42 साल पहले आर्कटिक समुद्री बर्फ जितनी थी, अब वह नहीं है. पिघल चुकी है. कम से कम सैटेलाइट से मिली तस्वीरें तो यही बताती है. लेकिन हाल ही में हुई एक स्टडी में और भी भयावह खुलासा किया गया है. इसमें बताया गया है कि इस सदी के अंत तक आर्कटिक सागर से बर्फ गायब हो चुकी होगी और साथ ही पोलर बीयर यानी ध्रुवीय भालू भी खत्म हो चुके होंगे. ध्रुवीय भालू के साथ-साथ बर्फीली दुनिया से जुड़े कई जीव-जंतुओं के खत्म होने की पूरी आशंका है. (फोटोःगेटी)
आर्कटिक में एक इलाका है, जिसे लास्ट आइस एरिया (Last Ice Area) कहते हैं. यहां पर सबसे पुरानी और मोटी बर्फ की परत है. यह करीब 10 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है. यह कनाडा के पश्चिमी तट से लेकर ग्रीनलैंड के उत्तरी तट तक अपना वर्चस्व फैलाकर रखती है. यह बर्फ की परत 13 फीट मोटी है. इसका नाम लास्ट आइस एरिया इसलिए रखा गया, क्योंकि वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह सदी के अंत तक नहीं पिघलेगी. लेकिन, अब ऐसा नहीं लग रहा है. (फोटोःगेटी)
बहुत कम बुरा सोचते हैं या विश्लेषण करते हैं तब भी वर्तमान जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और वैश्विक गर्मी (Global Warming) की वजह से साल 2050 तक आर्कटिक बर्फ की यह मोटी परत पिघल कर आधी से भी कम हो सकती है. अगले 50 सालों में यह पूरी तरह से खत्म हो जाएगी. इसके बाद इससे जुड़े सभी जीव, चाहे वह पोलर बीयर हों, पैंग्विंस हों या वॉलरस हों. या तो ये अन्य कम ठंडे इलाकों की तरफ भागेंगे, या फिर इनकी प्रजाति खत्म हो जाएगी. (फोटोःगेटी)
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के लैमोंट-डोहर्टी अर्थ ऑब्जरवेटरी के वैज्ञानिक रॉबर्ट न्यूटन ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि सबसे ज्यादा खतरा ध्रुवीय भालू (Polar Bear) को है. जिसका जीवन बर्फ ही है. अगर यह बर्फ न हो तो उसका जीवन खत्म समझिए. आर्कटिक से बर्फ पिघलने का मतलब है एक पूरी दुनिया का खत्म होना. एक नई प्रक्रिया की शुरुआत होगी, जिसके बारे में किसी को नहीं पता. वो अच्छी होगी या बुरी ये भी नहीं कह सकते. (फोटोःगेटी)
रॉबर्ट ने बताया कि आर्कटिक की बर्फ हर साल बढ़ती और पिघलती है. गर्मियों में यह अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंच जाती हैं. जबकि, सितंबर से फिर इसके बढ़ने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है. मार्च तक बर्फ की परत अपने अधिकतम स्तर पर रहती है. लेकिन जिस तरह से कार्बन डाईऑक्साइडज और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, उस हिसाब से वायुमंडल की गर्मी बहुत तेजी से बढ़ रही है. ज्यादा दिनों तक गर्मी रह रही है. जिससे ज्यादा बर्फ पिघल रही है. (फोटोःगेटी)
नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर (NSIDC) के मुताबिक पिछले 15 सालों में आर्कटिक की बर्फ 15 बार न्यूनतम स्तर पर गई है. जो कि एक खतरनाक बात है. 42 साल पहले जो सैटेलाइट सर्वे हुआ था, तब से लेकर अब तक लास्ट आइस एरिया (Last Ice Area) सिर्फ एक बार ही नहीं पिघली है, बल्कि वह हर साल पिघलती जा रही है. अगर और ज्यादा बर्फ पिघली तो यह इलाका धरती के नक्शे से खत्म हो जाएगा. इसके साथ ही खत्म हो जाएंगे कई प्यारे जीव. (फोटोःगेटी)
आर्कटिक की बर्फ पिघलने से बर्फ के ऊपर, नीचे चलने और रहने वाले जीवों पर असर पड़ेगा. जैसे फोटोसिंथेटिक एल्गी, छोटे क्रस्टेशियंस, मछलिया, सील्स, नारव्हाल्स, बोहेड व्हेल, पोलर बीयर, वॉलरस आदि. सबसे ज्यादा दिक्कत होगी रिंग्ड सील्स और पोलर बीयर को. क्योंकि इनका जीवन बर्फ है. ये बर्फ पर रहते हैं, उसी पर शिकार करते हैं. कई बार एकदूसरे का शिकार भी करने का प्रयास करते हैं. ये दोनों ही बेहतरीन शिकारी हैं. (फोटोःगेटी)
ध्रुवीय भालू यानी पोलर बीयर बर्फ के ऊपर रहता है, इसलिए वह ज्यादा बेहतर शिकारी बन जाता है. वह कई बार सील्स, वॉलरस और छोटी शार्क मछलियों तक का शिकार कर लेता है. जबकि, कमजोर जीव तो इससे बच ही नहीं पाते. सील्स सांस लेने के लिए बर्फ के ऊपर आते हैं तब पोलर बीयर इनपर हमला कर देता है. लेकिन साल 2015 में एक स्टडी सामने आई थी, जिसमें कहा गया था कि पोलर बीयर अपने खाने का तरीका बदल रहा है. (फोटोःगेटी)
पोलर बीयर अपना तय खाना नहीं मिलने पर समुद्री पक्षियों के अंडे आदि भी खा लेता है. ताकि उसे पर्याप्त ऊर्जा मिलती रहे. क्योंकि कई बार पोलर बीयर को देखकर सील्स और अन्य जानवर बर्फ के ऊपरी हिस्से पर नहीं आते. जिससे पोलर पीयर को खाने की दिक्कत होती है. अगर ऐसे ही खाने और बर्फ की दिक्कत होती रही तो पोलर बीयर खत्म हो जाएंगे. या फिर ये कम ठंडे इलाकों में आकर ग्रिजली भालू यानी भूरे-काले रंग के भालुओं के साथ क्रॉसब्रीडिंग करेंगे. (फोटोःगेटी)
पोलर बीयर और ग्रिजली बीयर के मिलन से जो भालू पैदा होगा उसे पिजली बीयर (Pizzly Bears) बुलाया जाएगा. भालुओं की यह नई प्रजाति कितनी खतरनाक होगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. क्योंकि इसमें हर तरह के पर्यावरण में रहने की क्षमता होगी. यह ठंडे से लेकर गर्म इलाकों तक शिकार करने लायक होगा. (फोटोःगेटी)