भारत के 30 लाख लोग उन झीलों के बेसिन यानी निचले इलाकों में रह रहे हैं, जो सिक्किम और केदारनाथ जैसी आपदा ला सकते हैं. अगर पूरी दुनिया की बात करें तो 30 देशों में 1089 ग्लेशियल लेक बेसिन हैं. जहां पर करीब 9 करोड़ लोग रहते हैं. इनमें से 1.50 करोड़ लोग तो ग्लेशियल लेक से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर रहते हैं. (सभी प्रतीकात्मक फोटोः गेटी/पिक्साबे)
यानी ग्लेशियल लेक के जितने करीब रहेंगे, खतरा उतना ही ज्यादा होगा. यह स्टडी इस साल नेचर कम्यूनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित हुई थी. अगर 1089 झीलें टूटती हैं तो जरूरी नहीं कि 9 करोड़ लोग इनकी चपेट में आ जाएं. लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार कम से कम 90.30 लाख लोग तुरंत आपदा को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे. या उसमें खत्म हो जाएंगे.
पूरी दुनिया में सिर्फ चार ऐसे देश हैं, जहां पर ग्लेशियल लेक सबसे ज्यादा हैं. या यूं कहें कि 1089 ग्लेशियल लेक की आधी सिर्फ इन्हीं चार देशों में हैं. ये देश हैं- भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन. 48 फीसदी लोग ऐसी बर्फीली झीलों के 20 से 35 किलोमीटर की रेंज में निचले इलाकों में रहते हैं. सिर्फ 3 लाख लोग झीलों के 5 KM के दायरे में रहते हैं.
ग्लेशियल लेक आमतौर पर हाई माउंटेन एशिया (HMA) में ज्यादा पाई जाती हैं. इनके आसपास बहुत सारी आबादी नहीं रहती. लेकिन इन झीलों के निचले इलाकों में लोग रहते हैं. यह खुलासा जिस स्टडी से हुआ है. उसमें वैज्ञानिकों ने दुनिया के चार बड़े पहाड़ों के रेंज से सटे बेसिन की जांच की. ये हैं - HMA, यूरोपियन एल्प्स, एंडीज और पैसिफिक नॉर्थवेस्ट. इनके अलावा 131 बेसिन हाई आर्कटिक एंड आउटलाइंग कंट्रीज में हैं.
1089 ग्लेशियल लेक पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा बेसिन, पेरू से सैंटा बेसिन और बोलिविया के बेनी बेसिन में हैं. ये बेहद खतरनाक झीलें हैं. ये किसी भी समय टूट सकती हैं. पाकिस्तान में इन झीलों के आसपास 12 लाख लोग रहते हैं. पेरू में 90 हजार और बोलिविया में 10 हजार लोग रहते हैं.
HMA यानी भारत के हिमालयी बेल्ट के ऊंचे पहाड़ों पर पिछले कुछ दशकों में ग्लेशियल लेक 37 से 93 फीसदी तक बढ़ गई हैं. यानी हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. भारत की ज्यादातर प्रमुख नदियां हिमालय के ग्लेशियरों से आती हैं. भारत के चार राज्यों में कुल मिलाकर 34 प्रमुख ग्लेशियर हैं. इनमें 14 बड़े ग्लेशियर हैं.
छोट-मोटे ग्लेशियर तो हजारों हैं. पहले हम ये जानते हैं कि किस राज्य में कितने ग्लेशियर हैं. और वो कितने पिघल चुके हैं. जिन चार राज्यों में ग्लेशियर हैं- वो हैं... लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश. लद्दाख में 15 प्रमुख ग्लेशियर हैं. ये हैं- पेंसिलुंगपा, डुरुंग डुरुंग, पार्काचिक, सगतोग्पा, सगतोग्पा ईस्ट, थारा कांगड़ी, गरम पानी, रासा-1, रासा-2, अरगनग्लास ग्लेशियर, फुननग्मा, पानामिक-1, पानामिक-2, सासेर-1 और सासेर-2.
लद्दाख के ग्लेशियरों हर साल काफी तेजी से पिघल रहे हैं. यहां सबसे तेज पिघलने वाला ग्लेशियर अरगनग्लास और डुरुंग डुरुंग है. अरगनग्लास 18.86 मीटर प्रति वर्ष और डुरुंग डुरुंग 12.0 मीटर प्रति वर्ष की दर से पिघल रहा है. यहां सिर्फ थारा कांगड़ी ग्लेशियर इकलौता है, जो पिछले पांच साल में बढ़ा है. वह 11.13 मीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ा है.
अब बात करते हैं अरुणाचल प्रदेश की. यहां पर एक ही ग्लेशियर है खांगड़ी. यह ग्लेशियर पिछले पांच साल में 6.50 मीटर प्रति वर्ष की दर से पिघल रहा है. जो कि इस इलाके के लिए खतरनाक है. हिमाचल में 12 प्रमुख ग्लेशियर हैं. यहां सब घट रहे हैं. सबसे तेज घटने वाला ग्लेशियर है गेपांग गाठ. यह 30 मीटर प्रतिवर्ष की दर से घट रहा है.
उत्तराखंड में छह प्रमुख ग्लेशियर हैं. माबांग ग्लेशियर 6.96 मीटर प्रति वर्ष, प्यूंग्रू ग्लेशियर 4.45 मीटर, चिपा 7.90 मीटर प्रति वर्ष, गंगोत्री ग्लेशियर 33.80 मीटर प्रति वर्ष, डोकरियानी 21 मीटर प्रति वर्ष, चोराबारी 11 मीटर प्रति वर्ष की गति से पिघल रहे हैं. यानी उत्तराखंड में ग्लेशियर के पिघलने की दर देश में सबसे ज्यादा है. सबसे ज्यादा खतरा भी यहीं हैं.