भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) के रॉकेट को असेंबलिंग यूनिट से निकालकर लॉन्च पैड की ओर रवाना कर दिया है. ये काम 6 जुलाई 2023 की सुबह-सुबह किया गया. लॉन्च पैड तक पहुंचने में इसे समय लगेगा. क्योंकि 640 टन वजनी रॉकेट को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं होता.
लॉन्चिंग श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से संभवतः 13 जुलाई की दोपहर 2.30 से 3.30 के बीच होगी. लॉन्चिंग के बाद लॉन्च व्हीकल मार्क-3 रॉकेट (LVM-3) के जरिए सैटेलाइट को 100 से 160 किलोमीटर की लोअर अर्थ ऑर्बिट में छोड़ा जाएगा. इसके बाद चंद्रयान-3 का प्रोपल्शन मॉड्यूल उसे लेकर धरती के चारों तरफ अलग-अलग समय पर पांच चक्कर लगाएगा. पांचों चक्कर पूरा करने के बाद चंद्रयान-3 सोलर ऑर्बिट में पहुंच जाएगा.
ये ऐसा ही है जैसे आप किसी शहर से निकलते हैं तो गलियों में घूमते हैं. यानी धरती की कक्षा. इसके बाद आप सोलर ऑर्बिट में पहुंचते हैं. यानी कि हाइवे या एक्सप्रेस वे. इसके बाद दूसरे शहर में अपने घर तक पहुंचने से पहले कई गलियों और सड़कों से गुजरते हैं. यानी चंद्रमा के चारों तरफ पांच चक्कर लगाने के बाद चंद्रयान-3 की लैंडिंग होगी.
लैंडिंग से ठीक पहले क्या होगा?
लैंडिंग से पहले चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर ऊपर के गोलाकार ऑर्बिट में चक्कर लगाएगा. इसके बाद चंद्रयान-3 का इंटीग्रेटेड मॉड्यूल 100X30 किलोमीटर की अंडाकार कक्षा में आएगा. जहां पर प्रोपल्शन मॉड्यूल चंद्रयान-3 के लैंडर मॉड्यूल को छोड़ देगा. प्रोपल्शन मॉड्यूल उसी कक्षा में चक्कर लगाता रहेगा. जबकि लैंडर चांद की सतह पर उतरना शुरू कर देगा.
चांद की जमीन पर कैसे उतरेगा चंद्रयान-3 का लैंडर?
चंद्रयान-3 के लैंडर में इस बार चार इंजन लगे हैं. इन्हें थ्रस्टर्स कहते हैं. हर इंजन 800 न्यूटन की ऊर्जा पैदा करता है. इसके अलावा लैंडर में चारों दिशाओं में कुल आठ छोटे इंजन हैं, जो यान को दिशा देने और घुमाने में मदद करेंगे. इनको लैंडर प्रोपल्शन सिस्टम कहते हैं. इनकी मदद से लैंडर चांद की सतह पर 2 मीटर प्रति सेकेंड की गति से नीचे उतरेगा. लेकिन यह सतह पर उतरते समय 0.5 मीटर प्रति सेकेंड की गति से होवर करेगा. यानी जैसे जमीन के ऊपर हेलिकॉप्टर धीरे-धीरे उतरता है.
सेंसर्स की मदद से जगह खोजकर उतरेगा लैंडर
चंद्रयान-3 के लैंडर में लैंडिंग की जगह का नेविगेशन और कॉर्डिनेट्स पहले से फीड है. सैकड़ों सेंसर्स लगे हैं. जो लैंडिंग और अन्य कार्यों में मदद करेंगे. लैंडर की लैंडिंग के समय ऊंचाई, लैंडिंग की जगह, गति, पत्थरों से लैंडर को बचाने में ये सेंसर्स मदद करेंगे. चंद्रयान-3 चांद की सतह पर 7 किलोमीटर की ऊंचाई से लैंडिंग शुरु हो जाएगी. 2 किलोमीटर की ऊंचाई पर आते ही इसके सेंसर्स काम करने लगेंगे. सेंसर्स के अनुसार ही लैंडर अपनी दिशा, गति और लैंडिंग साइट का निर्धारण करेगा.