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साइंस न्यूज़

रूस की हरकत से अमेरिका परेशान, पहली बार अंतरिक्ष के कचरे की वजह से टला स्पेसवॉक

NASA Cancels Spacewalk Space Junk Russia
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रूस ने एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल दागकर अपने एक पुराने सैटेलाइट को धरती की निचली कक्षा में उड़ा दिया. इससे करीब 1500 से ज्यादा टुकड़े तेजी से अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (International Space Station - ISS) की तरफ बढ़े थे. इस घटना के बाद करीब 15 दिन बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) से स्पेस स्टेशन के बाहर एस्ट्रोनॉट्स के स्पेसवॉक यानी अंतरिक्ष में चहलकदमी को रद्द कर दिया है. क्योंकि नासा को डर है कि रूस के मिसाइलट टेस्ट की वजह से फैले कचरे से एस्ट्रोनॉट की जान को खतरा हो सकता है. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी को डर है कि रूस के एंटी-सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट की वजह से फैले कचरे से एस्ट्रोनॉट के स्पेससूट में छेद हो सकता है या फिर स्पेस स्टेशन को नुकसान पहुंच सकता है. दो अमेरिकी एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस स्टेशन के बाहर खराब हुए एक एंटीना को बदलने के लिए स्पेसवॉक करना था. लेकिन सोमवार देर रात यानी 29 नवंबर 2021 को नासा को ये काम करना सही नहीं लगा. क्योंकि स्पेसवॉक के समय स्पेस स्टेशन रूसी परीक्षण से निकले कचरे के करीब से गुजरने वाला था. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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NASA ने कहा इतना समय नहीं बचा था कि हम खतरे का अनुमान लगा सकें लेकिन खतरा तो था. इसलिए स्पेसवॉक को कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया है. ऐसा पहली बार हुआ है जब अंतरिक्ष के कचरे की वजह से स्पेसवॉक को टाला गया है. रूस द्वारा अंतरिक्ष में जानबूझकर फैलाए गए कचरे की वजह से स्पेस स्टेशन पर मौजूद एस्ट्रोनॉट्स को सोयुज और ड्रैगन कैप्सूल में छिपना पड़ा था. ताकि अगर कचरा स्पेस स्टेशन को नुकसान पहुंचाए तो ये लोग दोनों कैप्सूल के जरिए धरती की ओर लौट सकें. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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रूस ने 14 नवंबर की रात या 15 नवंबर की सुबह एंटी-सैटेलाइट मिसाइल (ASAT) दागकर अपने सैटेलाइट कॉसमॉस-1408 (Cosmos-1408) को उड़ा दिया. इस सैटेलाइट का वजन 2000 किलोग्राम था. इसे साल 1982 में लॉन्च किया गया था. यह पिछले कुछ सालों से निष्क्रिय था. जब मिसाइल से इसे उड़ाया गया तब यह धरती से 485 किलोमीटर की ऊंचाई पर था. इससे थोड़ा ही नीचे की कक्षा में स्पेस स्टेशन धरती के चक्कर लगाता है. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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अमेरिका ने रूस की इस गलत हरकत की पुष्टि करते हुए इस घटना की निंदा की. यूएस डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट के प्रवक्ता नेड प्राइस (Ned Price) ने कहा कि रूसी फेडरेशन ने लापरवाही से भरी हरकत की है. जिसकी वजह से स्पेस स्टेशन पर मौजूद एस्ट्रोनॉट्स की जिंदगी खतरे में पड़ गई थी. रूस के इस टेस्ट की वजह से करीब 1500 से ज्यादा कचरा पैदा हुआ है. जो आसानी से दिखाई दे सकता है. लेकिन हजारों बारीक और छोटे टुकड़े भी निकले, जिन्हें करीब से देखना पड़ेगा.  रूस ने दुनियाभर के देशों के सैटेलाइट्स और स्पेस स्टेशन के लिए खतरा पैदा किया है. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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नेड प्राइस ने कहा कि इससे रूस के अंतरिक्षयात्रियों का जीवन भी खतरे में पड़ा. क्योंकि वो भी स्पेस स्टेशन पर मौजूद थे. इसके अलावा अन्य इंसानी अंतरिक्ष उड़ानों के लिए खतरा पैदा हो गया है. क्योंकि कॉसमॉस-1408 और मिसाइल का कचरा अब धरती की निचली कक्षा में तैरता रहेगा. ये किसी भी सैटेलाइट या लोअर अर्थ ऑर्बिट मिशन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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आपको बता दें कि अंतरिक्ष स्टेशन पर इस समय सात एस्ट्रोनॉट्स मौजूद हैं. जिन्हें कचरे के डर से सोयुज और ड्रैगन कैप्सूल में करीब 90 मिनट बिताने पड़े. सात एस्ट्रोनॉट्स में चार अमेरिकी, दो रूसी और एक जर्मन अंतरिक्षयात्री है. रूस ने यह परीक्षण करके दुनियाभर के देशों को चिंता में डाल दिया है. पेंटागन के प्रेस सेक्रेटरी जॉन एफ. किर्बी (John F. Kirby) ने रूस की इस हरकत की निंदा की है. उन्होंने बताया कि हमने अपना विरोध रूस को जता दिया है.  (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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इससे पहले रूस ने साल 2014 के बाद से अब तक 10 बार एंटी-सैटेलाइट मिसाइलों का परीक्षण किया है. उसके इस मिसाइल का नाम है नूडॉल एंटी-सैटेलाइट मिसाइल सिस्टम (Nudol Anti-satellite missile sytem). जिसे प्लेसेटेक कॉस्मोड्रोम से लॉन्च किया गया था. साल 2007 में चीन ने भी अपने सैटेलाइट पर मिसाइल से सीधा हमला करके काफी ज्यादा मात्रा में कचरा पैदा किया था. अमेरिका के मुताबिक चीन के सैटेलाइट के टूटने पर 3400 से ज्यादा बड़े टुकड़े अंतरिक्ष में फैले थे. आधे से ज्यादा कचरा तो आज भी अंतरिक्ष में घूम रहा है. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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मार्च 2019 में भारत ने एंटी-सैटेलाइट मिसाइल से एक छोटे सैटेलाइट को ध्वस्त किया था. जिससे सैकड़ों टुकड़े अंतरिक्ष में तैरने लगे थे. NASA के मुताबिक भारत का यह टेस्ट बेहद कम ऊंचाई पर था, इसलिए उससे निकलने वाला कचरा अपने-आप धरती के वायुमंडल में आकर खत्म हो जाएगा. अमेरिका ने खुद दो बार धरती की निचली कक्षा में अपने सैटेलाइट पर मिसाइल छोड़ा है. एक बार साल 2008 में और उससे पहले 1985 में. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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अब बड़ी दिक्कत ये है कि जिस ऊंचाई पर रूस ने अपने सैटेलाइट को उड़ाया है, उस कक्षा में किसी भी सैटेलाइट को लॉन्च करना एक बड़ी दिक्कत है. रूस की इस हरकत से एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) के 1800 स्टारलिंक इंटरनेट सैटेलाइट्स को भी खतरा है. ये सैटेलाइट्स 540 से 550 किलोमीटर की ऊंचाई पर धरती का चक्कर लगा रहे हैं. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स में फिजिक्स की प्रोफसर सुप्रिया चक्रबर्ती ने बताया कि ये बात है साल 1957 की जब सोवियत यूनियन ने पहला इंसान द्वारा निर्मित सैटेलाइट स्पुतनिक (Sputnik) अंतरिक्ष में लॉन्च किया था. इसके बाद से साल 2010 तक दुनियाभर के देशों द्वारा हर साल करीब 10 से 60 सैटेलाइट लॉन्च किए जा रहे थे. लेकिन 2010 के बाद तो जैसे सैटेलाइट्स की बाढ़ आ गई. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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प्रो. सुप्रिया के मुताबिक 2010 के बाद 2020 तक धरती की निचली कक्षा (Lower Earth Orbit - LEO) में 1300 से ज्यादा सैटेलाइट्स पहुंचाए गए. सिर्फ इसी साल यानी 2021 में सितंबर तक 1400 से ज्यादा सैटेलाइट्स लॉन्च किए गए. तो कुल मिलाकर इस समय धरती की निचली कक्षा में सितंबर 2021 तक 7500 से ज्यादा उपग्रह चक्कर काट रहे हैं. यह आंकड़ें संयुक्त राष्ट्र के आउटर स्पेस ऑब्जेक्ट्स इंडेक्स (UN Outer Space Objects Index) में दर्ज हैं. (प्रतीकात्मक फोटोः गेटी)

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