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Climate Change: जलवायु परिवर्तन से बदला मच्छरों का व्यवहार, अब मलेरिया से लड़ना होगा मुश्किल 

जलवायु परिवर्तन के असर से मच्छर भी अछूते नहीं रहे. तापमान बढ़ने से मच्छरों का व्यवहार भी बदल गया है. अब ये मच्छर पहले से भी ज्यादा तेजी से विकसित हो रहे हैं और मलेरिया जैसे रोग फैला रहे हैं. बढ़ती गर्मी में मच्छरों से निपटना जितना मुश्किल होगा, उतना ही भारी होगा मलेरिया से लड़ना.

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गर्मी बढ़ेगी तो बढ़ेगा मलेरिया (Photo: Pixabay)
गर्मी बढ़ेगी तो बढ़ेगा मलेरिया (Photo: Pixabay)

जलवायु परिवर्तन का असर हर चीज पर पड़ रहा है. मच्छर भी इससे नहीं बचे हैं. बढ़ते तापमान और ज़्यादा बारिश ने मच्छरों जैसे छोटे कीड़ों के विकास और व्यवहार को भी प्रभावित किया है. हाल ही में दक्षिण अफ्रीका में हुए शोधों से पता चला है कि मच्छरों के बदलते व्यवहार की वजह से मलेरिया जैसे रोगों की रोकथाम पर गंभीर असर पड़ा है.

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वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिस तरह से तापमान बढ़ रहा है, 2035 तक दक्षिणी अफ्रीका का तापमान कम से कम 0.8⁰C बढ़ने का अनुमान है. वर्तमान में मलेरिया, दक्षिण अफ्रीका के तीन प्रांतों में मौजूद है: लिम्पोपो (Limpopo), पुमलंगा (Mpumalanga) और क्वाज़ुलु-नताल (KwaZulu-Natal). मलेरिया के 62% मामले लिम्पोपो से आते हैं.

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बढ़ते तापमान में मच्छर तेजी से वयस्क बनेंगे (Photo: Getty)

पिछले 50 सालों में दक्षिण अफ्रीका में वार्षिक तापमान वैश्विक औसत की तुलना में काफी तेजी से बढ़ रहा है. लिम्पोपो में तापमान सबसे ज्यादा बढ़ा है. यहां हर दशक में, तापमान में औसतन 0.12⁰C की वृद्धि हुई है. 

ये बढ़ता तापमान मलेरिया के खतरे को भी बढ़ाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि मलेरिया के मच्छर और पैरासाइट के लिए 17⁰C और 35⁰C के बीच का तापमान सबसे अच्छा होता है. गर्म मौसम में वेक्टर मच्छर (Vector mosquitoes) तेजी से विकसित होते हैं, नई जगहों पर जाते हैं और वेक्टर जनित बीमारियां फैला सकते हैं. और अगर बारिश थोड़ी भी बढ़ती है, तो इन मच्छरों की ब्रीडिंग की जगह भी बढ़ जाती हैं. लिम्पोपो में हुए शोध से पता चला है कि बसंत में गर्मियों के दौरान, जब भारी बारिश होती है तो मलेरिया के ज्यादा मामले सामने आते हैं.

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जलवायु परिवर्तन और मलेरिया के बीच एक जटिल संबंध है. लेकिन चार चीजें एकदम साफ हैं- जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म होगी मलेरिया वेक्टर तेजी से विकसित होगा, तेजी से प्रजनन करेगा, ज्यादा काटेगा और अलग-अलग जगहों पर अपना विस्तार करेगा. इसका मतलब है कि मच्छरों के लार्वा तेजी से वयस्क बन जाएंगे. मादा मच्छर जितना जल्दी काटेगी, उतनी ही जल्दी बीमारी फैलेगी. अगर वह ज्यादा काटेगी तो बीमारी ज्यादा फैलेगी.

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बारिश में मच्छरों की ब्रीडिंग की जगह बढ़ेगी (Photo: Getty)

मच्छर 22⁰C और 34⁰C के बीच तापमान पर लार्वा से वयस्क बनते हैं. दिलचस्प बात यह है कि शोध से पता चला है कि मच्छर ज्यादा समय तक ठंडी जगहों में आराम करके अपना व्यवहार बदल सकते हैं. इस तरह, तापमान बढ़ने पर भी वे जीवित रह सकते हैं. मच्छर का यह व्यवहार पैरासाइट को उस तापमान में जीवित रहने में मदद कर सकता है.

मलेरिया के फैलने में बारिश भी एक मुख्य भूमिका निभाती है. सामान्य तौर पर, गर्म लेकिन सुखे वातावरण में मलेरिया की घटनाएं घट जाती हैं और ठंडे और गीले वातावरण में बढ़ जाती हैं. यह दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में ज्यादा देखा जाता है, जहां मलेरिया वेक्टर एनोफिलीज अरेबियनसिस (Anopheles arabiensis), मुख्य है. मॉडलिंग प्रयोगों से पता चलता है कि ह्यूमिडिटी का स्तर भी दक्षिण अफ्रीका में मलेरिया के फैलने पर असर डालेगा. 

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मच्छरों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बहुत स्पष्ट है. लेकिन मलेरिया के फैलने पर इसका प्रभाव अभी भी स्पष्ट नहीं है. कुछ शोधों के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन की वजह से मलेरिया के मामलों में वृद्धि हुई है, लेकिन अन्य मॉडलों का सुझाव है कि जलवायु परिवर्तन का मलेरिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. कौन सा मॉडल सही है यह देखने के लिए अभी और ज्यादा डेटा की जरूरत है. पर एक बात तो है, ये शोध भले ही दक्षिण अफ्रीका में किया गया हो, लेकिन भारत की स्थिति भी यहां से ज्यादा अलग नहीं है. 

 

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