प्राचीन भारतीय ग्रंथों में सर्वाधिक प्रचिलित एवं विस्मयकारी पौराणिक कथा है अमृत मंथन अर्थात सागर के मंथन द्वारा अमृत प्रकट होने की कथा.
इस कथा के अनुसार एक समय देवताओं एवं राक्षसों ने समुद्र के मंथन तथा उसके द्वारा प्रकट होने वाले सभी रत्नों को आपस में बांटने का निर्णय किया. उनके बीच इन रत्नों के बटवारे को लेकर अत्यंत मतभेद हुए.
समुद्र के मंथन द्वारा जो सबसे मूल्यवान रत्न निकला वह था अमृत, उसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों दोनों ने इच्छा प्रकट की. अमृत पान करने वाला व्यक्ति अमर हो जाता है.
सर्वशक्तिमान और अविनाशी देवताओं को यह कदापि स्वीकार नहीं था कि असुर अमर हो जाएं एवं संसार में पाप का साम्राज्य फैले. कथा में देवता और असुर अमृत के पात्र के लिए युद्ध करनें लगे तब भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक अप्सरा का रूप लेकर अमृत पात्र को असुरों से दूर किया. असुरों से अमृत को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वह पात्र अपने वाहन गरुड़ को दे दिया. असुरों ने जब गरुड़ से वह पात्र छीनने की चेष्टा करी तो उस पात्र में से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर इलाहाबाद, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में गिरीं. तभी से प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर इन स्थानों पर कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है.
समुद्र मंथन के लिए पर्वत के एक शिखर को मथनी एवं एक सर्प को रस्सी बनाने के लिए उपयोग किया गया. मंथन के द्वारा दिव्य अश्व, हाथी, पवित्र गौ आदि उत्पन्न हुए एवं भयानक विष भी निकला जिसके द्वारा संपूर्ण सृष्टि का विनाश हो सकता था तब भगवान शिव ने उस भयानक विष को निगल कर संसार की रक्षा की.
मंथन के द्वारा उत्पन्न हुई प्रत्येक वस्तु यहां तक कि चार वेद भी विभिन्न देवताओं को दे दिए गए थे. असुरों की दृष्टि तो अमृत पर थी जैसे ही अमृत प्रकट हुआ उसे पाने के लिए असुरो ने देवताओं के विरूद्ध चाल चली. राहु नामक एक असुर नें अमृत पी लिया और तुरंत उसका सिर काट दिया गया परन्तु अमृत के प्रभाव से उसका सिर जीवित रहा एक मान्यता के अनुसार जब भी राहू सूर्य को निगल लेता है तब सूर्य ग्रहण होता है.
कलशस्य गुखे विष्णु: कण्ठे रूद्र: समाश्रित:
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:..
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्त द्वीप वसुन्धरा
ऋग्वेदोथ यजुर्वेदों सामवेदो अथर्वण:
अंगैश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:..