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साइंस न्यूज़

रीढ़ की हड्डी में लगाया 'बिजली वाला इम्प्लांट', चलने लगे लकवाग्रस्त मरीज

paralyzed men implant spinal cord
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वैज्ञानिकों ने लकवाग्रस्त (Paralyzed) तीन लोगों को इलेक्ट्रोड इम्प्लांट (Electrode Implant) लगाकर चलने-दौड़ने और साइकिल चलाने लायक बना दिया. इन्हें अलग-अलग हादसों में रीढ़ की हड्डी (Spinal Cords) में चोट लगी थी. साइंटिस्ट ने इनकी रीढ़ की हड्डी में इम्प्लांट लगाकर उन्हें ठीक कर दिया. इस इम्प्लांट से निकलने वाली इलेक्ट्रिकल तरंगों ने रीढ़ की हड्डी की खास नर्व्स यानी तंत्रिका तंत्रों को एक्टिव कर दिया. (फोटोः गेटी)

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नर्व्स के एक्टिव होने से उसके आसपास की मांसपेशियां और उससे संबंधित शरीर की अन्य मांसपेशियां काम करने लगी. जैसे- पेट, पीठ, कंधे और पैर. इस प्रयोग को लेकर बनाई गई रिपोर्ट जर्नल Nature Medicine में प्रकाशित हुई है. नरम और लचीला इलेक्ट्रोड इम्प्लांट स्पाइन नर्व्स के ठीक ऊपर सेट किया गया था. जिसे टैबलेट में मौजूद एक सॉफ्टवेयर के जरिए नियंत्रित किया जा रहा था. (फोटोः गेटी)

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सॉफ्टवेयर पेट के अंदर लगाए गए पेसमेकर जैसे यंत्र से संपर्क साधता है. वह नर्व्स के आसपास मौजूद इलेक्ट्रोड को निर्देश भेजता है. इसके बाद लकवाग्रस्त इंसान जरूरत के हिसाब से काम करने लगता है. यानी टैबलेट से ही मरीज या उसके परिजन लकवाग्रस्त व्यक्ति को चला, दौड़ा सकते हैं. सॉफ्टवेयर में यह बात बताई गई है कि कौन सी चीज के लिए किस तरह का कमांड देना है. तैरने के लिए अलग, दौड़ने के लिए अलग, साइकिलिंग के लिए अलग. हर काम के लिए अलग-अलग स्टिमुलेशन एक्टिविटी. (फोटोः गेटी)

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लॉउसेन स्थित स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (EPFL) के न्यूरोसाइंटिस्ट और प्रोफेसर ग्रेगॉयर कोर्टीन ने एक बयान में कहा कि तीनों लकवाग्रस्त मरीज अब चल सकते हैं. दौड़ सकते हैं. पैडल मार सकते है. तैर सकते हैं. यहां तक कि अपने निचले हिस्से के मूवमेंट पर नियंत्रण कर सकते हैं. तीनों मरीज 29 से 41 साल के बीच के पुरुष हैं. प्रो. ग्रेगॉयर को उम्मीद है कि यह इम्प्लांट महिलाओं में भी काम करेगा. (फोटोः गेटी)

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लाउसेन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में न्यूरोसर्जरी की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जोसीलीन ब्लोश ने कहा कि इम्प्लांट लगाने के बाद तीनों मरीजों को उच्च स्तर की ट्रेनिंग दी गई. ताकि वो डिवाइस के साथ सेट हो सके. वो अपनी मासंपेशियों को कमांड के हिसाब से मूव कर सकें. उनका नियंत्रण कर सकें. शुरुआत में कुछ भी परफेक्ट नहीं होता. सुधारते-सुधारते चीजें बेहतर होती हैं. सिर्फ डिवाइस से काम नहीं चलता, इंसान की आत्मशक्ति को भी जगाना होता है. ट्रेनिंग भी जरूरी है. (फोटोः गेटी)

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डॉ. जोसीलीन ने बताया कि तीनों में एक मरीज मिशेल रोक्कटी ने चार महीने की ट्रेनिंग के बाद 1 किलोमीटर बिना रुके चलकर दिखाया. सिर्फ एक फ्रेम का सहारा लेना पड़ा ताकि संतुलन बना रहे. अब वह लगातार दो घंटे तक खड़ा हो सकता है. मिशेल रोक्क्टी की रीढ़ की हड्डी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त थी. जहां सबसे ज्यादा चोट थी, उसका निचले हिस्से का संपर्क दिमाग से टूट गया था. दिमाग का संदेश निचले हिस्से तक जाता ही नहीं था. मिशेल साल 2019 में एक मोटरसाइकिल हादसे में घायल हो गए थे. उन्हें शरीर के निचले हिस्से में कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था. पैरों से नियंत्रण भी खत्म हो गया था. (फोटोः गेटी)

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मिशेल रोक्कटी ने समाचार एजेंसी AFP को बताया कि जब पहली बार इलेक्ट्रिकल तरंगें उसके शरीर में दौड़ी और उसने पहला कदम रखा तब वह बहुत ज्यादा इमोशनल हो गया था. अब यह डिवाइस मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया है. मुझे अब पैरों में कुछ चीजें महसूस होने लगी है. मुझे यह महसूस होता है कि मेरा शरीर धरती से संपर्क बना रहा है. मेरी मांसपेशियां चलते-फिरते समय काम कर रही हैं. (फोटोः गेटी)

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यह नई डिवाइस वर्तमान में मौजूद स्पाइनल कॉर्ड स्टीमुलेटर्स (Spinal Cord Stimulators) पर ही आधारित है. वैज्ञानिकों की टीम ने इस स्टीमुलेटर्स में कुछ बदलाव किए और उसे इस लायक बना दिया कि वह मांसपेशियों को सक्रिय कर सके. ताकि लोग चल फिर सकें. तीनों मरीजों की रीढ़ की हड्डी की लंबाई के अनुसार ही इलेक्ट्रोड इम्प्लांट बनाए गए थे. सही लंबाई की वजह से उनकी रीढ़ की हड्डी में सही मात्रा और सही जगह पर इलेक्ट्रिकल तरंगें दौड़ पा रही थीं. (फोटोः गेटी)

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डॉ. जोसीलीन ब्लोश ने कहा कि अब इस डिवाइस का बड़े पैमाने पर परीक्षण किया जाएगा. ये ट्रायल अमेरिका और यूरोप में किए जाने की संभावना है. यह ट्रायल उन लोगों पर किए जाएंगे जो हाल-फिलहाल किसी हादसे की वजह से लकवाग्रस्त हुए हों. ट्रायल भी घायल होने के तुरंत बाद अगर शुरु हो जाए तो बहुत से लोगों को ज्यादा लंबा आराम मिल सकता है. रिकवरी तेज होती है. (फोटोः गेटी)

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पहले भी जानवरों पर की गई स्टडीज से यह पता चला है कि इलेक्ट्रिकल स्टीमुलेशन से उनके स्पाइनल कॉर्ड में सक्रियता आई है. उनके घाव जल्दी भरे हैं. वो चलने-फिरने लगे हैं. उनका लकवा भी ठीक हो गया है. अगर जल्दी यह डिवाइस लगाई जाए तो मरीज ज्यादा जल्दी ठीक हो सकते हैं. उन्हें दर्द से आराम मिल सकता है. वह अपनी शारीरिक गतिविधियों को सामान्य तरीके से पूरा कर सकते हैं. यह खबर Livescience में प्रकाशित हुई है.  (फोटोः गेटी)

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