वैज्ञानिकों ने पहली बार टिकाऊ खेती-किसानी (Sustainable Agriculture) का मूल्यांकन करके एक रिपोर्ट बनाई है. यह रिपोर्ट मात्रात्मक (Quantitative) है. इसमें भारत समेत 8 देशों को शामिल किया गया है. इस रिपोर्ट की खास बात ये है कि इसे सिर्फ पर्यावरणीय प्रभावों के आधार पर नहीं बनाया गया है, बल्कि इसमें आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को भी शामिल किया गया है. जिन देशों के लिए यह अध्ययन किया गया है उन्हें चार श्रेणियों में बांटा गया है. हैरानी की बात ये है कि भारत की स्थिति किसी भी मामले में सही नहीं दिख रही है. (फोटोः गेटी)
इस मात्रात्मक मूल्यांकन (Quantitative Assessment) के लिए सस्टेनेबल एग्रीकल्चर मैट्रिक्स (Sustainable Agriculture Matrix - SAM) नाम की तकनीक बनाई गई है. जिसे यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड सेंटर फॉर एनवायरमेंटल साइंस के वैज्ञानिकों ने बनाया है. इस तकनीक के जरिए सरकारें और संस्थान खेती-किसानी से संबंधित विकास, जिम्मेदारी को बढ़ावा, बदलाव संबंधी सुधार और प्राथमिकताएं, नीति निर्धारण तय करने में मदद मिलती है. यह रिपोर्ट हाल ही में Cell जर्नल में प्रकाशित हुई है. (फोटोः यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड)
इस प्रोजेक्ट के लीडर शिन झांग ने कहा कि सस्टेनेबल एग्रीकल्चर मैट्रिक्स (Sustainable Agriculture Matrix - SAM) खेती-किसानी को लेकर अलग-अलग देशों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास दिला सकता है. कृषि का मतलब सिर्फ फसलें उगाना नहीं है. बल्कि यह हर इंसान से संबंधित है. खेती-किसानी का सतत् यानी टिकाऊ होना जरूरी है, नहीं तो पूरी दुनिया में खाद्य समस्या तेजी से बढ़ जाएगी. इस प्रोजेक्ट को साल 2017 में शुरु किया गया था. इसमें दुनियाभर की 30 संस्थाएं जुड़ी हुई हैं. (फोटोः गेटी)
शिन झांग ने कहा कि टिकाऊ खेती-किसानी एक जटिल प्रक्रिया और समझ है. हर इंसान इसका अलग-अलग मतलब निकाल सकता है. इसलिए एक ऐसी तकनीक की आवश्यकता थी जो पारदर्शी हो. इसलिए हमने SAM बनाया. हालांकि यह भी इतना आसान नहीं है क्योंकि जब आप किसी मूल्यांकन में सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को शामिल करते हैं तब उसकी जटिलता बढ़ जाती है. क्योंकि इसमें खेती-किसानी का सीधा संबंध उत्पादन में बढ़ोतरी, बढ़ती आबादी, खाद्य सामग्री की मांग, ऊर्जा आदि सबसे जुड़ जाती है. (फोटोःगेटी)
जिन देशों को इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है वो हैं- भारत (India), ऑस्ट्रेलिया (Australia), अमेरिका (US), ब्राजील (Brzil), चीन (China), यूक्रेन (Ukraine), इथियोपिया (Ethiopia) और ताजिकिस्तान (Tajikistan). इन देशों को चार श्रेणियों में बांटा गया है. पहला- हाई इनकम में ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका, अपर-मिडल इनकम में ब्राजील और चीन, लोअर-मिडल इनकम में भारत और यूक्रेन और लोअर इनकम में इथियोपिया और ताजिकिस्तान. (फोटोः यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड)
हर देश के टिकाऊ खेती-किसानी का मूल्यांकन 18 अलग-अलग फैक्टर्स के आधार पर किया गया है. इन 18 फैक्टर्स को पर्यावरण, आर्थिक और सामाजिक प्रभावों की श्रेणी में बांटा गया है. इसमें भारत की स्थिति काफी ज्यादा खराब दिख रही है. भारत और यूक्रेन लोअर-मिडिल इनकम वाले देश की श्रेणी में है. भारत से बेहतर यूक्रेन की स्थिति है. भारत में तो ज्यादातर फैक्टर्स पर लाल निशान लगा हुआ है, जबकि यूक्रेन कई मामलों में हमसे बेहतर दिख रहा है. (फोटोः यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड)
First-of-its-kind quantitative assessment for #sustainableagriculture @OneEarth_CP https://t.co/DCK3UftIvE
— Phys.org (@physorg_com) September 17, 2021
अब हम आपको ये बताते हैं कि लाल निशान का क्या मतलब है. लाल का मतलब है हाई रिस्क वाला जोन. चाहे वह पर्यावरण में हो, आर्थिक या सामजिक श्रेणी में हो. हरे का मतलब है सब ठीक है. सुचारू रूप से चल रहा है. जबकि पीले का मतलब है कि सुधार की संभावना है या फिर सुधार हो रहा है. लेकिन भारत में तो स्थितियां बेहतर होती दिख ही नहीं रही है. 1991 से लेकर 2016 तक टिकाऊ खेती-किसानी को लेकर क्या काम हुए या नहीं हुए...इसके असर देखने को नहीं मिल रहा है. (फोटोःगेटी)
अगर आप SAM तकनीक से भारत के लिए किए मूल्यांकन को देखेंगे तो आपको 1991 से लेकर 2016 तक 18 अलग-अलग फैक्टर्स में से ज्यादातर लाल रंग में दिखाई देंगे. यानी पर्यावरण, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर मौजूद इन 18 फैक्टर्स में भारत में सिर्फ एक जगह ही थोड़ा सुधार है. वह है फसलों की विभिन्नता. यह शुरुआत से अब तक बनी हुई है. थोड़ा सुधार फाइनेंस एक्सेस में भी आया है. लेकिन बाकी सारे फैक्टर्स में भारत की हालत खराब ही दिख रही है. (फोटोः यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड)
जबकि, उच्च आय वाले ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका का टेबल ज्यादातर मामलों में हरे रंग से भरा पड़ा है. भारत से कम आय वाले यूक्रेन, इथियोपिया और ताजिकिस्तान की स्थिति टिकाऊ खेती-किसानी के मामले में ज्यादा बेहतर है. कम से कम उनके यहां पर्यावरण संबंधी श्रेणी में डाले गए फैक्टर्स हरे रंग में हैं. जब ऐसे छोटे और कम आय वाले देशों में टिकाऊ खेती-किसानी के लिए इतना काम हो सकता है तो क्या भारत में ये संभव नहीं है? (फोटोः यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड)
भारत की सबसे बुरी स्थिति पर्यवारण वाली श्रेणी में ही है. यहां पर पानी का उपयोग ज्यादा है. N सरप्लस और P सरप्लस दोनों में लाल निशान चल रहा है. लैंड यूज चेंज को लेकर साल 2000 के बाद आए बदलावों की वजह से यहां पीला रंग दिख रहा है. ग्रीनहाउस गैसों को लेकर भारत में कोई काम होता नहीं दिख रहा है. कम से कम इस टेबल के अनुसार. आर्थिक श्रेणी में लेबर प्रोडक्टिविटी लाल रंग में है. ट्रेड ओपननेस का लाल रंग कम-ज्यादा होता दिख रहा है. (फोटोः गेटी)