क्या मांस खाना हमें इंसानों की श्रेणी में रखता है? क्या हम इंसान कहलाने के लायक बचते हैं? अगर आप कन्फर्म नहीं हैं तो कोई बात नहीं. एक नई स्टडी में इन सवालों का जवाब दिया गया है, जो आपके होश उड़ा देगा. कुछ मानव विज्ञानियों यानी एंथ्रोपोलॉजिस्ट की माने तो इंसानों द्वारा मांस खाने की शुरुआत तब हुई थी, जब उनके पूर्वज होमो इरेक्टस (Homo Erectus) विकसित हुए थे. उनके पास उनके शरीर की तुलना में बहुत बड़ा दिमाग था. समझ में नहीं...यहां आकार की बात हो रही है. इस आधार पर कहा गया कि मांस ने हमें इंसान (Meat Made Us Human) बनाया है. लेकिन शायद ऐसा नहीं है. क्योंकि इस हाइपोथीसिस पर अब कई मानव विज्ञानियों को शक है. (फोटोः गेटी)
बड़े दिमाग को ज्यादा एनिमल प्रोटीन चाहिए और कुछ माइक्रो-न्यूट्रीएंट्स...ये बात इतनी ज्यादा फैल गई कि ऑस्ट्रेलिया मीट एंड लाइवस्टॉक इंडस्ट्री ने इसे लेकर एक बड़े पैमाने पर कैंपेन चलाया. इसके विरोध में जुरासिक पार्क मूवी में पैलियोंटोलॉजिस्ट एलेन ग्रांट का किरदार निभाने वाले सैम नील ने भी भयानक स्तर पर विरोध किया था. वहीं, कुछ शाकाहारियों ने भी एक टैगलाइन पर सवाल उठाया, जिसपर लिखा था “Red Meat – We Were Meant To Eat It”. (फोटोः गेटी)
अब प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडेमिक्स ऑफ साइंसेज की स्टडी में हैरतअंगेज खुलासा हुआ है. जिसमें कहा गया है कि मांस खाने का विरोध करने वाले हमेशा से सही थे. आइए समझते हैं कैसे? जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. एंड्रूयू बार ने कहा कि प्राचीन मानव विज्ञान को समझने वाली कई पीढ़ियों ने कई पुरातन जगहों को खोजा है, जहां पर सीधे तौर पर यह कहते हैं कि इंसानों के शुरुआती पूर्वज मांस खाते थे. इसमें सबसे प्रमुख जगह है ओल्डूवाई गॉर्ज (Olduvai Gorge). लेकिन मांस खाने में तेजी आई है इसके 20 लाख साल बाद. (फोटोः गेटी)
डॉ. बार ने कहा कि और भी कई ऐसे स्थान मिले जहां पर मांस खाने के सबूत मिले. शोधकर्ताओं ने पूर्वी अफ्रीका के 59 स्थानों पर इस बात की खोज की. ये स्थान 26 लाख से लेकर 12 लाख साल पुराने हैं. इनमें से ज्यादातर में इस बात के सबूत मिले कि प्राचीन इंसानी पूर्वज के खान-पान में मांस शामिल था. क्योंकि वहां पर जानवरों की हड्डियां भी मिली थीं, जिनपर पत्थरों के औजारों से काटने के निशान थे. लेकिन यह जरूरी नहीं कि यहां पर मांस खाने का प्रचलन समय के साथ तेजी से बढ़ा हो. (फोटोः गेटी)
अब इस बात की दोबारा जांच करने के मानव विज्ञानियों और पुरातत्वविदों की टीम ने उन जगहों की जांच करनी शुरु की, जहां पर हड्डियों पर काटने के निशान थे. कुल हड्डियों की संख्या कितनी थी, जिनमें काटने के निशान थे. काटने के निशान के तरीके की गणना की गई. हर बार इस तरह की जांच करने के बाद पता चला कि छोटी खोपड़ी वाले इंसानों के पूर्वज यानी ऑस्ट्रैलोपिथेसीन्स (Australopithecines) तो पहले से मांस खा रहे थे. इसका मतलब ये कि होमो इरेक्टस में समय मांस खाने का प्रचलन तेजी से बढ़ा, ये सही नहीं है. (फोटोः गेटी)
अब सवाल ये उठता है कि अगर हमारे पूर्वजों के खाने में मांस पहले से शामिल था, तो ये बड़े दिमाग वाली हाइपोथीसिस कहां से आई. ऐसा लगता है कि कुछ लोगों ने इसे मान्य बनाने के लिए एक कहानी गढ़ दी. क्योंकि 20 लाख साल पहले के भी प्राचीन जगहों के खनन में हर जगह मांस खाने के सबूत नहीं मिले. इसका मतलब ये है कि हर जगह मांस नहीं खाया जाता था. यह धीरे-धीरे इंसानों की नई प्रजातियों के साथ बढ़ता गया. होमो इरेक्टस के समय भी मांस खाने का प्रचलन था. (फोटोः गेटी)
स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट की मानव विज्ञानी डॉ. ब्रियाना पोबिनर ने कहा कि वो 20 सालों से जीवाश्म की हड्डियों पर काटने के निशान का अध्ययन कर रही हैं. लेकिन यह खुलासा तो मुझे अब भी हैरान करता है. क्योंकि जीवाश्म तो उसी का बनेगा जो कम सड़ेगा या सड़ेगा नहीं. फलों और सब्जियों का जीवाश्म कम बनता है, क्योंकि वो जमीन में गल जाते हैं. इसलिए यह बात पुख्ता नहीं हुई है कि होमो इरेक्टस सिर्फ मांस खाते थे. या उनके खाने में वो कभी-कभी शामिल होता था. (फोटोः गेटी)
डॉ. एंड्र्यू बार ने कहा कि हो सकता है कि मांस खाने की प्रक्रिया का हमारे पूर्वजों के दिमाग के आकार से थोड़ा-बहुत लेना-देना हो. क्योंकि उसी समय तो उनकी आंतें भी सिकुड़ रही थीं. जबकि मांस खाने के लिए आंतों का मजबूत और बड़ा होना एक वाजिब कारण है. क्योंकि शाकाहारी खाना छोटे आंत में आसानी से पचता है. मांस को पचने में ज्यादा समय और अंदरूनी रसायनों की जरूरत होती है. पर ये हो सकता है कि उस समय के पूर्वजों ने आग जलाना सीख लिया था. साथ ही उनके घर की जो भी बुजुर्ग महिला या पुरुष होते होंगे, उन्हें मांस पकाकर खाना आता रहा होगा. इसलिए उनके खाने में मांस मिलता है. (फोटोः गेटी)
डॉ. बार ने कहा कि मांस खाने से कोई इंसान नहीं बना. यहां कहने का मतलब ये है कि मांस को खाना धरती पर अलग-अलग जगहों पर पहले से चला आ रहा है. यह जरूरत के हिसाब से विकसित हुआ. यह सामुदायिक स्तर या पारिवारिक स्तर पर ही फैसला किया जाता रहा होगा कि खाना क्या बनेगा. शिकार कितना होगा या खेती कितनी होगी. (फोटोः गेटी)