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बोर होने पर दिमाग में क्या बदलता है, वैज्ञानिकों ने बताया क्यों जरूरी है ऐसा होना

बोर होने की कई अवस्थाएं हैं. साइंस मानता है कि इसकी एडवांस स्टेज में पहुंचना काफी फायदेमंद होता है. इसे प्रोफाउंड बोरडम कहते हैं जो किसी को भी बेहद क्रिएटिव बना देता है. यहां तक पहुंचने से पहले ही लोग अलग-अलग चीजों का सहारा लेने लगते हैं, जिससे वे ऊब से तो बच जाते हैं लेकिन कुछ बड़ा भी नहीं कर पाते.

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प्रोफाउंड बोरडम के दौरान लोग ज्यादा नया सोच पाते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
प्रोफाउंड बोरडम के दौरान लोग ज्यादा नया सोच पाते हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

खाली रहने पर आप क्या करते हैं! फोन उठाकर या तो किसी से गपियाते हैं, या फिर सोशल मीडिया पर जाने-अनजाने लोगों की तस्वीर देखने लगते हैं. कई बार कमेंट भी करते हैं. ये तब तक चलता है, जब तक कि कोई असल काम ना आ जाए. यानी आप बोरियत से बचे रहते हैं. ये खतरनाक है. बोर होने से बचने की कोशिश में एक वक्त ऐसा आएगा कि आपकी क्रिएटिविटी खत्म हो जाएगी. जी हां, कुछ नया करने के लिए जरूरी है कि आप बोर, बेहद बोर हो जाएं. ये बात साइंस कहता है.

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यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ और ट्रिनिटी कॉलेज आयरलैंड के शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक जॉइंट स्टडी की, जिसके नतीजे हैरान करने वाले रहे. इसके मुताबिक सोशल मीडिया बाकी दूसरी गड़बड़ियों के साथ एक मुश्किल ये भी दे रहा है कि उसके चलते हम बोर नहीं हो पा रहे. अध्ययन कोविड के लॉकडाउन के दौरान हुआ. इसमें शामिल लोगों से पूछा गया कि वे अपना समय कैसे बिताते हैं.

ज्यादातर लोगों ने माना कि खाली होते ही वे सबसे पहले अपना मोबाइल स्क्रॉल करते और सोशल मीडिया पर जाते हैं. इसे डूमस्क्रॉलिंग कहते हैं. इसमें यूजर कभी भी बोरियत के पहले लेवल तक पर नहीं पहुंच पाता क्योंकि वो नकारात्मक ही सही, लेकिन खुद को नई-नई जानकारियों से घिरा पाता है. हालांकि इसका बड़ा नुकसान है. वो कुछ नया नहीं कर पाता. ये स्टडी मार्केटिंग थ्योरी में प्रकाशित हुई. 

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boredom helps creativity while social media kills
ऊबने के दौरान दिमाग का बायां हिस्सा सक्रिय हो जाता है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

बोरियत को वैज्ञानिक दो स्तर में बांटते हैं. एक सुपरफिशियल बोरडम, यानी वो स्टेट जो शुरुआत में आती है. जैसे आप किसी लाइन में खड़े होकर इंतजार करते हैं तो जो महसूस होता है, वो भाव इसी श्रेणी में आता है. इसी दौरान आप मोबाइल पर बिल्ली की क्यूट वीडियो या बच्चों की तुतलाहट देखने लगेंगे. इससे आप बोरियत से बच तो जाएंगे लेकिन क्रिएटिविटी से भी रह जाएंगे. दरअसल इसी सुपरफिशियल स्टेट के बाद प्रोफाउंड बोरडम आता है. ये वो अवस्था है, जिसमें पहुंचने के बाद हम कुछ नया करने की सोचते हैं. 

इन दो मोटी श्रेणियों के बीच भी बोरियत को 5 स्टेट्स में बांटा गया है. पहला है इनडिफरेंट, जिसमें किसी लंबे काम के बाद हम थककर रुक जाते हैं और बोर होना चुनते हैं. ये एक तरह से हमें रिलैक्स करने वाली बोरियत है. दूसरी अवस्था है केलिब्रेटिंग, जिसमें हम सोचते रहते हैं लेकिन तय नहीं कर पाते कि क्या करें. इसके बाद आता है सर्चिंग वाला लेवल, जिसमें हम एक से दूसरी एक्टिविटी करते-छोड़ते हैं लेकिन कहीं टिक नहीं पाते. जैसे टीवी का चैनल जल्दी-जल्दी बदलते रहना. इसके बाद पारी आती है रिएक्टेंट बोरडम की. इस दौरान हम बोरियत को एकदम छोड़ने पर तुल आते हैं, फिर चाहे वो किसी माहौल के चलते हो, या किसी इंसान के. पांचवी स्टेट अपैथी की है, जो कि निगेटिव है. इस दौरान दिमाग में बेकार की बातें आने लगती हैं. लेकिन यही प्रोफाउंड बोरडम है.

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boredom helps creativity while social media kills
बोरियत की सुपरफिशियल अवस्था में ही लोग उससे बचने के तरीके खोज लेते हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

बड़े लेखक और साइंटिस्ट इसी प्रोफाउंड बोरडम की अवस्था में पहुंचने के बाद कुछ नया कर सके. मशहूर लेखिका अगाथा क्रिस्टी ने एक बार कहा था- बोरियत से बड़ी कोई प्रेरणा नहीं, जो आपको लिखने के लिए उकसा सके. बोरडम अपने-आप में बढ़िया नहीं, लेकिन इसके बाद जो होता है, वो अक्सर बढ़िया की ओर ले जाता है. ये बात आउट ऑफ माय स्कल- द साइकोलॉजी ऑफ बोरडम में कही गई है. कोविड के पहले लॉकडाउन के दौरान लिखी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से छपी इस किताब में ढेरों ऐसे हवाले हैं, जो बताते हैं कि बोर होना कितना जरूरी है. 

बोरियत पर वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी ने एक बड़ी स्टडी की थी, जिसमें ब्रेन मैपिंग के जरिए देखा गया कि ऊबभरा कोई काम करते हुए दिमाग में क्या बदलता है. इसके तहत 54 लोगों को एक सर्वे के नतीजे भरने को कहे गए, जिसमें कुछ भी नया नहीं था. इस दौरान 128 पॉइंट्स पर उनकी ब्रेन वेव्स पर नजर रखी गई. तब नजर आया कि बेहद ऊबे हुए लोगों के दिमाग का लेफ्ट फ्रंटल हिस्सा एक्टिव हो गया. ये वो हिस्सा है, जो कुछ नया सोचने या करने को उकसाता है.

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