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साइंस न्यूज़

32 डिग्री का कोण...800 ग्राम का भाला... नीरज की करामात के पीछे छुपा है ये साइंस

Science Of Javelin throw
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टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर नीरज चोपड़ा ने पूरे देश को खुश कर दिया. भारत को एथलेटिक्स में पहला स्वर्ण पदक दिलाया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि नीरज ने जिस भाले को फेंका, उसकी कीमत क्या थी? उसका वजन कितना था? किस तकनीक से फेंकने पर वह 87 मीटर से ज्यादा दूरी तक पहुंचा? तकनीक के साथ-साथ नीरज चोपड़ा को किस तरह से आर्थिक सपोर्ट मिला, ताकि वो प्रैक्टिस कर सकें. ज्यादा मेहनत कर सकें. (फोटोः एपी)

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सबसे पहले बात करते हैं नीरज चोपड़ा (Neeraj Chopra) के उस भाले की कीमत की जिसे फेंक कर उन्होंने देश को एथलेटिक्स में पहला स्वर्ण पदक दिलाया है. इस एक भाले की कीमत करीब 1.10 लाख के आसपास है. स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के मुताबिक नीरज चोपड़ा के पास ऐसे 4 भाले हैं, जिनसे वो लगातार प्रैक्टिस कर रहे थे. इन चारों की कुल कीमत 4.35 लाख से थोड़ी ज्यादा थी. (फोटोः पीटीआई)

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अब बात करते हैं कि नीरज चोपड़ा के भाले का वजन कितना था, जिन्होंने उसे इतनी दूर फेंक दिया. ओलंपिक गेम्स के नियमों के अनुसार भाला फेंक में पुरुषों और महिलाओं के भाले के वजन तय होता है. पुरुष भाला फेंक प्रतियोगिता में भाले की लंबाई 2.6 से 2.7 मीटर के बीच होती है. इसका वजन 800 ग्राम होता है. जबकि महिलाओं के लिए भाले की वजन 600 ग्राम और लंबाई 2.2 से 2.3 मीटर होती है. अब बात करेंगे की नीरज चोपड़ा के ट्रेनिंग और प्रशिक्षण में कितना खर्च किया गया. 

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भारतीय और अन्य मीडिया माध्यमों में प्रकाशित खबरों के अनुसार भारत सरकार ने नीरज चोपड़ा की प्रैक्टिस, ट्रेनिंग, ट्रीटमेंट और अन्य सुविधाओं पर 7 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. नीरज चोपड़ा पर साल 2016 रियो ओलंपिक के बाद से लेकर अब तक टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) के तहत SAI ने 52.65 लाख रुपये खर्च किए गए हैं. वहीं, ACTC के तहत 1.29 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं. 

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द ब्रिज नाम के मीडिया संस्थान ने लिखा है कि नीरज चोपड़ा की विदेश में ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं पर 48,539,639 रुपये, कोच की तनख्वाह पर 12,224,880 रुपये और चार भालों पर 4.35 लाख रुपये खर्च किए गए. जो कुल मिलाकर 61,199,518 रुपये होता है. टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) में कुल मिलाकर 126 एथलीट्स और टीम को शामिल किया गया था. इसमें तीरंदाजी, बॉक्सिंग, कुश्ती, एथलेटिक्स, टेबल टेनिस, हॉकी और पैरा-स्पोर्ट्स शामिल हैं. (फोटोः पीटीआई)

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अब बात करते हैं भाला को सबसे दूर फेंकने की तकनीक यानी विज्ञान की. किसी भी शारीरिक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए ताकत, क्षमता, सहनशक्ति और ऊर्जा जैसी शारीरिक और मानसिक चीजों की जरूरत तो होती ही है. लेकिन इन सबसे ज्यादा जरूरी है, उस काम को करने की तकनीक यानी उसके पीछे का विज्ञान. भाले को कैसे फेंका जाए कि वो सबसे ज्यादा दूरी तय करके मेडल दिला सके. (फोटोः गेटी)

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भाला (Javelin) फेंकने के पीछे कुछ खास विज्ञान होता है. इसमें आपकी गति, हवा की गति, दिशा, एयरोडायनेमिक्स, फेंकने का एंगल, साथ ही भाला फेंकते समय उसे किस गति पर फेंकना है और कितने एंगल पर इसपर खुद का नियंत्रण. क्योंकि इनमें से एक भी फैक्टर बिगड़ा तो भाला तय स्थान तक नहीं जा पाएगा. तेजी से भाला फेंकने के लिए तीन स्टेप होते हैं. पहला तेजी से दौड़ना और क्रॉसओवर स्टेप. यानी 6 से 10 कदम तेजी से दौड़कर दो तीन कदम क्रॉसओवर स्टेप लेना होता है. (फोटोः गेटी)

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ये 6 से 10 कदम 5 से 6 मीटर प्रति सेकेंड की दर से दौड़ने की कोशिश करते हैं. यानी 20 KM प्रतिघंटा. जबकि भाला फेंका जाता है 28-20 मीटर प्रति सेकेंड यानी 100 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से. ये गति आखिरी के दो क्रॉसओवर स्टेप पर मिलती है. सेकेंड लास्ट क्रॉसओवर स्टेप को इंपल्स स्टेप (Impulse Step) कहते हैं. यह मूवमेंट क्रिकेट के फास्ट बॉलर की तरह होता है. (फोटोः गेटी)

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इसके बाद आखिरी स्टेप होता है डेलिवरी स्टेप (Delivery Step) जिसमें एथलीट अपने रनअप से बनी गति और ताकत का उपयोग करके भाला को फेंकता है. इसे शरीर की सारी ऊर्जा को हाथों में ट्रांसफर करने का प्रयास किया जाता है. ताकि भाला दूर तक जाए. यानी आपके शरीर की ऊर्जा नीचे से ऊपर कंधे तक जाती है, उसके बाद वही ऊर्जा की लहर कुहनियों की तरफ से होते हुए भाले तक भेजी जाती है. यह तब शुरु होता है जब एथलीट अपने पिछले पैर पर रुकता है. अगला पैर और भाला ऊपर की तरफ उठाता है. भाले की नोक आंखों की सीध में होती है. (फोटोः गेटी)

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इसके बाद डेलिवरी और रिकवरी. यानी पहला पैर जमीन पर होता है. शरीर के ऊपरी हिस्से का मूवमेंट हो रहा होता है. एथलीट नीचे झुककर ऊर्जा को संतुलित करके रुकता है. भाला फेंकने के लिए उसका कोण यानी एंगल बहुत जरूरी होता है. मेडल जीतने के लिए जरूरी है कि भाला फेंकते समय उसका सिरा 32 से 36 डिग्री के कोण पर हो. इसमें तीन एंगल्स का ख्याल रखा जाता है. एंगल ऑफ अटैक (Angle Of Attack), एंगल ऑफ एटीट्यूट (Angle of Attitude) और एंगल ऑफ वेलोसिटी वेक्टर (Angle of Velocity Vector). (फोटोः गेटी)

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एंगल ऑफ अटैक (Angle Of Attack) का मतलब होता है एथलीट के द्वारा तय दिशा और गति में फेंका गया भाला. यानी सही दिशा और गति है या नहीं. उसके बाद भाले का एंगल सही है या नहीं. यानी 32 से 36 डिग्री के बीच है कि नहीं. इसे देखने के लिए एथलीट एंगल ऑफ एटीट्यूट (Angle of Attitude) की प्रैक्टिस करते हैं. यानी भाले का जमीन से ओरिएंटेशन कैसा है. वह निश्चित ही परफेक्ट होना चाहिए. (फोटोः गेटी)

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इसके बाद एथलीट इस बात का ख्याल रखते हैं कि एंगल ऑफ वेलोसिटी वेक्टर (Angle of Velocity Vector) यानी भाले के उड़ान मार्ग के दौरान भाले के बीच का मास संतुलित रहता है या नहीं. यानी भाला उड़ान के समय हमेशा किसी कोण पर तो नहीं है. उसका केंद्र जीरो डिग्री पर होना चाहिए. (फोटोः गेटी)

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