भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने ऐसा स्पेस शटल बनाया है, जो दोबारा उपयोग किया जा सकता है. इसका नाम है रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV). इसे ऑर्बिटल री-एंट्री व्हीकल (ORV) भी बुलाते हैं. बहुत जल्द इसकी लैंडिंग का एक्सपेरिमेंट होने वाला है. यह एक्सपेरिमेंट इस साल की तीसरी तिमाही में संभावित है. (फोटोः ट्विटर/gopiaiaisxar)
रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) की लैंडिंग एक्सपेरिमेंट के सफल होने के बाद इसकी ऑर्बिटल री-एंटी एक्सपेरिमेंट (ORE) पर काम किया जाएगा. इसे एक हेलिकॉप्टर से जमीन से 3 किलोमीटर ऊपर ले जाया जाएगा. उसके बाद वहां ये खुद नीचे आएगा और रनवे पर खुद ही यानी ऑटोमैटिक तरीके से लैंड करेगा. अगर इसमें यह सफल हो गया तो भारत अंतरिक्ष में न सिर्फ सैटेलाइट लॉन्च कर पाएगा. बल्कि भारत के आसमान की सुरक्षा भी कर पाएगा. (फोटोः ISRO)
असल में ऐसी ही तकनीक का फायदा अमेरिका और रूस भी उठाना चाह रहे हैं. वो ऐसे यानों के जरिए किसी भी दुश्मन के सैटेलाइट्स को उड़ा सकते है. डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (DEW) चला सकते हैं. यानी ऊर्जा की किरण भेजकर दुश्मन के संचार तकनीक को खत्म कर देना. बिजली ग्रिड उड़ा देना या फिर किसी कंप्यूटर सिस्टम को नष्ट कर देना. भारत भी ये काम इस यान के जरिए कर सकता है. (फोटोः ISRO)
पिछले महीने इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ ने कहा कि हम चुपचाप रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल के प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना चाहते हैं. यह बेहद सस्ता प्रयोग है. सोमनाथ ने कहा था कि अगर सबकुछ सही रहा तो 2030 तक रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) पूरी तरह से काम करना शुरु कर देगा. इससे बार-बार रॉकेट बनाने का खर्चा कम होगा. ये सैटेलाइट को अंतरिक्ष में छोड़कर वापस आ सकता है. ताकि दोबारा उपयोग किया जा सके. इससे स्पेस मिशन की लागत कम से कम 10 गुना कम हो जाएगी. (फोटोः ट्विटर/इंडियाडिफेंस)
रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) के अत्याधुनिक और अगले वर्जन से भारतीय अंतरिक्षयात्रियों को स्पेस में भी भेजा जा सकता है. अभी ऐसे स्पेस शटल बनाने वालों में अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और जापान ही हैं. रूस ने 1989 में ऐसा ही शटल बनाया था जिसने सिर्फ एक बार ही उड़ान भरी. अभी जो स्पेस शटल बनाया जा रहा है वो अपने असली फॉर्मैट से करीब 6 गुना छोटा है. सारे टेस्ट सफल होने के बाद इसका असली आकार बनाया जाएगा. (फोटोः ISRO)
छह साल पहले 2016 में रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) की टेस्ट फ्लाइट हुई थी. तब यह एक रॉकेट के ऊपर लगाकर अंतरिक्ष में छोड़ा गया था. करीब 65 किलोमीटर तक गया था. यह एक हाइपरसोनिक उड़ान थी. इसकी स्पीड आवाज की गति से पांच गुना ज्यादा है. उसके बाद 180 डिग्री पर घूमकर वापस आ गया था. 6.5 मीटर लंबे इस स्पेसक्राफ्ट का वजन 1.75 टन है. बाद में इसे बंगाल की खाड़ी में उतार लिया गया.
रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) की अभी जो लैंडिंग एक्सपेरिमेंट होना है, उसमें यह स्पेसक्राफ्ट खुद नेविगेट करेगा. खुद ग्लाइड करेगा. इसके बाद कर्नाटक के चल्लाकरे स्थित डिफेंस रनवे पर लैंड करेगा. यह परीक्षण इस स्पेसक्राफ्ट के एयर डायनेमिक्स को समझने के लिए जरूरी है. इसका एयरफ्रेम भी इसरो ने ही तैयार किया है. यह पूरी तरह से स्वदेशी है, इसलिए इसकी जांच हर तरह से किया जाना जरूरी है. (फोटोः ट्विटर/डिफेंस अलर्ट)
रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) की लास्ट ग्लाइड कैपेबिलिटी टेस्ट अप्रैल 2022 में होना था लेकिन उसे खराब मौसम की वजह से रद्द कर दिया गया था. एस. सोमनाथ ने बताया कि इसरो वैज्ञानिक लगातार ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं, जो बेहद जटिल हैं. लेकिन इससे हम सीखेंगे और सफलता भी हासिल करेंगे. एक रॉकेट को बनाने में काफी लागत आती है. एक बार रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल सफल हो जाए तो सैटेलाइट छोड़ने की लागत कई गुना कम हो सकती है. (फोटोः ISRO)
रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) दो स्टेज का स्पेसक्राफ्ट है. पहला रीयूजेबल पंख वाला क्राफ्ट जो ऑर्बिट में जाएगा. जिसके नीचे एक रॉकेट होगा जो इसे ऑर्बिट तक पहुंचाएगा. एक बार ऑर्बिट में पहुंचने के बाद स्पेसक्राफ्ट अंतरिक्ष में सैटेलाइट छोड़कर वापस आ जाएगा. इसका उपयोग रक्षा संबंधी कार्यों में भी किया जा सकता है. ऑर्बिट के बाहर जाना और फिर वापस आना बेहद तापमान बर्दाश्त करने वाला काम है. घर्षण से कोई भी चीज जलने लगती है. ऐसे में इस स्पेसक्राफ्ट की जांच होना बेहद जरूरी है. (फोटोः ट्विटर/इंडिया डिफेंस)
Weather permits, Reusable Launch Vehicle
— ISRO (@isro) May 25, 2022
will be seen flying over the Science City in Challakere, Karnataka soon: Shri S Somanath, Chairman, ISRO https://t.co/V1kxc3hd8N