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साइंस न्यूज़

कोरोना वायरस के Delta वैरिएंट से बचाने में कौन सी वैक्सीन कितनी कारगर?

Covid-19 Vaccines Delta Variant
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पूरी दुनिया को इस समय कोरोना वायरस डेल्टा वैरिएंट परेशान कर रहा है. इंग्लैंड में लॉकडाउन 21 जून से टलकर 19 जुलाई तक बढ़ाया जा सकता है. क्योंकि वहां सबको डर है कि डेल्टा वैरिएंट की वजह से अभी एक और दिक्कत आएगी. भारत में आई दूसरी लहर भी डेल्टा वैरिएंट की वजह से ही भयावह रही. कोरोना वायरस से बचने के लिए लोग वैक्सीन लगवा रहे हैं. वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां ये दावा करती हैं कि उनका टीका कोरोना के कई वैरिएंट से बचा सकता है. लेकिन कितना? इंग्लैंड में हुए एक अध्ययन में यह पता किया गया कि वहां की दो प्रमुख वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट से कितना बचा पाएंगी? आइए जानते हैं कि इस स्टडी में क्या कहा गया है? (फोटोःगेटी)

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कोरोना वैक्सीन ले चुके लोगों को कोविड-19 के संक्रमण से 90 फीसदी बचाव मिलता है, बजाय उनके जो वैक्सीन नहीं लगवा रहे. इसका मतलब ये है कि वैक्सीन लगवाने के बाद सिर्फ 10 फीसदी लोग ही ऐसे हैं जिन्हें दोबारा कोरोना वायरस का संक्रमण हो सकता है. वह भी किसी अन्य कोरोना वैरिएंट की वजह से. लेकिन डेल्टा वैरिएंट (Delta Variant) से कौन सी वैक्सीन बचाएगी? (फोटोःगेटी)

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डेल्टा वैरिएंट (Delta Variant) सबसे पहले पिछले साल अक्टूबर महीने में भारत में दर्ज किया गया था. इस समय इंग्लैंड में जितने भी नए मरीज कोरोना संक्रमण के सामने आ रहे हैं, उनमें से 90 फीसदी डेल्टा वैरिएंट से संक्रमित हैं. इसकी वजह से यूके की सरकार चिंता में है. परेशानी वाली बात ये है कि डेल्टा वैरिएंट के लिए कोई वैक्सीन बनी है. दुनिया में जितनी भी वैक्सीन बनी हैं, वो अल्फा वैरिएंट (Alpha Variant) के हिसाब से बनाई गई हैं. (फोटोःगेटी)

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आमतौर पर कोविड-19 के लिए बनी सारी वैक्सीन कोरोना वायरस की वजह से होने वाली गंभीर समस्याओं और मौत से लोगों को बचाती हैं. लेकिन नए वैरिएंट्स पर इन वैक्सीन का असर कम हो जाता है, क्योंकि नया वैरिएंट खुद को म्यूटेट करके स्वरूप बदल चुका होता है. ऐसा नहीं है कि वैक्सीन एकदम असर नहीं करती, लेकिन कोरोना वायरस के नए वैरिएंट से लड़ने की क्षमता में थोड़ी कमी आती है. (फोटोःगेटी)

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पब्लिक हेल्थ स्कॉटलैंड से जमा किए गए डेटा और द लैंसेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिन लोगों ने कोविड-19 से बचने के लिए फाइजर-बायोएनटेक (Pfizer-BioNTech Vaccine) की वैक्सीन ली है, उन्हें पहले कोरोना वायरस के अल्फा वैरिएंट से 92 फीसदी बचाव मिल रहा था लेकिन नए डेल्टा वैरिएंट के आने के बाद उन्हें फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन से मिलने वाला बचाव कम होकर 79 फीसदी हो गया. (फोटोःगेटी)

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दूसरी तरफ, ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका (Oxford-AstraZeneca Vaccine) की वैक्सीन लगावाने वाले लोगों को अल्फा वैरिएंट से पहले 73 फीसदी बचाव मिल रहा था, जो डेल्टा वैरिएंट के सामने कम होकर 60 फीसदी हो गया है. जिन्होंने फाइजर की पहली डोज ली है, उन्हें अल्फा वैरिएंट से 51 फीसदी और डेल्टा वैरिएंट से 33.5 फीसदी ही बचाव मिल पाएगा. लेकिन जब वैज्ञानिकों ने और गहन अध्ययन किया तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए. (फोटोःगेटी)

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फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन (Pfizer-BioNTech Vaccine) की दोनों डोज लेने वाले लोगों के शरीर में अल्फा वैरिएंट से बचने की संभावना 93.4 फीसदी बढ़ गई थी. जबकि, डेल्टा वैरिएंट से 88 फीसदी बचाव मिल रहा है. वहीं, ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन (Oxford-AstraZeneca Vaccine) के दोनों डोज लेने वालों का सुरक्षा कवच अल्फा वैरिएंट के 66 फीसदी से घटकर डेल्टा वैरिएंट तक 60 फीसदी हो चुकी थी. (फोटोःगेटी)

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ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन का असर कम क्यों है, इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. कोई भी वैक्सीन अलग-अलग वैरिएंट्स पर पूरी तरह काम नहीं करती. डेल्टा वैरिएंट पर ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन का असर कम तो इसका मतलब ये नहीं कि बाकी वैरिएंट्स पर भी यह कम होगा. यह किसी अन्य वैरिएंट पर ज्यादा हो सकता है. वैज्ञानिकों ने जो अंतिम निष्कर्ष निकाला है, उसके मुताबिक डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ फाइजर की वैक्सीन 88 फीसदी और ऑक्सफोर्ड का टीका 67 फीसदी असरदार है. (फोटोःगेटी)

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दूसरी जरूरी बात, अगर आपने फाइजर या ऑक्सफोर्ड के वैक्सीन की दोनों डोज लगवा ली है तो क्या डेल्टा वैरिएंट का संक्रमण होगा. तो इस पर हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि डेल्टा वैरिएंट का संक्रमण हो सकता है लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है. क्योंकि जब बात गंभीरता की आती है, तब ये दोनों ही वैक्सीन इंसान को गंभीर अवस्था में जाने से बचाती हैं. यानी डेल्टा वैरिएंट के संक्रमण के बाद आपको अस्पताल में भर्ती होने से दोनों ही वैक्सीन बचाने में सक्षम हैं. (फोटोःगेटी)

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फाइजर-बायोएनटेक की वैक्सीन (Pfizer-BioNTech Vaccine) की पहली डोज लेने के बाद डेल्टा वैरिएंट के संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती होने का चांस 94 फीसदी कम हो जाता है. दोनों डोज ले चुके हैं तो 96 फीसदी कम हो जाता है. ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका (Oxford-AstraZeneca Vaccine) की वैक्सीन की पहली डोज लेने के बाद डेल्टा वैरिएंट की वजह से अस्पताल में भर्ती होने का चांस 71 फीसदी और दूसरी डोज के बाद 92 फीसदी कम हो जाता है. (फोटोःगेटी) 

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