भारत में अब मॉनसून की बारिश में पांच फीसदी की बढ़ोतरी होगी. क्योंकि जितनी बार धरती का पारा ग्लोबल वार्मिंग की वजह से एक डिग्री सेल्सियस ऊपर चढ़ेगा, उतनी बार भारत में मॉनसून की बारिश में 5 प्रतिशत ज्यादा बारिश होगी. नतीजा वही होगा. हमेशा की तरह ज्यादा बाढ़, करोड़ों रुपयों का नुकसान और लाखों एकड़ में फैली फसलें होंगी खराब. ये खुलासा किया है पर्यावरण परिवर्तन पर स्टडी करने वाले एक प्रोफेसर ने. आइए जानते हैं कि भारत की बारिश को लेकर उनका और क्या कहना है? (फोटोः गेटी)
पोट्सडैम इंस्टीट्यूट ऑफ क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के साइंटिस्ट प्रोफेसर एंडर्स लीवरमैन ने ग्लोबल वार्मिंग की वजह से भारत की बारिश पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है. उनकी यह स्टडी अर्थ सिस्टम डायनेमिक्स नाम की साइट पर प्रकाशित भी हुई है. (फोटोः गेटी)
प्रो. एंडर्स ने कहा कि हमारी स्टडी में यह बात सामने आई है कि भारत में मॉनसूनी बारिश और तबाही मचाएगी. यह हर साल बुरी होती जाएगी. साथ ही इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल होगा. प्रो. एंडर्स ने बताया कि पिछले क्लाइमेट मॉडल्स की तुलना अभी के मॉडल से करें तो भारत में मॉनसून की बारिश ज्यादा ताकतवर होने वाली है. (फोटोः गेटी)
भारत में आमतौर पर बारिश का सीजन जून के महीने से शुरू होता है और यह सितंबर के अंत तक चलता है. भारत की बड़ी आबादी इस बारिश से मिलने वाले पानी को पीती है. खेती-किसानी में उपयोग करती है. प्रो. एंडर्स ने बताया कि इस सदी के अंत तक साल-दर-साल जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान बढ़ेगा. भारत में मॉनसून की बारिश का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाएगा. यहां तक बारिश की मात्रा भी ज्यादा हो जाएगी. (फोटोः गेटी)
प्रोफेसर ने इसे समझाने और अपनी स्टडी के लिए क्लाइमेट मॉडल 31 का उपयोग किया है. यह इस जेनरेशन का क्लाइमेट मॉडल है जो भारत के मॉनसूनी बारिश के अगले चार सालों का अनुमान लगाता है. यह अनुमान वैश्विक तापमान के बढ़ने के आधार पर होता है. (फोटोः गेटी)
India’s monsoon rains 5% heavier for every 1C of global warming https://t.co/QlLGntTKlB
— The Independent (@Independent) April 14, 2021
इस मॉडल में औद्योगिक विकास के बाद के अधिकतम तापमान और पेरिस एग्रीमेंट गोल के अधिकतम तापमान 2 डिग्री सेल्सियस को तय मानक माना गया है. इससे ही ग्रीनहाउस गैसों को मापा जाता है. इसके जरिए ही कार्बन उत्सर्जन की स्टडी की जाती है. साथ ही इसके जरिए ही दुनिया के अलग-अलग देशों में मॉनसूनी बारिश या तूफानी बारिश की गणना की जाती है. (फोटोः गेटी)
प्रोफेसर एंडर्स का कहना है कि अगर धरती का तापमान दो डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो भारत के मॉनसूनी बारिश में 10 फीसदी का इजाफा होगा. लेकिन जिस तरीके से ग्रीन हाउस गैसें और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, उस हिसाब से सदी के अंत तक मॉनसूनी बारिश में करीब 24 प्रतिशत बढ़ जाएगी. क्योंकि भारत का मॉनसून वैश्विक तापमान के मामले में अत्यधिक संवेदनशील है. (फोटोः गेटी)
प्रो. एंडर्स ने कहा कि इस हिसाब से अगर धरती का पारा ग्लोबल वार्मिंग की वजह से 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो भारत में 5 फीसदी औसत इजाफा होगा मॉनसूनी बारिश में. हो सकता है कि किसी साल यह 1.7 फीसदी बढ़े तो किसी साल से अधिकतम 13.4 फीसदी बढ़ जाए. पिछले क्लाइमेट मॉडल्स के आधार पर की गई स्टडी में ये बढ़ोतरी 3 फीसदी की थी. (फोटोः गेटी)
ये भविष्यवाणी ऐसे समय में की गई है जब भारत में 1950 से लेकर 21वीं सदीं की शुरुआत तक हर साल मॉनसूनी बारिश कम होती चली गई. इसपर प्रोफेसर लीवरमैन कहते हैं कि ये भारत में लगातार तेजी से बढ़ वायु प्रदूषण की वजह से हुआ है. क्योंकि 1950 के बाद भारत में इंडस्ट्री, ट्रांसपोर्ट, ढांचागत विकास, सड़कें, ब्रिज सब बनने शुरू हुए. उसके बाद प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ा की पानी गर्मियों में जब तक भाप बनकर ऊपर जाएगी नहीं, तब तक बारिश कहां से होगी. (फोटोः गेटी)
प्रोफेसर का दावा है कि इंडस्ट्रियल एयर पॉल्यूशन की वजह से मॉनसूनी बारिश में आई कमी एक इवेंट हो सकता है. लेकिन वैश्विक स्तर की जब बात होती है तब उसमें कई इवेंट्स एकसाथ शामिल होते हैं. जैसे-जैसे पर्यावरण संबंधी समस्याएं बढ़ती जाएंगी उसी हिसाब से हमें वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सख्त कदम उठाने पड़ेंगे. (फोटोः गेटी)
प्रोफसर एंडर्स ने जोर देकर कहा कि अगर लंबे समय की बात करें तो वायु प्रदूषण को कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा हरा देगी. इसकी वजह से मॉनसूनी बारिश में गजब की तेजी आएगी. इसके पीछे कुछ बड़े कारण है. पहला- गर्म हवा ज्यादा नमी सोखती है. इसलिए भी मॉनसून में बारिश ज्यादा होने की आशंका है. यह तो सबसे सामान्य और बेसिक साइंस है. (फोटोः गेटी)
इस स्टडी से अलग यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग्स के मॉनसून साइंटिस्ट डॉ. एंड्र्यू टर्नर ने कहा कि प्रोफेसर एंडर्स की स्टडी यह बताती है कि वैश्विक तापमान बढ़ने से भारत में मॉनसूनी बारिश ज्यादा होगी. इसकी वजह बढ़ता प्रदूषण, वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों में इजाफा और काबर्न डाईऑक्साइड का उत्सर्जन है. (फोटोः गेटी)
डॉ. एंड्र्यू टर्नर ने कहा कि ज्यादा मॉनसून से लोगों को ज्यादा पानी मिलेगा. इसे वो पीने और खेती में उपयोग कर सकते हैं. लेकिन अगर मॉनसूनी बारिश ज्यादा भयावह हो गई तो फसलें खराब होंगी. बाढ़ आएगी. तबाही मचेगी. करोड़ों रुपयों का नुकसान होगा. इसके बाद सूखा भी पड़ने की आशंका बनी रहेगी. (फोटोः गेटी)
डॉ. एंड्र्यू टर्नर ने कहा कि अगले दो दशकों के बाद दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक मौसम में होने वाले परिवर्तनों की भविष्यवाणी नहीं कर पाएगा. क्योंकि इसके बाद सदी के अंत तक मौसम और पर्यावरण की स्थितियां बद्तर हो चुकी होंगी. ऐसे समय में भारत और चीन से होने वाले प्रदूषण का स्तर दुनिया में सबसे ज्यादा होगा. जिसकी वजह से इन देशों के मौसम में तबाही वाला परिवर्तन होगा. (फोटोः गेटी)