अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपना मंगल मिशन मार्स पर्सिवरेंस रोवर 18 फरवरी की रात ढाई बजे लाल ग्रह की सतह पर उतारा. इस मिशन से अमेरिका और नासा का नाम तो ऊंचा हो ही रहा है, लेकिन इससे दुनिया को क्या फायदा? आपको बता दें कि नासा ने भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो समेत, यूरोपियन स्पेस एजेंसी, यूएई की स्पेस एजेंसी और चीन की स्पेस एजेंसी CNSA को मार्स पर्सिवरेंस रोवर से संबंधित डेटा शेयर किया है. आइए जानते हैं कि इससे भारत समेत बाकी देशों को क्या फायदा होगा? (फोटोः NASA)
सबसे बड़ा फायदा तो ये होगा कि इससे इन सभी एजेंसियों के सैटेलाइट्स और स्पेसक्राफ्ट में आपस में टकराएं नहीं. क्योंकि चीन, भारत, यूएई और यूरोप के मार्स मिशन भी मंगल के चक्कर लगा रहे हैं. NASA ने कहा कि ये सुरक्षा और साइंटिफिक मिशन के हिसाब से ये बेहद जरूरी है. इससे बड़ा सवाल हम भारतीयों के लिए हैं. क्योंकि भारत इकलौता देश है और ISRO पहली स्पेस एजेंसी, जिसका मंगल मिशन पहली बार में ही सफल रहा था. क्या नासा के मार्स पर्सिवरेंस रोवर से भारत को कोई फायदा होगा. आइए समझते हैं इसके बारे में...(फोटोःNASA)
आज से करीब सात पहले की बात है. 30 सितंबर 2014 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) के बीच एक समझौता हुआ था. इस समझौते में धरती और मंगल ग्रह के मिशन साथ में मिलकर करने की बात हुई थी. उस समय इसरो चीफ थे डॉ. के. राधाकृष्णन और नासा के प्रमुख थे चार्ल्स बोल्डेन. वो उस समय की बात है जब नासा ने मंगल पर अपना मैवेन (Maven) और इसरो ने मंगलयान (Mangalyaan) भेजा था. (फोटोःगेटी)
टोरंटो में इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉटिकल कांग्रेस में शामिल होने गए दोनों साइंटिस्ट अलग से मिले. दोनों ने एक चार्टर पर हस्ताक्षर किया था. इसके बना नासा और इसरो ने मिलकर NASA-ISRO Mars Working Group बनाया था. मकसद था दोनों देशों की स्पेस एजेंसियों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देना. साथ ही मंगल ग्रह के भविष्य के प्रोजेक्ट्स में साथ मिलकर काम करना या फिर एकदूसरे से जरूरी डेटा और जानकारियां शेयर करना. (फोटोःNASA)
इसके अलावा NASA-ISRO सिंथेटिक अपर्चर राडार (NISAR) मिशन के लिए आपसी समझौता हुआ. इसके तहत ISRO और नासा (NASA) साल 2022 में इस सैटेलाइट को लॉन्च करने जा रहे हैं, जो पूरी दुनिया को हर प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं से बचाएगा यानी आपदा आने से काफी पहले सूचना दे देगा. ये दुनिया का सबसे महंगा अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट होगा. इसकी संभावित लागत करीब 10 हजार करोड़ रुपए आएगी.
NISAR के समझौते के समय राधाकृष्णन और बोल्डेन ने एक साथ कहा था कि इससे दोनों देशों को वास्तविक लाभ होंगे. जहां तक बात रही मार्स वर्किंग ग्रुप (Mars Working Group) की तो इसके तहत दोनों देश अपने-अपने मार्स मिशन से मिलने वाली जरूरी जानकारियां शेयर करेंगे. जैसे- मार्स पर्सिवरेंस रोवर मंगल पहुंचा है. भारत अपने मंगलयान-2 की तैयारी कर रहा है. माना जा रहा है इस बार इसरो मंगलयान-2 में मार्स पर लैंडर भेजेगा.
अगर इसरो मंगलयान-2 लॉन्च करेगा तो उसे नासा के मार्स पर्सिवरेंस रोवर से मिलने वाली जानकारियां काम आएंगी. मंगल ग्रह के मौसम, वातावरण, वायुमंडल आदि में हो रहे बदलावों की जानकारी मिलेगी. साथ ही नासा इसरो के साथ मिलकर मंगलयान-2 की टेक्नोलॉजी को अत्याधुनिक बना सकता है. इससे भारत और इसरो की मंगल ग्रह पर लैंडर उतारने की ख्वाहिश पूरी हो सकती है.
मार्स वर्किंग ग्रुप (Mars Working Group) से फायदा ये भी होगा कि दोनों देश और उनकी स्पेस एजेंसियां आपस में एकदूसरे के मंगल मिशन के डेटा शेयर करेंगे. इसके अलावा 1993 में एक इंटरनेशनल मार्स एक्सप्लोरेशन वर्किंग ग्रुप (IMEWG) भी बनाया गया था. जिसमें दुनिया की सारी स्पेस एजेंसिया शामिल हैं. इस ग्रुप की मीटिंग हर दो साल पर होती है. इसमें मंगल ग्रह के मिशन को लेकर हर एजेंसी बात करती है. अपना प्लान बताती है.
अगर भारत को साल 2024 में मंगलयान-2 की संभावित लॉन्चिंग करनी है तो उसे नासा के मार्स पर्सिवरेंस रोवर से मिले डेटा की जरूरत पड़ेगी. क्योंकि अभी तीन साल बाकी हैं. तब तक नासा का मार्स पर्सिवरेंस रोवर नासा को काफी जानकारियां उपलब्ध करा चुका होगा. ऐसे में उन जानकारियों में से भारत अपने काम की जानकारी नासा से मांग सकता है.