सबसे पहले तो इसका इतिहास समझते चलते हैं, जो हमेशा से विवादित रहा. लंबे वक्त तक अमेरिका ने अपने सैनिकों को अफगानिस्तान और इराक में रख छोड़ा. ये लोग जब वापस घर लौटे तो कई तरह की मुश्किलें झेल रहे थे. ज्यादातर डिप्रेशन में चले गए और फैमिली के साथ नहीं रह सके. दबी जबान से ये भी कहा जाता है कि युद्ध से लौटे बहुत से सैनिकों ने खुदकुशी कर ली. वैसे इसमें काफी हद तक सच्चाई ही होगी क्योंकि इससे पहले भी जंग का इतिहास यही कहता है.
शरीर के बाकी अंगों से अलग व्यवहार करता है ब्रेन
लड़ाई या तकलीफें देख चुका ब्रेन शांति में भी अलग व्यवहार करता है. इसे ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरी (TBI) कहते हैं. अमेरिका के रक्षा विभाग पेंटागन ने सोचा कि ऐसे सैनिकों के दिमाग का बीमार हिस्सा हटा दिया जाए. फिलहाल ये तो मुमकिन नहीं है तो दूसरा तरीका ये सोचा गया कि उसमें चिप लगा दी जाए जो इमोशन्स को कंट्रोल कर सके.
रिपेयर नाम के प्रोजेक्ट की हुई शुरुआत
अमेरिका की बेहद तेज-तर्रार और चुपचाप काम करने वाली डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (DARPA) ने इसका जिम्मा लिया. उसने एक प्रोजेक्ट लॉन्च किया, जिसे नाम मिला रिपेयर. इस ब्रेन चिप प्रोजेक्ट को खूब गोपनीयता से शुरू किया गया. ये अलग बात है कि बात लीक हो गई, जिसे संभालने के लिए अमेरिकी सरकार को खुद बयान देकर बात पर लीपापोती करनी पड़ी. उन्होंने माना कि उनका इरादा सिर्फ दिमागी तकलीफ से जूझ रहे सैनिकों को वापस सामान्य बनाना है.
खबर लीक होने के बाद खतरों पर भी बात शुरू हो गई
कहा जाने लगा कि ये एक इंसान के दिमाग की सारी जानकारी, सारा तजुर्बा, यहां तक कि सारी गोपनीय बातें निकालकर एक कंप्यूटर चिप में डाल देने जैसा है. जाहिर सी बात है कि अगर चिप कंट्रोल कर सकेगी तो वो सबकुछ जान भी सकेगी. यानी ब्रेन-चिप की ये मर्जिंग काफी खतरनाक हो सकती है. इसके बाद भी स्टडी चलती रही. फिलहाल रिपेयर नाम के इस खास प्रोजेक्ट पर कोई भी पुख्ता जानकारी ओपन सोर्स में कहीं नहीं दिखती, सिवाय मोटा-मोटी बातों के.
इस तरह काम करते हैं प्रोजेक्ट में कर्मचारी
दर्पा के तहत लगभग 220 सीनियर एक बिल्डिंग के भीतर लगातार काम कर रहे हैं. इसका हेडक्वार्टर वर्जिनिया में है. इनके अलावा 2 हजार दूसरे लोग भी हैं, जो कॉन्ट्रैक्ट पर हैं. ये लैब में काम करने वाले जूनियर साइंटिस्ट या यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स हैं. इसकी दूसरी शाखाएं भी हैं, जो अलग-अलग तरह से, लेकिन एकदम सीक्रेसी में काम करती हैं. इसमें कथित तौर पर कर्मचारी खुद निगरानी में रहते हैं.
आर्मी को जॉम्बी बनाने की तैयारी?
साल 2015 में साइंस लेखिका एनी जेकबसन ने एक किताब लिखी थी- द पेंटागन्स ब्रेन. इसमें उन्होंने कहा था कि कैसे खुफिया तरीके से इसकी तैयारी हो रही है कि आर्मी को जॉम्बी बना दिया जाए. एनी डर जताती हैं कि चिप से सैनिकों का इलाज नहीं होगा, बल्कि उन्हें ऐसी मशीन में बदल दिया जाएगा जो बिना रूके हफ्तों लड़ाई कर सके. जिसे किसी पर दया न आए और जो सिर्फ कत्लेआम मचाए. सख्त से सख्त ट्रेनिंग भी सैनिक को कहीं न कहीं कमजोर बना देती है, लेकिन दिमाग में छेड़छाड़ करके उन्हें मशीन बनाया जा सकेगा.
चीन पर सीधे-सीधे DNA से छेड़छाड़ का आरोप
दिमाग से छेड़छाड़ का ये खतरा सिर्फ अमेरिका में नहीं, बल्कि कई देशों में होने की रिपोर्ट्स हैं. चीन एक अलग ही स्तर पर काम कर रहा है. अमेरिकी नेशनल इंटेलिजेंस ने दो साल पहले आरोप लगाया था कि चीन अपने सैनिकों से जीन्स में बदलाव कर रहा है ताकि उन्हें ज्यादा क्रूर बनाया जा सके. जीन एडिटिंग के टेक्नोलॉजी वैसी ही है जैसे दो अलग नस्ल के कुत्तों के मेल से नया कुत्ता बनाना, जो ज्यादा आक्रामक और हिंसक हो. हालांकि ये जेनेटिक एडिटिंग है, इसकी बात कभी और. फिलहाल हम ब्रेन इंटरफेस को और समझते हैं.
इस तरह होता है काम
ब्रेन इंटरफेस को ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) भी कहते हैं. ये एक तरह से ब्रेन और कंप्यूटर की मर्जिंग है, जैसे दो कंपनियों की होती है, जिसके तहत दिमाग के न्यूरॉन्स और कंप्यूटर चिप आपस में बात कर पाते हैं. यानी निर्देश का लेनदेन हो सकता है. इसकी शुरुआत सत्तर के दशक से ही हो गई थी, जिसे बाद में आधिकारिक तौर पर पेंटागन ने आगे बढ़ाया. अब एलन मस्क इसमें सबसे आगे निकल चुके हैं. उन्होंने दावा कि साल 2021 में ही उन्होंने एक बंदर के दिमाग में चिप डालकर उसे वीडियो गेम का पक्का खिलाड़ी बना दिया था.
मरीज के दिमाग का सारा डेटा कंप्यूटर के पास चला जाएगा
कंपनी न्यूरालिंक के इस प्रोजेक्ट के बारे में जो मोटी जानकारी सामने आई, उसके मुताबिक ये चिप एक छोटे सिक्के के आकार की होगी, जो लोगों खासकर मरीज के सिर के भीतर ट्रांसप्लांट हो जाएगी. चिप से छोटे-छोटे वायर निकले होंगे, जो हमारी बालों से भी 20 गुना ज्यादा बारीक होंगे. इसमें हजार से ज्यादा इलेक्ट्रोड लगे होंगे, जो ब्रेन की हरकतों को भी देखें, और उसे स्टिम्युलेट भी करें. यानी कोई काम करने की तरफ ले जाएं. यही डेटा कंप्यूटर में जाता रहेगा, जिसे वैज्ञानिक स्टडी करेंगे.
क्या वाकई गलती हो चुकी?
ब्रेन चिप तकनीक के कई फायदों के बीच डर भी लगातार सामने आ रहे हैं. खासकर जब से इस क्षेत्र में कई निजी कंपनियां और यहां तक कि स्टार्टअप भी आ गए. डर ये है कि इससे किसी इंसान की याददाश्त का कोई खास हिस्सा डिलीट करके उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा. हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है. जैसे अगर किसी की याददाश्त चली जाए तो चिप की मदद से मेमोरी फंक्शन को दोबारा जीवित किया जा सकता है. फिलहाल अपनी खोज पर बात कर रही सारी कंपनियां बस फायदे ही गिना रही हैं.