लगभग दो वर्षों तक भारी तबाही मचाने के बाद कोरोना वायरस अब शांत पड़ा हुआ है. कम से कम भारत में इसके मामले काफी कम हो चुके हैं, और डॉक्टर इसे सीजनल फ्लू बता रहे हैं. इस बीच कोविड संक्रमित हो चुके लोग लगातार भूलने या फोकस कम होने की शिकायत कर रहे हैं. ये ब्रेन फॉग है, जो याददाश्त से लेकर फैसले लेने की क्षमता तक पर असर डालता है. इसी ब्रेन फॉग से निपटने के लिए कोई डायट पर ध्यान दे रहा है, कोई एक्सरसाइज पर. वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो खुद को बिजली के हल्के झटके दे रहे हैं.
क्या है ब्रेन फॉग?
यह अपने-आप में कोई मेडिकल कंडीशन नहीं, बल्कि किसी मेडिकल कंडीशन से पैदा होने वाली स्थिति है. जैसे बुखार के बाद मुंह का कड़वा होना. इसी तरह किसी बीमारी के बाद अक्सर मरीज भूलने, मानसिक श्रम पर थकान होने की शिकायत करता है. ये लंबी बीमारी के बाद भी हो सकता है.
इन वजहों से भी पड़ता है असर
प्रेग्नेंसी के तुरंत बाद भी महिलाएं कई महीनों तक पोस्ट-प्रेग्नेंसी फॉग से जूझती देखी गईं. कोविड के मामले में वायरस ब्रेन के भीतर हल्की सूजन ला रहा था. इससे न्यूरॉन्स एक-दूसरे से कम्युनिकेट नहीं कर पा रहे थे, जिससे फॉग की स्थिति पैदा हुई. नींद की कमी, तनाव, जरूरत से ज्यादा मल्टीटास्किंग, और थायरॉइड में भी ये स्थिति दिखती है.
ब्रेन फॉग से छुटकारा पाने के लिए अब लोग एट-होम ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीक की मदद ले रहे हैं. यानी घर पर ही बिजली के झटके खाना ताकि दिमाग वापस रफ्तार से दौड़ने लगे. तकनीकी भाषा में इसे ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन या tDCS भी कहते हैं. इसमें सिर पर इलेक्ट्रोड्स जोड़ा जाता है ताकि दिमाग तक हल्का-हल्का इलेक्ट्रिकल शॉक पहुंच सके. ऐसा लगभग 20 मिनट के लिए किया जाता है.
मनोचिकित्सक अपनाते रहे कुछ इसी तरह की तकनीक
ब्रेन स्टिमुलेशन की ये तकनीक बहुत पुरानी है. अब तक ये अस्पतालों या क्लिनिक में डॉक्टरों की देखरेख में ही दी जाती रही. इसे ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन कहा जाता है, जिसमें सिर पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कॉइल लगाई जाती. इससे मैग्नेटिक पल्स नर्व सेल्स तक पहुंचकर उसे उद्दीप्त करतीं और मरीज को डिप्रेशन या कई तरह की मानसिक बीमारियों में आराम मिलता. एक और प्रैक्टिस भी है, जिसे डीप ब्रेन स्टिमुलेशन कहते हैं.
पार्किंसन्स जैसी गंभीर बीमारी में राहत देने के लिए इसमें मरीज के सिर में इलेक्ट्रोड्स डाल दिए जाते हैं. ये एक सर्जिकल प्रक्रिया है, जो गंभीर मरीजों पर ही अपनाई जाती है.
क्या कहता है अध्ययन?
पिछले साल नेचर न्यूरोसाइंस जर्नल में एक स्टडी प्रकाशित हुई. बोस्टन यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट रॉबर्ट हेनहार्ट ने अध्ययन के दौरान पाया कि अगर बड़ी उम्र के लोगों को ब्रेन पर हल्के इलेक्ट्रिक झटके दिए जाएं, तो लगभग महीनेभर तक वे दिमागी तौर पर खासे सक्रिय रहते हैं. 65 से 88 साल के डेढ़ सौ से ज्यादा लोग स्टडी में शामिल हुए थे, जिनमें से किसी को भी कोई न्यूरोलॉजिकल बीमारी नहीं थी. शोध में शामिल लोगों को सिर पर कैप पहनाकर लगातार 4 दिनों तक 20 मिनट के लिए इलेक्ट्रिक शॉक दिया गया. ये इतना हल्का था कि किसी को अहसास भी नहीं हुआ.
अध्ययन के साथ ही साइंटिस्टों ने माना कि ब्रेन स्टिमुलेशन अब क्लिनिकों या अस्पतालों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि घरों तक पहुंचने लगेगा. और यही हो भी रहा है.
ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन का इस्तेमाल वैसे तो लगभग दशकभर पहले अमेरिकी आर्मी में होने लगा था, लेकिन अब ये घरों तक पहुंच चुका. tDCS का इस्तेमाल तुरंत आराम के लिए हो रहा है. जैसे ब्रेन फॉगिंग से जूझते किसी शख्स का कोई ऑफिस प्रेजेंटेशन है, लेकिन वो फोकस नहीं कर पा रहा. ऐसे में वो एट-होम शॉक लेगा. इंटरव्यू देने से पहले भी लोग ऐसा कर रहे हैं.
इसमें भी इलेक्ट्रोड्स को सिर पर लगाया जाता है और फिर उपकरण ऑन कर दिया जाता है. इससे बिजली के हल्के-हल्के झटके ब्रेन तक पहुंचते हैं. इससे ब्लड सर्कुलेशन तेज होता है और न्यूरॉन्स एक्टिव हो जाते हैं. ये तर्क इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले दे रहे हैं.
ऑनलाइन भी मिलने लगी किट
ऑनलाइन साइट्स तक पर एट-होम डिवाइस मिलने लगी है. ये टीवी के रिमोट जितना बड़ा उपकरण होता है. साथ में बैटरीज, सिर पर लगाने वाला कैप जैसी चीजें होती हैं. अमेरिका में बढ़े इस ट्रेंड के साथ ये भी दावा है कि इसे फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन का ग्रीन सिग्नल मिल चुका है.
वैज्ञानिक क्यों आगाह कर रहे?
दूसरी तरफ बहुत से वैज्ञानिक इसका विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि बिजली के झटकों से मस्तिष्क कैसे और क्यों सक्रिय होता है, इसपर एक्सपर्ट खुद बहुत ज्यादा नहीं जानते. ऐसे में एट-होम स्टिमुलेशन बहुत खतरनाक हो सकता है. ये भी हो सकता है कि एक समय के बाद ब्रेन सामान्य ढंग से काम करना ही बंद कर दे.
लगभग 20 साल की उम्र तक मस्तिष्क का विकास हो रहा होता है. ऐसे में इस उम्र के लोग अगर स्टिमुलेशन टेक्नीक की मदद लें तो ये ब्रेन को रिवर्स भी कर सकता है. होम-किट एक तरह से ड्रग्स की तरह होगी. अगर घर पर रहे तो इसके गलत इस्तेमाल का खतरा बना रहेगा. यही वजह है ऑक्सफोर्ड और येल यूनिवर्सिटी इसके कमर्शियल यूज को रेगुलेट करने की बात भी कर रही हैं.