दिल्ली-NCR में जमीन के अंदर से इतना ज्यादा पानी निकाला जा रहा है कि इसके कुछ हिस्से भविष्य में कभी भी धंस सकते हैं. ये बात यूके, जर्मनी और बॉम्बे के साइंटिस्ट अपनी स्टडी में कह रहे हैं. दिल्ली-NCR का करीब 100 वर्ग किलोमीटर का इलाका धंसने की हाई रिस्क जोन में है. इस स्टडी को किया है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के पीएचडी शोधार्थी शगुन गर्ग, IIT Bombay से प्रो. इंदू जया, अमेरिका की साउदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी के वामशी कर्णम और जर्मन सेंटर फॉर जियोसाइंसेस के प्रो. महदी मोटाघ ने. (फोटोः India Today Archive)
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के पीएचडी शोधार्थी शगुन गर्ग ने aajtak.in से खास बातचीत में बताया कि हम चारों ने मिलकर यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) के सेंटीनल-1 सैटेलाइट का रिमोट सेंसिंग डेटा इस स्टडी में उपयोग किया है. यह डेटा अक्टूबर 2014 से लेकर जनवरी 2020 तक का है. शगुन ने बताया कि भूस्खलन मिलिमीटर और सेंटीमीटर में होता है. यह इतना धीमे होता है कि पता नहीं चलता. हर छह दिन में सेंटीनल-1ए और सेंटीनल-1बी का डेटा मिलता है. यह सैटेलाइट इंटर फेरेमेट्री टेक्नीक (InSAR) से तरंगे फेंकता है, जो धरती के अंदर हो रहे बदलावों को माप लेता है. (फोटोः India Today Archive)
शगुन गर्ग ने बताया कि ईरान, मेक्सिको, चीन में ऐसी हालत होती है. वहां की सरकारें तेजी से काम करती हैं. अभी तक भारत में ऐसी स्टडी नहीं हुई थी. इसलिए हमने यहां दिल्ली-NCR के इलाके को चुना. यहां पर कापसहेड़ा, महिपालपुर, दिल्ली-गुरुग्राम ओल्ड रोड और फरीदाबाद में स्थिति काफी बुरी दिख रही है. आमतौर पर जो सिंक होल (Sink Hole) बनते हैं, सीवर पाइप या पानी की पाइप की लीकेज की वजह से बनते हैं. पानी बहता है तो मिट्टी खिसकने लगती है. इससे सिंकहोल बनता है. जैसा पिछले साल बारिश में दिल्ली में कुछ स्थानों पर देखने को मिला. लेकिन हमारी स्टडी जिस खतरे की ओर बता रही है, वो ज्यादा भयावह है. (फोटोः PTI)
शगुन ने बताया कि दिल्ली-NCR में ग्राउंडवाटर तेजी से कम हो रहा है. पानी का स्तर किस लेवल पर कम हो रहा है, इसकी जांच तो भारतीय वैज्ञानिक संस्थाओं को करनी चाहिए. हम तो यह स्टडी करके लोगों को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ऐसे ही जमीन के अंदर से पानी निकालते रहेंगे तो कहीं कोई इलाका धंस कर नीचे चला जाएगा. कहीं कोई इलाका ऊपर बढ़ जाएगा. अगर यह किसी रिहायशी इलाके में हुआ तो इमारतें गिर सकती हैं. सड़कों पर दरारें पड़ सकती हैं. इससे बड़े स्तर की तबाही आ सकती है. चीन में मिलिमीटर लेवल पर भी अगर ऐसी हरकत दिखती है तो वहां की सरकार इसे गंभीरता से लेती है. आइए अब समझते हैं इन चारों वैज्ञानिकों की स्टडी में दिल्ली-NCR के किस इलाके में क्या खतरा बताया गया है. (फोटोः PTI)
इस नक्शे में दिल्ली-NCR के तीन इलाकों को दिखाया गया है. दिल्ली, फरीदाबाद और गुरुग्राम. बाएं तरफ जो बड़ा नक्शा है उसमें दिख रहे चौकोर बक्से इन्ही इलाकों को दिखाते हैं. ऊपर के चौकोर बक्से में साउथ दिल्ली का इलाका दिख रहा है, जहां पर नीले रंग का गोला है. यह दिखाता है कि यहां पर जमीन के अंदर पानी का स्तर ठीक है. लेकिन उसके ठीक नीचे वाले बक्से में कई लाल निशान दिख रहे हैं, जो ये बताते हैं कि गुरुग्राम में जमीन के अंदर पानी का स्तर काफी ज्यादा नीचे हैं. ठीक इसी तरह नीचे का बक्सा फरीदाबाद का है. यहां भी जमीन के अंदर पानी की स्थिति बहुत बुरी है. ये इलाके भूस्खलन के हाई रिस्क जोन में हैं. दाहिनी तरफ ऊपर का बक्सा कापसहेड़ा का है. जिसमें लाल निशान बहुत ज्यादा फैला है. उसके नीचे बीच का बक्सा फरीदाबाद और नीचे दाहिने तरफ का बक्सा द्वारका का है. द्वारका में भूजल का स्तर सही है, क्योंकि वहां पर नीला निशान दिख रहा है. (फोटोः Nature)
इस तस्वीर में दिख रहा नक्शा दो सैटेलाइट का डेटा दिखा रहा है. वह भी अलग-अलग समय का. अगर दोनों सैटेलाइट का डेटा एक जैसे दिखते हैं यानी समस्या है. यह नक्शा दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास बसे कापसहेड़ा इलाके का है. जिसमें तीन चरणों में स्टडी की गई है. साल 2014 से 2016, साल 2016 से 2018 और साल 2018 से 2019 तक. यहां पर पहले चरण में 22 सेंटीमीटर, दूसरे चरण में 32 सेंटीमीटर और तीसरे चरण 20 सेंटीमीटर लैंड सब्सिडेंस यानी भूस्खलन हुआ है. कुल मिलाकर पांच साल में 75 सेंटीमीटर. यानी कापसहेड़ा इलाके में अगर भूजल दोहन को लेकर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो यह इलाका खतरनाक साबित हो सकता है. तीनों चरणों में दोनों सैटेलाइट का डेटा एक जैसा दिख रहा है. एकदम लाल-भूरे रंग का. (फोटोः Nature)
यह सैटेलाइट तस्वीर दिल्ली के द्वारका की है. जहां पहले चरण यानी साल 2014 से 2016 के बीच भूजल का स्तर काफी कम था. लाल निशान दिख रहा था. दोनों सैटेलाइट के डेटा में. साल 2016 से 2018 से लेकर साल 2018-2019 तक यह नीला होता चला गया. यानी दिल्ली सरकार ने इस इलाके में भूजल को लेकर काम किया है. शगुन गर्ग कहते हैं कि कोई झील, तालाब या जलस्रोतों को सुधारा गया है. उनके पानी का स्तर सही किया है. जिसकी वजह से इस इलाके में पानी की दिक्कत नहीं है. अगर जमीन के अंदर पानी का संतुलन बना रहेगा तो सैटेलाइट भी इस चीज को सही दिखाएगी. दिल्ली सरकार चाहे तो अन्य इलाकों को भी सही कर सकती है. लेकिन उससे पहले इलाकों की जियोएनालिसिस करनी होगी. (फोटोः Nature)
यह सैटेलाइट तस्वीर है हरियाणा के फरीदाबाद की. जिसे इस राज्य की औद्योगिक राजधानी भी कहा जाता है. साल 2014 से 2016 तक यहां पर लैंड सब्सिडेंस की दर 2.15 सेंटीमीटर प्रति वर्ष थी. यानी दो साल में 4.30 सेंटीमीटर. साल 2016 से 2018 के बीच यह 5.3 सेंटीमीटर प्रति वर्ष रही. यानी 10.6 सेंटीमीटर. साल 2018 से 2019 तक यह 7.83 सेंटीमीटर प्रति वर्ष थी. यानी 15.66 सेंटीमीटर. कुल मिलाकर यहां पर जमीन के अंदर से ज्यादा पानी निकालने की वजह से पांच साल में कुल 30.56 सेंटीमीटर लैंड सब्सिडेंस यानी भूस्खलन हुआ है. शगुन कहते हैं कि ये सब्सिडेंस जमीन के अंदर हो रहा है. सैटेलाइट से सिर्फ इतना पता चलता है कि ये हो रहा है. लेकिन इसके नुकसान का अध्ययन करने के लिए फील्ड पर जाकर स्टडी करनी होगी. (फोटोः Nature)
इस सैटेलाइट तस्वीर में दिल्ली-NCR के तीनों इलाके दिख रहे हैं. ऊपर बाएं तरफ चौकोर बक्से में लाल निशान और पानी को नीले निशाल के साथ दिखाया गया है. अगर आप इन चारों तस्वीरों को ध्यान से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि जहां पर लाल निशान की मात्रा बढ़ रही है, वहां पर नीला रंग यानी पानी की मात्रा कम हो रही है. जहां ज्यादा नीला निशान है, वहां पर लाल नहीं है. लेकिन गहरे लाल रंग के निशान वाले इलाकों में अलग-अलग समय पर पहले नीला, फिर पीला रंग हो गया है. नीले रंग की मात्रा कम होती जा रही है. यानी जितना ज्यादा भूजल का दोहन होगा, उतना ज्यादा लाल निशान बनता जायेगा. लैंड सब्सिडेंस की आशंका भी बढ़ती जाएगी. (फोटोः Nature)
यह तस्वीर दिल्ली के इंटरनेशनल एयरपोर्ट से 800 मीटर दूर बसे कापसहेड़ा इलाके की है. शगुन गर्ग कहते हैं कि यह पूरा इलाका लाल रंग में दिख रहा है. बड़ा सा त्रिकोण. जो चौकोर बक्से में है वो महिपालपुर और बिजवासन हरिजन बस्ती हैं. इन इलाकों से भी भूजल दोहन बहुत ज्यादा हो रहा है. इन इलाकों में अगर ज्यादा मात्रा में जमीन से पानी निकाला जाता है तो भविष्य में दिक्कतें आ सकती हैं. महिपालपुर और बिजवासन हरिजन बस्ती में 15 से लेकर 50 मिलिमीटर प्रतिवर्ष तक का डिफॉर्मेशन देखने को मिल रहा है. (फोटोः Nature)
इस नक्शे में बताया गया है कि कैसे ज्यादा पानी निकालने से होने वाला लैंड सब्सिडेंस कितना खतरनाक हो सकता है. यहां पर वैज्ञानिकों ने आबादी, आबादी का घनत्व, बिल्ट-अप/नॉन बिल्ट-अप इलाके, ग्राउंडवाटर की गहराई, लीथोलॉजी, जमीन का मूवमेंट, वेलोसिटी ग्रैडिएंट, हजार्ड और संभावित खतरे का विश्लेषण किया है. इस तस्वीर में जितने इलाके हरे रंग में हो उन्हें कोई दिक्कत नहीं है. जो पीले रंग में हैं वहां पर भूस्खलन का संभावित खतरा हो सकता है. लाल निशान वाले इलाके लैंड सब्सिडेंस के हाई रिस्क जोन में हैं. (फोटोः Nature)
शगुन बताते हैं कि रेड एरिया नीचे जा रहा है. ब्लू एरिया ऊपर आ रहा है. इसे रीबाउंड या अपलिफ्ट भी कहते हैं. पानी निकालने पर सॉयल सिकुड़ जाती है. ज्यादा पानी होगा तो ऊपर आएगी. मिट्टी की पानी को सोखने की क्षमता है. कापसहेड़ा और फरीदाबाद में रीबाउंड नहीं हो रहा है. जमीन के नीचे क्या चल रहा है. इसकी स्टडी करनी चाहिए. बाढ़ आएगी तो नीचे धंसे इलाके कटोरे जैसा बन जाएंगे. इनमें पानी भरेगा. कहीं ज्यादा तो कहीं कम. ऐसे में इमारतों के गिरने या उनपर दरारें आने का डर है. बड़ी आपदा भी आ सकती है. (फोटोः India Today Archive)
ऐसी ही स्थिति ओल्ड दिल्ली-गुरुग्राम रोड की है. इस सड़क के नीचे लैंड सब्सिडेंस बहुत ज्यादा है. यहां हर साल दरारें पड़ती हैं. गड्ढे बन जाते हैं. यह कापसहेड़ा के अंदर आता है. इस सड़क के नीचे 30 साल पुरानी अंडरग्राउंड सीमेंट सीवर पाइप लाइन है. केमिकल सड़क को डीग्रेड कर सकती है. सिविक अथॉरिटी को इसकी जांच करनी चाहिए. शगुन और उनके बाकी साथी वैज्ञानिकों की यह स्टडी हाल ही में साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुई है.
शगुन गर्ग उत्तराखंड में हरिद्वार और रुड़की के बीच स्थित लक्सर इलाके के हैं. पिता प्रदीप कुमार गर्ग की बर्तनों की दुकान है. मां बबीता गर्ग घर संभालती हैं. बहन देहरादून से बीएससी बायोटेक कर रही है. शगुन ने सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक पंतनगर यूनिवर्सिटी से पूरी की है. पोस्ट ग्रैजुएशन के लिए IIT बॉम्बे में दाखिला लिया. एक साल पढ़ाई करने के बाद उन्हें रिसर्च करने के लिए जर्मनी से ऑफर आया. फिर आगे की पढ़ाई उन्होंने वहीं से पूरी की. उसके बाद पिछले साल अक्टूबर में उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पीएचडी करना शुरु किया.