गर्मी में आपको पसीने छूट जाते हैं. ऐसा हिमालय के साथ भी होता है. समंदर के साथ भी. हिमालय का पसीना छूटता है तो ग्लेशियर पिघलते हैं. फ्लैश फ्लड आता है. समंदर का पसीना छूटता है तो तेज बारिश, चक्रवाती तूफान, समुद्री बाढ़ आती है. जलस्तर बढ़ता है. शहर, द्वीप और तट डूबते हैं.
अगर हिमालय का तापमान साल 2100 तक डेढ़ डिग्री सेल्सियस और बढ़ गया तो हिमालय के आधे से ज्यादा ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे. इससे पहले इनके पिघलने से ग्लेशियल लेक्स बनेंगे. यानी ग्लेशियर के रिसने से बनने वाली झीलें. जैसे केदारनाथ के ऊपर चोराबारी झील बनी थी. तापमान बढ़ेगा तो बेमौसम बारिश होगी.
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बारिश तेज हुई या बादल फटे तो ये ग्लेशियल लेक्स टूटेंगी. अगर हिमालय पर मौजूद सारे ग्लेशियल लेक्स एकसाथ टूट जाएं तो हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्वी राज्यों में भारी आपदा आएगी. इधर से बहकर नीचे यानी समंदर की तरफ गया पानी समुद्र का जलस्तर बढ़ाएगा. जिससे कई तटीय शहरों के डूबने का खतरा पैदा होगा. ये तो बात हिमालय से आने वाली सुनामी की है... लेकिन समंदर का पानी बढ़ा तो सबसे पहले क्या होगा? कौन सा शहर पहले डूबेगा...
साल 2100 तक कौन-कौन से शहर डूबेंगे पानी में...
चेन्नई... शहर का तटीय इलाका 1.87 फीट हिस्सा डूब जाएगा. ये आंकड़ा देखने में कम लगता है. लेकिन जब आप इसे बड़े पैमाने पर देखें तो पता चलेगा कि कई वर्ग किलोमीटर का इलाका पानी में डूब गया.
मुंबई... इस शहर की हालत ज्यादा खराब होगी. सात द्वीपों से बना मुंबई का बड़ा इलाका 1.90 फीट समंदर में डूब जाएगा. यानी तटों की चौड़ाई कम हो जाएगी. पानी शहरी इलाकों के नजदीक पहुंच जाएगा.
तूतीकोरीन... तटीय शहर का बड़ा इलाका 1.90 फीट पानी में चला जाएगा. यहां तत्काल जलवायु परिवर्तन से निपटने की जरूरत है.
विशाखापट्टनम... भारतीय नौसेना का पूर्वी मुख्यालय. खूबसूरत तटों से भरा यह शहर साल 2100 तक 1.77 फीट पानी में डूब जाएगा. यह एक खतरनाक स्थिति है. इससे बचने के लिए नौसेना को भी लगना होगा.
भावनगर... गुजरात का ये शहर तो साल 2100 तक 2.70 फीट पानी के अंदर होगा. आप ही सोचिए इतना पानी जब बड़े पैमाने पर फैलेगा, तो कितना ज्यादा वर्ग किलोमीटर का इलाका पानी के अंदर जाएगा.
कोच्चि... ये शहर तो अगले 26 साल में डूबने की कगार पर है. कोच्चि की हालत बहुत ज्यादा गड़बड़ है.
मैंगलोर... ये शहर भी 2050 तक डूब जाएगा. इसकी भी हालत बहुत ज्यादा खराब चल रही है.
तिरुवनंतपुरम... 2050 तक यह शहर भी डूबने की कगार पर होगा.
कोलकाता... पश्चिम बंगाल की राजधानी के साथ भी यही होने वाला है.
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पहाड़ से समंदर के पानी तक... कैसे आएगी आपदा?
देश के हिमालयी राज्यों में फ्लैश फ्लड और बादल फटने की घटनाएं साल-दर-साल बढ़ती जा रही हैं. भारतीय हिमालय का इलाका बेहद संवेदनशील है. जम्मू-कश्मीर, लेह-लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्वी राज्य. इन सभी जगहों पर हर मॉनसून में किसी न किसी तरह की बड़ी आपदा आ ही जाती है.
जून से लेकर सितंबर-अक्टूबर तक कहीं न कहीं कोई न कोई आपदा जरूर आती है. जिस हिसाब से गर्मी बढ़ रही है, ऐसे में पश्चिमी विक्षोभ के आने की संख्या और तीव्रता बढ़ जाएगी. ये बेमौसम बरसात करवाएगा. जिससे फ्लैश फ्लड आएंगे. ये फ्लैश फ्लड तेजी से निचले इलाकों को बाढ़ में डुबा देंगे. इनके रास्ते में जो आएगा वो बह जाएगा. बढ़ते तापमान की वजह से हिमालय की ओर बारिश का पैटर्न बदल रहा है.
क्लाइमेट चेंज की वजह से लगातार बारिश बढ़ रही पहाड़ों की तरफ
लगातार हो रहे कार्बन उत्सर्जन और क्लाइमेट चेंज की वजह से ट्रॉपिकल बारिश शिफ्ट हो रही है. यह उत्तर की तरफ जा रही है. यह पूरी दुनिया में हो रहा है लेकिन इसका भारत पर भी सीधे तौर पर पड़ रहा है. पिछले कुछ वर्षों को देखिए... बारिश ज्यादा से ज्यादा उत्तर की तरफ जा रही है. हिमालय की तरफ. जिससे बड़ी आपदाएं आ रही हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के क्लाइमेट साइंटिस्ट्स ने स्टडी करके यह खुलासा किया है. जलवायु परिवर्तन की वजह से भूमध्य रेखा के आसपास बारिश में बदलाव हो रहा है. तेजी से बढ़ता उत्सर्जन बारिश को उत्तर दिशा की तरफ धकेल रहा है. यह कोई आसान प्रक्रिया नहीं है. बेहद जटिल परिस्थितियों का समूह है. जो बारिश को साल-दर-साल नॉर्थ की तरफ बढ़ा रहा है.
अगले 20 साल उत्तर की ओर जाएगी बारिश, फिर हजार साल दक्षिण
स्टडी करने वाले शोधकर्ता वेई लियू ने बताया कि बारिश का उत्तर दिशा की तरफ जाना अगले दो दशकों तक होता रहेगा. फिर दक्षिणी महासागरों के गर्म होने से बनने वाला मजबूत प्रभाव इस तरह के मौसम वापस दक्षिण की ओर खींच लेगा. उन्हें अगले हजार सालों तक वहीं बनाए रखेगा.
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2020 से 2022 तक इन राज्यों में आई बाढ़
देश के सेंट्रल वाटर कमीशन ने बाढ़ को दो तरह से बांटा है. पहला सीवियर फ्लड और दूसरा एक्सट्रीम फ्लड. आमतौर पर जो मैदानी इलाकों में आता है. साल 2020 में पूरे देश में 88 सीवियर फ्लड और 48 एक्सट्रीम फ्लड की घटनाएं दर्ज हुई थीं. 2021 में पूरे देश में 87 सीवियर फ्लड और 58 एक्स्ट्रीम फ्लड दर्ज किए गए.
2022 में 95 सीवियर फ्लड और 89 एक्सट्रीम फ्लड की घटनाएं दर्ज की गईं. आप साफ तौर पर देख सकते हैं कि मैदानी इलाकों में भी एक्सट्रीम फ्लड यानी चरम बाढ़ की घटनाएं हर साल बढ़ती चली गई हैं. उत्तराखंड में हर साल सीवियर और एक्सट्रीम फ्लड की घटनाएं हुईं हैं. असम और सिक्किम में भी भयानक बाढ़ आई थी.
पहाड़ों पर बढ़ जाती हैं बादल फटने की घटनाएं
पहाड़ों पर सबसे बड़ी आपदा की वजह बादल का फटना और फ्लैश फ्लड ही होता है. क्योंकि आसमान से भारी मात्रा में पानी गिरता है. इसके बाद तेज पानी का बहाव तेजी से निचले इलाकों में तबाही ला देता है. हर साल दुनिया में 8 करोड़ से ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं. इसमें अपना देश भी है. कई खूबसूरत राज्य भी हैं.
भारतीय हिमालय में मॉनसून के सीजन में बादल फटने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. क्योंकि मॉनसून चाहे जब और जितनी भी गति से क्यों न आए. इसके स्वरूप को हिमालय बदल देता है. उदाहरण के तौर पर 2013 का केदारनाथ हादसा है. बादल पहाड़ों को पार नहीं कर पाए और चोराबारी ग्लेशियर के ऊपर फट पड़े.
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उत्तराखंड बेहद संवेदनशील, हर साल कोई न कोई बड़ी आपदा
बादल फटने के बाद फ्लैश फ्लड, ग्लेशियर टूटने की घटना, भूस्खलन, हिमस्खलन जैसी घटनाएं आम हैं. यह निर्भर करता है कि बादल किस इलाके में फटा है. फ्लैश फ्लड की वजह से जानमान का काफी ज्यादा नुकसान होता है. 7 फरवरी 2021 को नंदा देवी ग्लेशियर का हिस्सा टूटा. जिसकी वजह से चमोली जिले में फ्लैश फ्लड आया. 15 लोग मारे गए. 150 लोग लापता हो गए.
हिमालय का उत्तराखंड का इलाका बेहद संवेदनशील है. यहां पर 1970, 1986, 1991, 1998, 2001, 2002, 2004, 2005, 2008, 2009, 2010, 2012, 2013, 2016, 2017, 2019, 2020, और 2021 में हर साल प्राकृतिक आपदाएं आई हैं. इसके पीछे एक वजह है पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता. जो इंसानों द्वारा किए जा रहे जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर आपदाओं को बुलाता है.
बादलों के फटने की वजह है ऊंचाई और मौसम
उत्तराखंड में 3000 मीटर की ऊंचाई पर बारिश के बाद बर्फ जम जाती है. यहीं से बर्फबारी की शुरुआत होती है. मार्च और अप्रैल में तापमान अधिकतम तापमान 34 से 38 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. मई जून में यह बढ़कर 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. सितंबर के बाद तेजी से पारा नीचे गिरना शुरू होता है.
उत्तराखंड में अगर बादलों के फटने की घटना देखें तो 2020 से 2021 के बीच मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ों पर ही ज्यादा बादल फटे हैं. यानी 1000 मीटर से 2500 मीटर की ऊंचाई तक. कम या ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में बादल फटने की घटनाएं कम होती हैं. यानी पहाड़ों की ऊंचाई और बादलों के फटने का आपसी संबंध है.
2020 से 21 के बीच उत्तराखंड में 30 बार बादल फटे. 17 घटनाएं 2021 में हुई. सबसे ज्यादा बादल फटने की घटना उत्तरकाशी (07), फिर चमोली में पांच, देहरादून और पिथौरागढ़ में चार-चार घटनाएं. रुद्रप्रयाग में तीन और टिहरी, अल्मोड़ा और बागेश्वर में एक-एक घटनाएं हुईं. ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में बादल फटने की वजह से फ्लैश फ्लड की घटनाएं भी ज्यादा हुईं.
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जितनी गर्मी बढ़ेगी, तटीय शहरों के डूबने का खतरा भी ज्यादा होगा
अगर 2100 तक समुद्री जलस्तर बढ़ता रहेगा तो मुंबई की कम से कम 1000 इमारतों पर असर पड़ेगा. कम से कम 25 km लंबी सड़क खराब होगी. हाई टाइड में 2490 इमारतें और 126 km लंबी सड़क पानी में होगी. यह स्टडी पिछले साल जुलाई में RMSI ने की थी. मुंबई के हाजी अली दरगाह, जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे, बांद्रा-वर्ली सी लिंक, मरीन ड्राइव पर क्वीन नेकलेस ये सब डूबने की कगार पर पहुंच जाएंगे.
बढ़ते समुद्री जलस्तर की मार कोच्चि, मैंगलोर, चेन्नई, विशाखापट्टनम और तिरुवनंतपुरम को भी बर्दाश्त करना होगा. उत्तरी हिंद महासागर 1874-2004 के बीच हर साल 1.06 से 1.75 mm की गति से बढ़ रहा था. यह 1993 से 2017 के बीच 3.3 mm प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा था. 1874 से लेकर 2005 तक देखिए तो हिंद महासागर करीब एक फीट ऊपर आ चुका है.
मौसम विज्ञानी कहते हैं कि समुद्री जलस्तर बढ़ने की वजह ग्लोबल वॉर्मिंग है. तापमान में अगर वैश्विक स्तर पर एक डिग्री सेल्सियस का इजाफा होता है, तो तूफान भी बढ़ेंगे. भारत के पश्चिमी तटों पर पिछले चार साल में चक्रवातों की संख्या 52 फीसदी बढ़ी है. साल 2050 तक तापमान अगर 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है, तो इन चक्रवातों और तूफानों की संख्या में बहुत ज्यादा इजाफा हो जाएगा. हो सकता है ये तीन गुना बढ़ जाएं.
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अगले दो दशकों में ही तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. जब इतना तापमान बढ़ेगा, तो जाहिर सी बात है कि ग्लेशियर पिघलेंगे. उसका पानी मैदानी और समुद्री इलाकों में तबाही लेकर आएगा. भारत के 12 शहर साल 2100 तक आधा फीट से लेकर करीब पौने तीन फीट समुद्री जल में समा जाएंगे.
साल 2100 तक सबसे ज्यादा जिन शहरों को खतरा है, वो हैं- भावनगरः यहां समुद्री जलस्तर 2.69 फीट बढ़ेगा. कोच्चि में 2.32 फीट की बढ़ोतरी होगी. मोरमुगाओ में 2.06 फीट, ओखा (1.96 फीट), तूतीकोरीन (1.93 फीट), पारादीप (1.93 फीट), मुंबई (1.90 फीट), मैंगलोर (1.87 फीट), चेन्नई (1.87 फीट) और विशाखापट्टनम (1.77 फीट). ये सभी तटीय इलाकों में कई स्थानों पर प्रमुख बंदरगाह है. व्यापारिक केंद्र हैं. कारोबार होता है.
अगले दस सालों में इन 12 शहरों में समुद्री जलस्तर कितना बढ़ेगा, वो भी जान लीजिए. कांडला, ओखा और मोरमुगाओ में 3.54 इंच, भावनगर में 6.29 इंच, मुंबई 3.14 इंच, कोच्चि में 4.33 इंच, तूतीकोरीन, चेन्नई, पारादीप और मैंगलोर में 2.75 इंच और विशाखापट्टनम में 2.36 इंच.
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चार दशकों में भयानक तेजी से बढ़ी गर्मी
पिछले 40 सालों से गर्मी जितनी तेजी से बढ़ी है, उतनी 1850 के बाद के चार दशकों में नहीं बढ़ी थी. साथ ही वैज्ञानिकों ने चेतावनी भी दी है कि अगर हमनें प्रदूषण पर विराम नहीं लगाया तो प्रचंड गर्मी, बढ़ते तापमान और अनियंत्रित मौसमों से सामाना करना पड़ेगा. जलवायु परिवर्तन भविष्य की नहीं वर्तमान समस्या है.
यह पूरी धरती पर असर डालती है. कहीं कम, कहीं ज्यादा. अगर बर्फ खत्म हो जाएं और जंगल खाक हो जाएं तो आपके सामने पानी और हवा दोनों की दिक्कत होगी. ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी तो समुद्री जलस्तर बढ़ेगा. कई देश तो यूं ही डूब जाएंगे जो समुद्र के जलस्तर से कुछ ही इंच ऊपर हैं.
हर साल इंसान 4000 करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ता है. अगर इसे 2050 तक घटाकर 500 करोड़ टन तक नहीं किया तो यह धरती के टुकड़े होना तय है. वर्तमान गति से चलते रहे तो साल 2050 तक प्रदूषण, प्रचंड गर्मी, बाढ़ जैसी दिक्कतों का आना दोगुना ज्यादा हो जाएगा.