उत्सव से कम नहीं होता. गरबा की ताल पर झूमते हुए, होठों पर मां के भजन और ‘जय जय अंबे’ के बुलंद नारे लगाकर भक्तजन अपनी हाजरी लगाने मां के दरबार तक पंहुचते हैं.
देश के 52 शक्तिपीठों में से एक अंबाजी शक्तिपीठ है, जिसका जिक्र शास्त्रों में भी आया है. कहा जाता है की अंबाजी के इस मंदिर की जगह पर सती माता का हृदय गिरा था और यहां पर शक्तिपीठ का निर्माण हुआ.
यहां पर श्रृंगार और पूजा भी खास तरह से की जाती है. सवेरे बालरूप की, दोपहर को यौवन स्वरूप की और शाम को प्रौढ़ स्वरूप की पूजा होती है. इसी पूजा अर्चना का चमत्कार ही है कि यहां से आज तक कोई खाली हाथ नहीं लौटा. अंबाजी में भादो पूर्णिमा पर पैदल चलकर आने के साथ-साथ ध्वजा पताका लेकर आने की भी विशेष परंपरा रही है. भक्त छोटे-छोटे झंडे और 52 गज लंबी ध्वजाएं लेकर माता के मंदिर पर चढ़ाकर अपनी भक्ति व्यक्त करते हैं. अंबा माता के मंदिर में पैदल चलकर आनेवाले सभी श्रद्धालु मां अंबा की आरती के साथ जुड़ने को अपना सौभाग्य मानते हैं और आरती के दर्शन करने पर ही श्रद्धालु अपनी यात्रा को सफल मानते हैं.