अंटार्कटिका की बर्फीली झीलों के नीचे कुछ ऐसे सूक्ष्मजीव पाए गए हैं जो पत्थरों को खाते हैं. या फिर पत्थरों के बुरादे को अपना भोजन बनाते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नई खोज से हमें दूसरे ग्रहों पर जीवन के संकेत मिल सकते हैं. या फिर दूसरे ग्रहों के जीवों की जानकारी भी मिल सकती है. ये सूक्ष्मजीव अंटार्कटिका में बर्फ से जमी झीलों के नीचे बहुत तेजी से पनप रहे हैं. (फोटोःगेटी)
अंटार्कटिका (Antarctica) में ग्लेशियर के नीचे बर्फीली झीलें हैं. जिन्हें सबग्लेशियल झीलें (Subglacial lakes) कहते हैं. ये ज्यादातर धरती के दक्षिणी ध्रुव पर ही पाई जाती हैं. ये पृथ्वी के क्रस्ट (Crust) यानी पत्थरों की परत और बर्फ की मोटी परत के बीच में दफन होती हैं. कई बार ये झीलें मीलों गहरी होती हैं. इन झीलों में हजारों की संख्या में सूक्ष्मजीव (Microbes) पाए जाते हैं. जो पानी में पोषक तत्वों को बढ़ाते हैं. इन झीलों का पानी बिना साफ किए भी पिया जा सकता है. वैज्ञानिक इस बात से परेशान थे कि इन झीलों में पोषक तत्व कहां से आ रहे हैं. अब उन्हें जवाब मिल गया है. (फोटोःगेटी)
सबग्लेशियल झीलें (Subglacial lakes) प्राकृतिक तौर पर खत्म होती हैं. यह प्रक्रिया तब होती है जब पानी का स्तर बढ़ता है या फिर घटता है. वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका के लेक व्हिलैंस (Lake Whillans) की पथरीली मिट्टी का सैंपल लिया. ये झील 60 वर्ग किलोमीटर में फैली है. जो अंटार्कटिका में बर्फी की परत से 2600 फीट नीचे हैं. इस सैंपल के साथ ही कुछ सूक्ष्मजीव भी आ गए. (फोटोःगेटी)
ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के ग्लेसियोलॉजिस्ट और यह स्टडी करने वाली साइंटिस्टस बीट्रिज गिल ओलिवास ने कहा कि सबग्लेशियल झीलों (Subglacial lakes) को लेकर अब तक जितने भी अध्ययन किए गए हैं. उनसे हमारी स्टडी एकदम अलग है. इससे पहले जो स्टडीज हुई हैं, उनके मुताबिक सबग्लेशियल झीलों में गैस कैसे बनती है. पर्यावरण कैसा होता है जैसे विषयों पर हुई हैं. लेकिन हमारी स्टडी इससे बहुत आगे जाकर हमने झीलों ने नष्ट होने की प्रक्रिया और उससे जीवों पर पड़ने वाले असर को भी शामिल किया है. (फोटोःगेटी)
बीट्रिज गिल ओलिवास ने बताया कि इन्हीं पत्थरों और माइक्रोब्स की वजह से पानी में महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की भरमार रहती हैं. इस स्टडी की बदौलत हम यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या ब्रह्मांड के अन्य ग्रहों पर भी इसी तरह जीवन की उत्पत्ति हुई है. या हुई होगी. लेक व्हिलैंस (Lake Whillans) के जलस्तर में लगातार बदलाव होता रहता है. कभी यह खाली हो जाती हैं, तो कभी पानी का स्तर बढ़ जाता है. (फोटोःगेटी)
लेक व्हिलैंस (Lake Whillans) आमतौर पर 4 मीटर गहरी है. लेकिन जब पानी का स्तर बढ़ता है तब यह 39 फीट तक जा सकती है. वहीं, जलस्तर कम होने पर यह 26 फीट तक पहुंच जाती है. लेकिन पानी का स्तर कम होने पर बर्फ की मोटी चादर के नीचे बहने वाली बर्फीली लहर झीले के ज्यादातार हिस्सों से सीधे टकराती हैं. जिसकी वजह से झील के किनारे और बीच के पत्थर नष्ट होते हैं. (फोटोःगेटी)
बीट्रिज कहती हैं कि लेक व्हिलैंस (Lake Whillans) एक बहुत बड़े हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम का हिस्सा है. इसमें होने वाले नुकसान का रासायनिक असर आसपास की अन्य बड़ी झीलों पर पड़ता है. बीट्रिज और उनकी टीम ने लेक व्हिलैंस (Lake Whillans) से लिए गए पथरीले मिट्टी के सैंपल को लैब में 0 डिग्री सेल्सियस पर रखा. इसमें ऑक्सीजन की सप्लाई बंद कर दी गई. यह माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा अंटार्कटिका की बर्फीली चादरों के नीचे मौजूद झीलों का होता है. (फोटोःगेटी)
वैज्ञानिकों ने इस सैंपल को 40 दिनों के लिए इसी स्थिति में छोड़ दिया. उसके बाद पानी में पोषक तत्वों, रसायनों और मिनरल्स की जांच की. क्योंकि ये सारी चीजें पथरीली मिट्टी के सैंपल से निकल कर पानी में मिली थीं. इनमें हाइड्रोजन, मीथेन, कार्बन डाईऑक्साइड और अमोनियम भी था. जैसे ही ग्लेशियर के नीचे के पत्थर टूटते हैं, उनमें से ये सारे रसायन और गैस निकल जाती है. बीट्रिज और उनकी टीम ने टूटे हुए पत्थरों के कणों में माइक्रोस्कोपिक बुलबुले देखे. जिन्हें फ्लूड इन्क्लूसन कहते हैं. ये समय-समय पर टूटते रहते हैं और पानी में गैसे और अन्य वस्तुएं रिलीज करते हैं. (फोटोःगेटी)
जब इन बुलबुलों से गैस और मिनरल्स निकलते हैं तब ये पानी के अंदर मौजूद अन्य वस्तुओं से चिपक जाते हैं. कुछ पानी में घुल जाते हैं. यहीं पर आते हैं माइक्रोब्स यानी सूक्ष्मजीव. कुछ सूक्ष्मजीवों को मीथैनोट्रॉफ्स (Methanotrophs) कहते हैं. ये मीथेन खाते हैं और ऊर्जा पैदा करते हैं. इनके विपरीत कुछ सूक्ष्मजीव होते हैं मीथेनोजेन्स (Methanogens). ये हाइड्रोजन और कार्बन डाईऑक्साइड को मीथेन में बदलकर ऊर्जा पैदा करते हैं. (फोटोःगेटी)
लेक व्हिलैंस (Lake Whillans) में ऐसे बैक्टीरिया भी हैं जो अमोनियम को नाइट्राइट और नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदलते हैं. जिसे नाइट्रीफिकेशन कहते हैं. ऐसी झीलों के अंदर लगातार बहुत ज्यादा मात्रा में चीजों का उत्पादन होता रहता है. जिससे ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया चलती रहती है. सल्फर और लोहे के साथ ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया लंबी चलती है. कीमोलिथोट्रॉफ्स (Chemolithotrophs) ऑक्सीडेशन की प्रकिया को करा कर ऊर्जा पैदा करते हैं. (फोटोःगेटी)
बीट्रिज गिल ओलिवास कहती हैं कि हम इन स्टडीज के सहारे अब सौर मंडल के अन्य ग्रहों पर मौजूद संभावित जीवन या जीवों की तलाश कर सकते हैं. क्योंकि हमारे सौर मंडल में कई ऐसे ग्रह हैं, जहां पर बर्फीली झीलें हैं. जमें हुए सागर हैं. ये पूरे ब्रह्मांड में एक जैसे ही होते हैं. अगर आपके सिर के ऊपर बर्फ की मोटी परत हो और साथ में तरल पानी भी, तो झीलों की मिट्टी के नष्टीकरण से सूक्ष्मजीवों को भोजन और पोषक तत्व मिलते रहते हैं. (फोटोःगेटी)
बीट्रिज कहती हैं कि हमें यह नहीं पता कि अन्य ग्रहों पर मौजूद एक्सोप्लेनेटरी माइक्रोब्स के साथ भी ऐसा होगा. लेकिन इस स्टडी से यह बात तो पुख्ता है कि ऐसा हो सकता है. अगर बड़े स्तर पर यह स्टडी दूसरे ग्रहों के लिए की जाए तो इससे नई जानकारी हासिल होगी. यह स्टडी हाल ही में कम्यूनिकेशंस अर्थ एंड एनवॉयरमेंट में प्रकाशित हुई है. (फोटोःगेटी)