कितने डिग्री का तापमान आपकी जान ले सकता है. अगर गर्मी के साथ ह्यूमिडिटी यानी नमी मिल जाए तो इंसान का शरीर कितनी देर बर्दाश्त कर सकता है. वैज्ञानिकों ने इस सवाल का जवाब खोज लिया है. एक नई स्टडी में इस बात का खुलासा किया गया है. (सभी फोटोः गेटी)
वैज्ञानिकों ने बताया है कि अगर एक स्वस्थ इंसान लगातार छह घंटे तक 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में रहता है. साथ में 100 फीसदी ह्यूमिडिटी हो तो छह घंटे में मौत हो सकती है. असल में ऐसे मौसम में शरीर से पसीना निकलता तो है पर वह भाप बनकर उड़ता नहीं है. इससे हीटस्ट्रोक होता है. अंग बेकार होने लगते हैं... और फिर मौत.
नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के साइंटिस्ट कोलिन रेमंड कहते हैं कि मानव शरीर की सहने की क्षमता ज्यादा नहीं है. वह 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में मर सकता है. इसे वेट बल्ब टेंपरेचर (Wet Bulb Temperature) कहते हैं. दक्षिण एशिया और पारस की खाड़ी में इस स्तर का तापमान सालभर में दर्जनों बार रिकॉर्ड किया गया है.
कोलिन ने बताया कि अच्छी बात ये है कि 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और 100 फीसदी ह्यूमिडिटी वाला माहौल दुनिया में कहीं भी 2 घंटे से ज्यादा नहीं रहा. इसलिए इसकी वजह से सामूहिक स्तर पर मौत की घटनाएं नहीं हो सकतीं. लेकिन यह स्थिति छह घंटे तक रह गई तो बहुत मुसीबत हो जाती.
हर इंसान के शरीर की अपनी क्षमता होती है. सामाजिक और आर्थिक वजह भी मायने रखती है. अगर कोई ढंग से खुद को बचा पा रहा है. उसके पास शरीर को ठंडा रखने की व्यवस्था है तो मौत नहीं होगी. बीमार हो सकता है. यूरोप में पिछले साल गर्मियों में 61 हजार लोग मारे गए. यूरोप में वेट बल्ब टेंपरेचर की स्थिति नहीं बनी थी.
जिस हिसाब से ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है, उससे पॉसिबल है कि ज्यादा लोग गर्मी या उससे संबंधित मौसम से मारे जाएं. जुलाई महीने को मानव इतिहास का सबसे गर्म महीना माना गया है. इस वजह से साइंटिस्ट ये मान रहे हैं कि भविष्य में वेट बल्ब टेंपरेचर की घटनाएं ज्यादा जगहों पर अधिक मात्रा में होंगी.
कोलिन रेमंड ने बताया कि पिछले 40 वर्षों में वेट बल्ब टेंपरेचर की घटनाएं दोगुनी से ज्यादा हो गई हैं. इंसानों द्वारा किए जा रहे जलवायु परिवर्तन की वजह से इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं. अगले कुछ दशकों में दुनिया का तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाएगा. ऐसे में 35 डिग्री सेल्सियस और 100 फीसदी ह्यूमिडिटी वाला माहौल ज्यादा बनेगा.
अगर वेट बल्ब टेंपरेचर न हो. यानी 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और 100 फीसदी ह्यूमिडिटी. तो इंसान 46 डिग्री सेल्सियस और 50 फीसदी ह्यूमिडिटी वाली कंडिशन में भी मारा जा सकता है. इसकी जांच करने के लिए पेंसिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में कुछ स्वस्थ युवाओं पर तापमान की जांच की गई. उनके शरीर का कोर टेंपरेचर 30.6 डिग्री सेल्सियस पर ही बिगड़ने लगा था. 35 डिग्री सेल्सियस तक तो जा ही नहीं सकते.
भारत में ऐसे तापमान की स्थिति बनती जा रही है. पिछले महीने ही नेचर जर्नल में दक्षिण एशिया के हीटवेव्स और बढ़ते वेट बल्ब टेंपरेचर की घटनाओं का जिक्र है. छोटे बच्चों, बुजुर्गों के लिए यह तापमान बेहद खतरनाक है. बुजुर्गों में पसीने की ग्रंथियां कम हो जाती है. इसलिए उनको ज्यादा खतरा रहता है.