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साइंस न्यूज़

एस्ट्रोनॉट्स के खून-पसीने से बनी ईंटें, इससे बनेगी Mars पर सस्ती कॉलोनी

Cheap Mars colony
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मंगल ग्रह (Mars) पर इंसानी बस्ती बनाने का आइडिया कई दशकों से आ रहा है. दिक्कत ये है कि किसी भी निर्माण के जरूरी सामग्री को मंगल तक कैसे ले जाया जाए. ये भारी काम है, साथ ही बेहद महंगा भी. निर्माण संबंधी यंत्रों को मंगल तक ले जाने बेहद महंगा होगा. इसलिए एक ऐसा आइडिया निकाला गया है जो सस्ती कॉलोनी बनाने में मदद करेगा. हालांकि ये आइडिया काफी हैरान करने वाला और सुनने में थोड़ा दर्दनाक महसूस हो सकता है, लेकिन आइडिया तो आइडिया है.  (फोटोः गेटी)
 

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वैज्ञानिकों ने गणना की है कि अगर एक ईंट को धरती से मंगल ग्रह तक ले जाया जाए तो 2 मिलियन डॉलर्स यानी 15.00 करोड़ रुपयों से ज्यादा लागत आएगी. अब आप सोचिए कि अगर एक कमरा बनाना हो तो कीमत क्या होगी. उसमें तो सीमेंट, सरिये, लेबर की कीमत भी जुड़ेगी. इतना खर्च करके कोई इमारत बनाने से अच्छा है कि धरती को प्रदूषण से बचाया जाए लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों ने आइडिया दिया है, जिसमें वो कह रहे हैं कि मंगल ग्रह पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स के खून, पसीने और आंसू को मंगल की मिट्टी से मिलाकर वहीं ईंट बनाई जा सकती है.  (फोटोः गेटी)

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यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे एक फायदा ये होगा कि कंस्ट्रक्शन मटेरियल को धरती से मंगल तक ले जाने की जरूरत नहीं होगी. इसका निर्माण वहीं हो सकेगा. हालांकि मंगल ग्रह पर ईंट बनाने की प्रक्रिया में एस्ट्रोनॉट्स के पेशान (Urine) को भी शामिल किया जा सकता है, लेकिन इसक उपयोग अन्य कामों में भी किया जाएगा.  (फोटोः गेटी)

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वैज्ञानिकों ने कहा कि मंगल ग्रह की मिट्टी और अंतरिक्ष यात्रियों के खून, पसीने और आंसू को मिलाकर 'कॉस्मिक कॉन्क्रीट' (Cosmic Concrete) बनाया जा सकता है. वैज्ञानिकों की यह स्टडी दो महीने पहले साइंस जर्नल मटेरियल टुडे बायो में प्रकाशित हुई थी. वैज्ञानिकों ने बताया इंसानों के खून में ऐसा प्रोटीन होता है जो पसीने, आंसू और पेशान के साथ मिलाकर उससे मंगल की मिट्टी को ढालकर एक सख्त ईंट बनाई जा सकती है.  (फोटोः गेटी)

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मंगल ग्रह तक पहुंचने की लागत काफी ज्यादा है. इसलिए भविष्य में मंगल ग्रह पर कॉलोनी बनाने वाली कंपनियों को पहले वहां इंसानों को भेजना होगा. उनके अस्थाई तौर पर रहने की व्यवस्था करनी होगी. उसके बाद लैब बनाने होंने जहां पर ऐसे ईंटों का निर्माण किया जा सके. साथ ही एस्ट्रोनॉट्स के खून, पसीने, आंसू और पेशाब को ईंट बनाने लायक करने के लिए यंत्र लगाने होंगे.  (फोटोः गेटी)

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इंसानों के ब्लड प्लाज्मा में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला प्रोटीन होता है सीरम एल्बूमिन (Serum Albumin). इस प्रोटीन को पसीने और आंसू से मिले पानी और मंगल ग्रह की मिट्टी से मिलाकर ईंट बनाई जाएगी. इस कॉस्मिक कॉन्क्रीट को नाम दिया गया है एस्ट्रोक्रीट (AstroCrete). इसकी कंप्रेसिव स्ट्रेंथ 25 MPa (मेगापास्कल्स) है. यह पारंपरिक कॉन्क्रीट की ताकत थोड़ा बेहतर है. पारंपरिक कॉन्क्रीट की कंप्रेसिव स्ट्रेंथ 20 से 32 MPa होती है.  (फोटोः गेटी)

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अगर इस ईंट को बनाते समय इसमें पेशाब का पानी और यूरिया मिला दिया जाए तो इसकी कंप्रेसिव स्ट्रेंथ 40 MPa हो जाती है, जो पारंपरिक कॉन्क्रीट की ताकत से दोगुनी है. मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों एस्ट्रोनॉट्स के खून, पसीने, आंसू और पेशाब को चांद और मंगल ग्रह की मिट्टी को मिलाकर दो कॉन्क्रीट की छोटी ईंटे प्रयोग के तौर पर बनाई हैं. यह बेहद मजबूत कॉन्क्रीट है. (फोटोः डॉ. एलेड रोबर्स/यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर)

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यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के साइंसिट्स डॉ. एलेड रोबर्स ने कहा कि यह आइडिया सफल है. भविष्य में हम इस तरीके से भी निर्माण कर सकते हैं. मंगल और चांद पर मजबूत कॉलोनियों का निर्माण कर सकते हैं. अब इस मटेरियल को ज्यादा दिनों तक चलने लायक बना रहे हैं. हो सकता है कि भविष्य में यह तरीका इतना कारगर और सफल हो कि इसके जरिए ही इंसानी बस्तियों का निर्माण किया जा सके.  (फोटोः गेटी)

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डॉ. एलेड रोबर्स कहते हैं कि अगर छह मार्स कॉलोनिस्ट मंगल ग्रह पर जाएं तो वो दो साल में आधा टन एस्ट्रोक्रीट (AstroCrete) बना सकते हैं. यानी हर एस्ट्रोनॉट दो साल के अंदर अपने खून, पसीने, आंसू और पेशाब के जरिए दूसरे एस्ट्रोनॉट के लिए मंगल पर एक कमरा बना सकता है. इसके अलावा यह एस्ट्रोक्रीट (AstroCrete) मौसम से बचाने में भी कारगर है. यह हर तरह के मौसम के अनुसार खुद को एडजस्ट करता है.  (फोटोः गेटी)

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डॉ. एलेड रोबर्स ने कहा कि जिस तरह से धरती का जलवायु बदल रहा है. ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है. देशों में मारा-मारी मची है, ऐसे में इंसान ज्यादा दिनों तक धरती पर रह नहीं पाएगा. अंतरिक्ष में रहने और साइंटिफिक खोज के लिए उसे दूसरे ग्रहों पर जाकर ठिकाना बनाना होगा. ये ठिकाने सस्ते हो तो बेहतर है. इस काम में हमारे बनाए एस्ट्रोक्रीट (AstroCrete) मदद कर सकते हैं. (फोटोः गेटी)

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