दिल्ली में मानवों द्वारा निर्मित बादलों के जरिए असली बारिश कराने की तैयारी चल रही है. सफलता कितनी मिलेगी ये तो समय बताएगा. लेकिन दिल्ली-एनसीआर के चारों तरफ भयानक प्रदूषण फैला है. वो भी जानलेवा स्तर का. इसलिए कृत्रिम बारिश की जरूरत बहुत ज्यादा महसूस हो रही है. दिल्ली सरकार इसे लेकर प्रयास भी कर रही है.
भारत में नकली बादलों से असली बारिश कराना कोई नई बात नहीं है. आर्टिफिशियल तरीके से बारिश कराने का प्रयोग 1951 से अब तक 30 बार किया जा चुका है. इस बात की पुष्टि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी के वैज्ञानिक भी करते हैं.
1951 में पश्चिमी घाट, 2003-2004-2019 कर्नाटक में, 2004 महाराष्ट्र, 2008 आंध्र और तीन बार तमिलनाडु में कराई जा चुकी है कृत्रिम बारिश. इन राज्यों में सूखे से निपटने के लिए कृतिम बारिश कराई गई थी. यानी दिल्ली में आर्टिफिशियल बारिश का एक्सपेरिमेंट पहली बार नहीं होगा.
भारत में सबसे पहले कृत्रिम बारिश की कोशिश 1951 में टाटा फर्म द्वारा पश्चिमी घाट पर जमीन आधारित सिल्वर आयोडाइड जनरेटर का इस्तेमाल करके किया गया था.
कृत्रिम वर्षा कराने के लिए क्लाउड सीडिंग एक प्रकार से मौसम में बदलाव का वैज्ञानिक तरीका है. इसके तहत आर्टिफिशियल तरीके से बारिश करवाई जाती है. इसके लिए विमानों को बादलों के बीच से गुजारा जाता है और उनसे सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस और क्लोराइड छोड़े जाते हैं.
इससे बादलों में पानी की बूंदें जम जाती हैं. यही पानी की बूंदें फिर बारिश बनकर जमीन पर गिरती हैं. हालांकि, यह तभी संभव होता है, जब वायुमंडल में पहले से पर्याप्त मात्रा में बादल मौजूद हों और हवा में नमी हो. यानी कम से कम 40 फीसदी पानी के साथ इतनी ही मात्रा में बादल.
पिछले साल आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने दिल्ली में धुंध साफ करने के लिए क्लाउड सीडिंग के जरिए कृत्रिम बारिश कराने का प्रोजेक्ट तैयार किया था. पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी थी. लेकिन किसी वजह से ये मिशन सफल नहीं हो पाया.
इस बार भी तैयारी चल रही है ताकि कृत्रिम बारिश के जरिए वायुमंडलीय धूल हट जाए और आसमान साफ हो जाए. 2018 में आईआईटी कानपुर को परियोजना के लिए डीजीसीए और रक्षा और गृह मंत्रालयों से सभी मंजूरी मिल गई थी. लेकिन विमान की अनुपलब्धता के कारण यह परियोजना शुरू नहीं हो सकी.
पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी कई सालों से क्लाउड सीडिंग प्रयोग कर रहा है. संस्थान ने ये प्रयोग नागपुर, सोलापुर, जोधपुर और वाराणसी के आसपास कराए हैं. इन प्रयोगों की सफलता दर 60-70% है. हालांकि, यह स्थानीय वायुमंडलीय स्थितियों, हवा में नमी की मात्रा और बादलों की उपस्थिति पर निर्भर करता है.