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साइंस न्यूज़

Pangong Lake Glaciers: पैंगोंग के ऊपर मौजूद ग्लेशियरों से खतरा! फ्लैश फ्लड से खाली हो सकती है झील

Pangong Lake Glaciers Melting
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ग्लेशियर्स (Glaciers) साफ पानी के बड़े स्रोत हैं. भारत की कई नदियां जैसे- गंगा, ब्रह्मपुत्र, घाघरा समेत अन्य हिमालय के ग्लेशियर से ही निकली हैं. अगर ग्लेशियर खत्म तो पीने का पानी खत्म. हिमालय के ग्लेशियर काफी तेजी से पिघल रहे हैं. हिमालय के पश्चिमी और पूर्वी हिस्से के ग्लेशियर बाकी हिमालयी हिस्सों की तुलना में ज्यादा तेजी से कम हो रहे हैं. ग्लेशियरों के पिघलने की अलग-अलग वजह है, लेकिन इनके खत्म होने से समस्या एक ही आएगी. वो है पानी की किल्लत (Shortage of Water). (फोटोः योगेंद्र सिंह/पेक्सेल)

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श्रीनगर स्थित कश्मीर यूनिवर्सिटी (University of Kashmir) में जियोइन्फॉर्मेटि्क्स और अर्थ साइंसेस के वैज्ञानिकों ने कश्मीर के कई ग्लेशियरों का अध्ययन किया. इन्होंने खास तौर से पैंगोंग लेक के आसपास के इलाकों में मौजूद ग्लेशियरों के पिघलने पर फोकस किया. इन वैज्ञानिकों ने देखा कि पैंगोंग इलाके (Pangong Region) में करीब 87 ग्लेशियर हैं, जो 1990 से लेकर 2019 तक अपने मुहाने की तरफ से पिघल चुके हैं. वो अपनी जगह से कई मीटर पीछे खिसक चुके हैं. ये वैज्ञानिक हैं - जियोइन्फॉर्मेटि्क्स डिपार्टमेंट के असिसटेंट प्रोफेसर इरफान राशिद और डॉक्टरेट स्टूडेंट उल्फत मजीद. अर्थ साइंसेज डिपार्टमेंट के नदीम अहमद नजर और नफीजा गुल. (फोटोः वत्सल भट्ट/अनस्प्लैश)

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aajtak.in से खास बातचीत में असिस्टेंट प्रोफेसर इरफान राशिद ने बताया कि पैंगोंग इलाके (Pangong Region) में मौजूद 87 ग्लेशियरों के मुहाने काफी तेजी से पिघले हैं. पहले ये समझना जरूरी है कि कश्मीर के किस इलाके में ग्लेशियर कितना पिघले हैं. इस तस्वीर में लाल रंग का बार बताता है ग्लेशियर कितने प्रतिशत पिघला है. नीला रंग बताता है कितने किलोमीट पीछे गया. कश्मीर में 7.58 किलोमीटर प्रति दशक की गति से ग्लेशियर पिघला. हरमुख में 6.33 KM प्रति दशक, लिड्डर में 5.43 KM/दशक, द्रास-सिंध में 6.6 KM/दशक, वारवन में 4.87 KM/दशक, सुरू में 1.3 KM/दशक, भुत में 3.3 KM/दशक, जंस्कार घाटी में 4.17 KM/दशक, ब्यास में 3.41 KM/दशक, लाहौल-स्पीति में 3.21 KM/दशक, कांग यात्जे में 3.41 KM/दशक, लद्दाख 5.56 KM/दशक और पैंगोग इलाके में 2.3 KM/दशक. (फोटोः फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस)

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प्रो. इरफान राशिद ने बताया कि अगर 1990 से 2019 तक की बात करें तो पैंगोंग इलाके (Pangong Region) में ग्लेशियरों में औसत 6.7% की कमी आई है. इसमें दो तरह के ग्लेशियर हैं. पहले क्लीन-आइस ग्लेशियर (Clean-ice Glacier) जो 8.4 फीसदी कम हुए हैं, जबकि डेबरी-कवर्ड ग्लेशियर (Debris-Covered Glaciers) में 5.7 फीसदी कमी आई है. हालांकि, अच्छी बात ये है कि लद्दाख में ग्लेशियरों के पिघलने का दर उत्तर-पश्चिम हिमालय के ग्लेशियरों की तुलना में कम है. साल 2000 से 2012 तक हिमालयन ग्लेशियर की बर्फ औसत 0.33 मीटर प्रति वर्ष की दर से पिघली है. (फोटोः फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस)

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प्रो. इरफान राशिद ने बताया कि पैंगोंग इलाके (Pangong Region) के आसपास चार प्रो-ग्लेशियर लेक (Proglacial lakes) बन गए हैं (गोल काले घेरे में). ये चारों छोटे हैं. औसत 6 हेक्टेयर के. इनसे किसी तरह का खतरा नहीं है. लेकिन इनपर नजर रखना जरूरी है. क्योंकि अगर यहां पर ग्लेशियर आउटबर्स्ट किसी वजह से होता है, तो पैंगोंग लेक के डाउनस्ट्रीम के आसपास मौजूद स्थाई या अस्थाई ढांचों को नुकसान पहुंच सकता है. पैंगोंग लेक में अगर ग्लेशियर फटने से पानी आता है, तो उससे कोई दिक्कत नहीं है. क्योंकि यह झील बहुत बड़ा है. लेकिन भविष्य में अगर पैंगोंग इलाके (Pangong Region) के डाउनस्ट्रीम की तरफ किसी तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा होता है तो ग्लेशियर से बनी झीलों के टूटने से उनका नुकसान हो सकता है. (फोटोः फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस)

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प्रो. राशिद ने बताया कि इन सभी ग्लेशियरों पर जाना मुश्किल है. इसलिए हमनें ग्राउंड पर जाकर स्टडी करने के साथ-साथ रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट का सहारा लिया है. इसके अलावा डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) की मदद से ट्रांस-हिमालयन लद्दाख में पैंगोंग झील के ग्लेशियरों के  पिघलने, मुहाने के पीछे हटने और जियोडेटिक मास चेंज का अध्ययन किया है. सैटेलाइट डेटा से पता चला कि 1990 से 2019 तक इस इलाके में 0.23% प्रति वर्ष की गति से ग्लेशियर पिघले हैं. (फोटोः इरफान राशिद)

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प्रो. इरफान राशिद ने बताया कि क्लीन-आइस ग्लेशियर (Clean-ice Glacier) जो 8.4% कम हुए हैं, जबकि डेबरी-कवर्ड ग्लेशियर (Debris-Covered Glaciers) में 5.7% कमी आई है. लेकिन इसमें ज्यादा खतरा डेबरी-कवर्ड ग्लेशियरों को है. क्योंकि इनकी सतह ज्यादा जल्दी कमजोर होने लगती है. पैंगोंग इलाके (Pangong Region) के ग्लेशियरों के पिघलने की दर इसलिए भी कम है, क्योंकि यह बाकी हिमालयी इलाकों की तुलना में काफी ज्यादा ऊंचाई और सर्दी वाले इलाके में हैं. लेकिन यहां भी ग्लेशियरों के पिघलने के दर में कमी नहीं आ रही है. राज्य के बाकी ग्लेशियरों के साथ-साथ ये भी तेजी से पिघल रहे हैं. बस बाकी से दर कम है. (फोटोः इरफान राशिद)

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लद्दाख और आसपास के इलाकों में पानी की कमी काफी ज्यादा है. अगर ग्लेशियर पिघल जाएंगे तो पानी की किल्लत बढ़ जाएगी. स्थानीय लोग खेती-बाड़ी नहीं कर पाएंगे. क्योंकि यहां के लोग पहाड़ी-मैदानी बर्फ और ग्लेशियरों से आने वाले पानी को बचाकर रखते हैं. उनका उपयोग बेहद संयम से करते हैं. उसी से खेती होती है. प्रो. इरफान ने बताया कि इससे एक दिक्कत ये है कि अगर सारे ग्लेशियर पिघल जाएंगे तो पैंगोंग लेक (Pangong Lake) भी सूख सकती है. अगर वह सूख जाएगी तो वहां आने वाले पर्यटकों को निराशा होगी. लद्दाख की अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा. (फोटोः इरफान राशिद)

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प्रो. राशिद ने कहा कि पैंगोंग लेक (Pangong Lake) पर आने वाले पर्यटकों को सीमित करना चाहिए. उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे अगर गंगा नदी के किसी तय इलाके में अगर हर दिन 100 लोग नहाते हैं, तो उससे उतना प्रदूषण नहीं होगा. न ही गंगा के इकोसिस्टम पर असर होगा. लेकिन अगर यह संख्या 10 गुना या 100 गुना बढ़ा दी जाए तो गंगा नदी के उस तय इलाके की कैरींग कैपेसिटी (Carrying Capacity) बिगड़ जाएगी. ठीक इसी तरह पैंगोंग लेक (Pangong Lake) के इकोसिस्टम को बचाने के लिए, जल प्रदूषण, थल प्रदूषण और वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार को सीमित पर्यटकों की नीति बनानी चाहिए. (फोटोः वत्सल भट्ट/अनस्पैल्श)

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प्रो. राशिद ने कहा कि लोगों को आने देना चाहिए पर सीमित मात्रा में. क्योंकि जितने ज्यादा लोग आएंगे, उतना ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा होगा. भारी मशीनों का उपयोग होगा. प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा. इससे पैंगोंग इलाके (Pangong Region) का औसत तापमान बढ़ेगा. जिससे उसके आसपास मौजूद ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा और ज्यादा बढ़ जाएगा. पर्यावरण के हिसाब से काम करना होगा. नहीं तो मुसीबत आने में ज्यादा समय नहीं लगेगी. (फोटोः स्टीवन लासरी/अनस्पैल्श)

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पैंगोंग इलाके (Pangong Region) भारत और चीन सीमा पर स्थित है. रणनीतिक स्तर पर यह बेहद महत्वपूर्ण इलाका है. क्या इन ग्लेशियरों के पिघलने से देश की सेना या भारतीय सीमा पोस्ट को कोई नुकसान हो सकता है? इस सवाल पर प्रो. इरफान ने कहा कि भारतीय सेना के पोस्ट और जवान आमतौर पर सुरक्षित स्थानों पर हैं. पैंगोंग इलाके (Pangong Region) में मौजूद ग्लेशियर बहुत बड़े या खतरनाक नहीं है. वो आसानी से टूटकर चोराबारी या चमोली जैसा हादसा पैदा नहीं करेंगे. न ही चीन की सरकार या हमारी सरकार ऐसा कोई रॉकेट या मिसाइल नहीं दागेगी जिससे ग्लेशियर टूट जाएं. क्योंकि ग्लेशियर अगर भारी मात्रा में टूटता है तो दोनों देशों को नुकसान होने की आशंका है. लेकिन ऐसा कुछ होने वाला नहीं है. (फोटोः गेटी)

Pangong Lake Glaciers Melting
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कश्मीरी हिमालयी ग्लेशियरों के बारे में स्टडी कम की गई है. कोई कहता है कि ये एडवांस हैं. कोई कहता है कि ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं. साल 2014 में लेह से 75 किलोमीटर दूर स्थित लेह-मनाली नेशनल हाइवे पर स्थित गांव गिया में. यह एक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट था. यानी ग्लेशियर की वजह से बनी झील का अचानक से फटना. यह झील 5400 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद थी. हमेशा बर्फ से ढंकी रहती थी. यहां तक की गर्मियों में भी. लेकिन इतनी ऊंचाई पर अगर कोई ग्लेशियर लेक बनती है तो उसके फटने से नीचे के इलाकों में भारी तबाही मच सकती है. (फोटोः फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस)

Pangong Lake Glaciers Melting
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प्रो. इरफान राशिद ने बताया कि इसके बाद लद्दाख के रुंबक गांव में पिछले साल अगस्त महीने में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट हुआ था. जिसकी वजह से 14 गांव में भारी तबाही आई थी. सड़कें, खेत, ब्रिज आदि बर्बाद हो गए थे. इसलिए फिर हमनें सोचा कि क्यों न पैंगोंग इलाके (Pangong Region) के ग्लेशियरों का इसी तरह अध्ययन किया जाए. क्योंकि वह इलाका बेहद ऊंचाई पर है. वहां पर लैंडस्लाइड (Landslide), भूकंप (Earthquake) या हिमस्खलन (Avlanche) भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट पैदा कर सकता है. भूकंप भी खतरनाक हो सकता है. क्योंकि जम्मू-कश्मीर भूकंप के जोन-4 और जोन-5 में स्थित हैं. (फोटोः फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस)

Pangong Lake Glaciers Melting
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प्रो. राशिद ने कहा कि पैंगोंग इलाके (Pangong Region) के ग्लेशियर भी खतरनाक हो सकते हैं लेकिन इसके लिए कई वजहें हो सकती हैं. पैंगोंग झील समुद्र तल से 4350 मीटर की ऊंचाई पर है. यह करीब 134 किलोमीटर लंबी और 5 किलोमीटर चौड़ी है. इसका पूरा इलाका करीब 604 वर्ग किलोमीटर का है. अगर किसी वजह से इसके ऊपर मौजूद ग्लेशियरों में आउटबर्स्ट होता है, या ग्लेशियल लेक्स बनकर टूटती है. तो खतरा बढ़ सकता है. वह भी पैंगोंग झील के डाउनस्ट्रीम की तरफ. क्योंकि ये ग्लेशियर झील के ऊपर 6700 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद हैं. वहां से आने वाला बहाव झील में दबाव बनाएगा, जिससे डाउनस्ट्रीम की तरफ नुकसान की आशंका है. यह रिपोर्ट हाल ही में फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है. (फोटोः सौरव भद्र/अनस्पैल्श)

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