इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने एक भयावह रिपोर्ट जारी की है. इसमें कहा गया है कि हिमालय के ग्लेशियर पिछले दस सालों की तुलना में 65 फीसदी ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं. साल 2100 तक 75 से 80% ग्लेशियर पिघल जाएंगे. ICIMOD में भारत, नेपाल, चीन, म्यांमार, पाकिस्तान, भूटान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के सदस्य शामिल हैं.
हिमालय पर मौजूद इन ग्लेशियरों से भारत, पाकिस्तान, चीन समेत कई एशियाई देशों के 200 करोड़ लोगों को पीने और सिंचाई के लिए पानी मिलता है. इन ग्लेशियरों से निकली नदियां इन देशों की अर्थव्यवस्था को संभालती हैं. एवरेस्ट और K2 जैसी चोटियां अब बर्फ से ढंकी नहीं रहती. वहां के ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं.
स्टडी करने वाली टीम के प्रमुख शोधकर्ता फिलिपस वेस्टर ने बताया कि गर्मी बढ़ रही है. बर्फ पिघल रही है. लेकिन इतनी तेज गति से पिघलेगी, ये अंदाजा किसी को नहीं था. यह बेहद खतरनाक स्थिति है. हम अगले 100 साल में ही अपने सारे ग्लेशियर और नदियां खो देंगे. फिर कितनी बुरी स्थिति होगी. आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते.
हिंदूकुश हिमालय (HKH) इलाका 3500 किलोमीटर है. यह अफगानिस्तान से लेकर, बांग्लादेशन, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान से होकर गुजरता है. यहां के ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों से 24 करोड़ लोगों को पानी मिलता है. ये लोग पहाड़ी इलाकों में रहते हैं.
इसके अलावा निचले मैदानी इलाकों में रहने वाले 165 करोड़ लोगों को पानी नीचे बहने वाली नदियों से मिलता है. अभी जितना कार्बन उत्सर्जन हो रहा है, उस हिसाब से इस सदी के अंत तक 75-80 फीसदी ग्लेशियर पिघल जाएंगे. जबकि प्री इंडस्ट्रियल समय के हिसाब से देखे तों 1-2 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर 30 से 50% बर्फ खत्म होगी.
अगर यह तापमान 2100 तक बढ़कर 3 डिग्री सेल्यिस होती है तो पूर्वी हिमालय यानी नेपाल, भूटान के ऊपर का इलाका अपने ग्लेशियर का 75 फीसदी बर्फ खो देगा. अगर तापमान 4 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो 80 फीसदी ग्लेशियर पिघल जाएंगे. नदियां सूखने लगेंगी. या फिर उनका जलस्तर बेहद कम हो जाएगा.
इन ग्लेशियरों से दुनिया की 12 सबसे प्रमुख नदियों को पानी मिलता है. पहली है गंगा. दूसरी सिंधु. फिर यलो नदी, मेकॉन्ग और इरावड्डी. इसके अलावा इन नदियों की अलग-अलग धाराओं से करोड़ों लोगों को खाना, ऊर्जा, साफ हवा और पैसा कमाने का जरिया मिलता है. पहाड़ी समुदाय ग्लेशियर के पानी का इस्तेमाल करते हैं.
पहाड़ों पर ग्लेशियर के सूखने से घास नहीं मिलती. जिसकी वजह से याक और पहाड़ी बकरियों को और अधिक ऊंचाई पर जाना पड़ता है. जहां से गिरकर अक्सर उनकी मौत हो जाती है. इससे उन किसानों को नुकसान होता है, जिनके ये याक या बकरियां होती हैं.
यूरोपियन एल्प्स या उत्तरी अमेरिका के रॉकी माउंटेंस की तरह हिमालय के ग्लेशियरों की फील्ड रिपोर्ट नहीं है. यहां बहुत स्टडी नहीं की गई. हिमालय में हमेशा अनिश्चिंतता का माहौल रहता है. हिमालय का इलाका स्थिर नहीं है. जबसे सैटेलाइट्स ने इस इलाके पर नजर रखनी शुरू की है, तब से डेटा मौजूद है.
ICIMOD की डिप्टी चीफ इसाबेला कोजील कहती हैं कि एशिया के 200 करोड़ इन नदियों के सहारे जीवित हैं. ग्लेशियर अगर पिघल गए तो नदियां खत्म हो जाएंगी. फिर पानी कहां से पीएंगे. सिंचाई कहां से करेंगे. अगर डेढ़ से दो डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ता है तो सदी के अंत तक इन ग्लेशियरों की हालत बहुत खराब होने वाली है.
फिलिपस वेस्टर ने कहा कि हमें तत्काल जरूरी कदम उठाने होंगे. ताकि नदियों को बचाया जा सके. अगर ये नदियां खत्म हो गई तो पूरी दुनिया में हाहाकार मच जाएगा. पूरी दुनिया 1800 के मध्य के बाद से 1.2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हुई है. इस वजह से हमें ज्यादा गर्मी, सूखा, तूफान, समुद्री जलस्तर का बढ़ना दिख रहा है.