उत्तराखंड के रामनगर के पास स्थित जिम कॉर्बेट नेशनल टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ी है. वन्य अधिकारियों की मानें तो यहां फिलहाल 231 टाइगर हैं. नई गणना में संख्या बढ़ने की उम्मीद है. संभावना है सभी इलाकों को मिलाकर यहां पर बाघों की संख्या 300 पार कर जाए. रिजर्व के उपनिदेशक नीरज शर्मा कहते हैं कि नेचर, फॉरेस्ट और वाइल्डलाइफ कंजरवेशन के सालों से चल रहे प्रयासों का नतीजा है कि बाघों की संख्या बढ़ रही है. टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क, बफर जोन हर जगह बाघ की संख्या बढ़ी है. फिलहाल यहां पर 231 टाइगर हैं. नए सेंसस में संख्या बढ़ने की उम्मीद है. (फोटोः मुकेश यादव)
नीरज शर्मा के मुताबिक बाघों की संख्या बढ़ने पर बाघों का आपसी संघर्ष और इंसानों के साथ उनका संघर्ष बढ़ने की आशंका बढ़ जाती हैं. यह स्थिति दोनों के लिए अच्छी नहीं है. ऐसे में हमें देखना और मैनेज करना होगा कि किस इलाके में कितने टाइगर आराम से रह सकते हैं. फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकारियों और स्थानीय वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक इस पूरे क्षेत्र में 300 से ज्यादा बाघ हो सकते हैं. रामगर फॉरेस्ट डिवीजन में 38 के आस-पास बाघ रिकॉर्ड हुए थे. अभी इनकी संख्या 40 से 42 के बीच हो सकती है. आइए अब जानते हैं चार बाघ परिवारों की कहानी... (फोटोः मुकेश यादव)
क्वीन पारोः जिसे कोई नहीं दिखता, उसे पारो दिखती है
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर मुकेश यादव कहते हैं कि कहावत बड़ी फेमस है कि पूरे जिम कॉर्बेट में जिसे कोई टाइगर नहीं दिखता. उसे पारो दिखती है. मैं पिछले 25 सालों से कॉर्बेट आ-जा रहा हूं. लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि हमें हिरण दिखा, हाथी दिखा लेकिन बाघ नहीं दिखा. लेकिन लोगों को यह नहीं पता होता कि जंगल आपसे धैर्य मांगता है. यहां प्रदर्शनी नहीं चल रही. मेरी किस्मत इतनी अच्छी रही है कि लगभग हर बार बाघ देखने को मिले हैं. सबसे ज्यादा देखने को मिली है बाघिन पारो और उसके परिवार के सदस्य. (फोटोः मुकेश यादव)
मुकेश कहते हैं कि दस साल पहले तक कॉर्बेट के टाइगर कैमरे के सामने नहीं आते थे. शर्माते थे. बाघ हमेशा हिंसक नहीं होते. हमला या शिकार नहीं करते. ये कभी-कभी शर्माते भी हैं. तब पारो आई. वो लोगों के सामने आती थी. कैमरे के सामने पोज़ देती थी. उसे जिप्सी से डर नहीं लगता था. इसके बाद पारो ने तीन बार शावकों को जन्म दिया. पहली बार में हुए शावक बचे नहीं. दूसरी बार जन्मे शावकों में से एक ही नर शावक बचा. डेढ़ साल का होते ही इसे एक दूसरी बाघिन ने मार डाला. इसे लोग प्यार से प्रिंस बुलाते थे. और पारो को नाम दिया गया था क्वीन पारो. (फोटोः मुकेश यादव)
पारो और प्रिंस एकसाथ अक्सर फोटो खिंचवाते थे. कैमरे और जिप्सी की आवाज से घबराते नहीं थे. तीसरी बार पारो ने फिर शावकों को जन्म दिया. तीन मादा शावक पैदा हुए. अब ये तीनों अपनी मां के साथ रामगंगा नदी के आसपास देखे जाते हैं. कई बार पारो के साथ इन्हें देखा गया है. आराम करते. शिकार करते. पारो की एक शावक का नाम है पेड़वाली. क्योंकि ये पेड़ों पर अक्सर चढ़ती है. योगा के पोज़ देती है. (फोटोः मुकेश यादव)
पारो के तीनों मादा शावकों में दूसरे नंबर पर है परी. ये तीनों में सबसे बड़ी है आकार के मामले में. यह अक्सर पार इलाके में देखने को मिल जाती है. तीसरी बाघिन को आप वुडेन ब्रिज इलाके में देख सकते हैं. कॉर्बेट में लगातार बाघों की संख्या बढ़ रही है. इसलिए अब लोगों को अलग-अलग इलाकों में राज करने वाले बाघ परिवारों के सदस्यों की अलग-अलग या एकसाथ झलक मिल जाती है. हम अक्सर एक ही फोटो फ्रेम में 2 से 4 बाघ देख लेते हैं. हमें उम्मीद है कि जल्द ही पारो चौथी बार शावकों को जन्म देगी. (फोटोः मुकेश यादव)
ग्रासलैंड वाली और उसके तीन ताकतवर नर शावक
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और ट्रैवल एक्सपर्ट रोहित मनुजा कहते हैं कि जिम कॉर्बेट नेशनल वाइल्डलाइफ पार्क में बाघों को देखने के लिए सबसे प्रसिद्ध इलाकों में से एक है ढिकाला. यहां पर बड़े पैमाने पर ग्रासलैंड हैं. यानी हरी-भरी घास का बड़ा मैदान. चारों तरफ जंगल. पानी. शिकार के लिए छोटे जानवर. इसलिए यहां पर राज करता है बाघिन 'ग्रासलैंड वाली' और उसके बच्चों का परिवार. ये सब एकसाथ रहते हैं. शिकार करते हैं. बाघिन ग्रासलैंड वाली अपने तीन नर शावकों को आजकल शिकार करना सिखा रही है. (फोटोः रोहित मनुजा)
ग्रासलैंड वाली के इससे पहले जो शावक हुए थे वो दो-ढाई महीने में ही मारे गए थे. कहा जाता है कि इस इलाके में आने वाले नए नर बाघ ने उन बच्चों को मार डाला था. तब से ग्रासलैंड वाली बेहद सतर्क रहने लगी. अपने बच्चों का बहुत ख्याल रखने लगी. उनके आसपास कोई भी जीव आता है या आने की आशंका होती है तो बाघिन खतरनाक रूप अख्तियार कर लेती है. ग्रासलैंड वाली और उनके तीनों नर शावक ढिकाला की शान हैं. (फोटोः रोहित मनुजा)
रोहित ने बताया कि ग्रासलैंड वाली के पहले भी जो बच्चे हुए थे, उनमें एक बाघिन भी थी. वो भी आजकल अपनी मां और भाइयों के साथ दिखाई देती है. आमतौर पर एक ही बाघिन से जन्मे शावकों में इतनी बॉन्डिंग देखने को नहीं मिलती. लेकिन ये सब आजकल साथ में देखे जा रहे हैं. (फोटोः रोहित मनुजा)
ग्रासलैंड वाली के तीन नर शावकों में से कोई डॉमिनेंट या अल्फा मेल बन सकता है. ये फिर अपनी बड़ी बहन से संबंध भी बना सकते हैं. यानी इस इलाके में भविष्य में बाघों की संख्या कम होने की आशंका नहीं है. ग्रासलैंड वाली की वजह से ढिकाला इलाके में बाघों की संख्या बढ़ी है. करीब 7 सालों से ये पूरी टेरिटरी ग्रासलैंड वाली संभाल रही है. उसने कई बच्चे पैदा किए हैं. ये काफी बेहतरीन और सफल मां रही है. (फोटोः रोहित मनुजा)
झिरना के कोठी रौ इलाके के बाघ और उसके चार शावक
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर स्वास्तिक शर्मा कहते हैं कि मैं पिछले 13 सालों से बाघों की तस्वीरें ले रहा हूं. उनके पीछे भाग रहा हूं. लेकिन जितना शानदार नजारा जिम कॉर्बेट के बाघों ने दिया है, उतना कहीं नहीं मिला. आजकल तो वहां के बाघ धोखा देने में माहिर हो गए हैं. वो खुद को जंगल में इस तरह से छिपाते हैं कि पता ही नहीं चलता. स्वास्तिक बात कर रहे हैं जिम कॉर्बेट के प्रसिद्ध इलाके झिरना की. यहां भी बाघ का एक परिवार राज कर रहा है. (फोटोः स्वास्तिक शर्मा)
स्वास्तिक ने बताया कि उन्होंने इस परिवार को देखने से पहले मॉनसून में 74 सफारी की. बारिश, मिट्टी, गर्मी सबकुछ बर्दाश्त किया. तब कहीं जाकर इस शानदार परिवार से सामना हुआ. ये पूरा परिवार बिना किसी अलार्म कॉल के अचानक एकदम सामने आ गए. हम उस समय सड़क पर रुक कर पांच मिनट का ब्रेक ले रहे थे. तभी ये चारों सामने आ गए. रुक कर कैमरे की तरफ देखा. पोज़ दिया और फिर चले गए. (फोटोः स्वास्तिक शर्मा)
झिरना में कोठी रौ बाघ और उसके चार शावकों का राज चलता है. लेकिन आपको ये दिखेंगे या नहीं ये इनका फैसला होता है. हो सकता है कि ये आपको एक ही बार में एकसाथ दिख जाएं. या फिर इनमें से कोई एक या दो दिखे. अगर आप खुद को धैर्य के साथ झिरना में कुछ दिन या घंटे बिता सकते हैं तो आपको ये शानदार बाघों का परिवार देखने को मिल जाएगा.
सीताबनी की सीता, सेलेब्रिटी बाघिन जिसके परिवार को पूरे गांव ने पाला
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और ट्रैवलर नीरज उपाध्याय ने बताया कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के जंगल को काटता है रामनगर शहर और इसके बगल में बहती है कोसी नदी. कोसी नदी के पार वाले इलाके को कॉर्बेट लैंडस्केप के नाम से जानते हैं. रामनगर फॉरेस्ट डिवीजन के इस इलाके में एक सफ़ारी जोन है सीताबनी, जो अपने घने जंगल और प्राचीन मंदिर के लिए मशूहर है. साथ ही, एक गांव जो रामनगर शहर से 5-7 KM दूर है. टेड़ा नाम का यह गांव पूरे कोविड और लॉकडाउन के दौरान बेहद चर्चा में रहा. वजह थी एक घायल बाघिन और उसके तीन बच्चे. (फोटोः नीरज उपाध्याय)
सीतबनी में अक्सर दिखने वाली इस बाघिन का नाम वन्यजीव प्रेमियों ने सीता रख दिया. तीन बच्चों की सुरक्षा और दूसरे बाघों से संघर्ष के दौरान या शिकार के दौरान अगस्त 2020 में सीता की एक आंख चली गई. तीन बच्चों में एक नर और दो मादा हैं. घने जंगल में शिकार करना मुश्किल हुआ, तो सीता ने टेड़ा गांव और कोसी की तरफ रुख किया. सीता और उसके बच्चों की आमद से शहर की चौखट पर बसा यह गांव और सीताबनी का इलाका पहले से 10 गुना ज्यादा मशहूर हो गया. (फोटोः नीरज उपाध्याय)
बच्चों के अलग होने तक सीता करीब 2 साल तक इस इलाके में रही. इस दौरान उसने कई बार गांव के मवेशियों का शिकार किया. मवेशियों के शिकार से ही अपने बच्चों को शिकार की ट्रेनिंग दी. इस दौरान कभी-कभी सीता और उसका कुनबा गांववालों के खेतों, आंगन और घर के पीछे भी पहुंच जाते थे. हैरानी की बात यह है कि सीता ने इस पूरे इलाके में कभी इंसान पर हमला नहीं किया. गााड़ियों के सामने से या बगल से वह ऐसे गुजरती मानो हर किसी को जानती हो. (फोटोः नीरज उपाध्याय)
कोविड और लॉकडाउन की मार झेलने वाले ग्रामीणों ने अपने सबसे खराब समय में भी मवेशियों का नुकसान हो जाने पर भी सीता या उसके बच्चों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की. या उन्हें पकड़ने की शिकायत नहीं की. गांव वालों का कहना होता था कि सीता की वजह से उनको नई पहचान और पहले से ज्यादा मेहमान मिल रहे हैं. आस-पास की छोटी-छोटी चाय की दुकानों को पहले से ज्यादा आमदनी हो रही है. (फोटोः नीरज उपाध्याय)