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लंबा जीना है तो फटाफट ठंडे इलाकों की तरफ चले जाइए, साइंस ने खोज निकाला सर्दी से लंबी जिंदगी का कनेक्शन

गर्म इलाकों में रहने वालों के लिए बुरी खबर है. गर्मी में सिर्फ गुस्सा ही नहीं आता, बल्कि उम्र भी कम हो जाती है. वहीं ठंडे इलाके के लोगों की उम्र लंबी रहती है. वैज्ञानिकों ने पाया कि कम तापमान पर कोशिकाओं से खराब हो चुके प्रोटीन हटने लगते हैं. नेचर जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में ठंड को उम्र बढ़ाने वाला कारक माना गया.

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कम टेंपरेचर में रहने के कई फायदे हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)
कम टेंपरेचर में रहने के कई फायदे हैं. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

तापमान का सेहत ही नहीं, सीधे-सीधे उम्र से संबंध दिख रहा है. कम टेंपरेचर में रहने वाली आबादी उम्र के साथ आने वाली कई बीमारियों जैसे अल्जाइमर्स और डिमेंशिया से कुछ हद तक बची रहती है, और उनकी औसत आयु भी गर्म इलाके की आबादी से ज्यादा रहती है. एवरेज लाइफ की तुलना करने पर ये फर्क साफ हो जाता है, लेकिन इसपर वैज्ञानिकों ने अध्ययन हाल में शुरू किया. जर्मन यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोजन के शोधकर्ताओं ने माना कि लंबी उम्र के मामले में कम तापमान निर्णायक साबित होता है.

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इसके लिए सिनोरहैब्डाइटिस एलिजेन नाम के कीड़े और मानवीय कोशिकाओं पर लैब में एक साथ प्रयोग शुरू हुआ. इस दौरान पाया गया कि औसतन 15 डिग्री सेल्सियस पर रहने से सेल्स से खराब हो चुका प्रोटीन हटने लगता है और उसकी जगह नया प्रोटीन ले लेता है. इसे प्रोटीसम एक्टिवेटर कहा गया. ऐसे एक एक्टिवेटर की पहचान PA28y/PSME3 के तौर पर हुई, जो एजिंग रोकने में मदद करता है. इसके लिए बहुत कम तापमान नहीं, बल्कि 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तक टेंपरेचर भी काफी रहता है. 

cold temperature slow down ageing  and increase longevity says study
लंबी उम्र के मामले में कम तापमान निर्णायक साबित होता है. सांकेतिक फोटो (Unsplash)

शोधकर्ताओं ने माना कि इस नतीजे की मदद से उम्र बढ़ाने के नए तरीकों पर काम हो सकेगा, साथ ही डिमेंशिया, पार्किंसन्स और अल्जाइमर्स जैसी बीमारियों से भी काफी हद तक छुटकारा मिल सकता है. ये सारी बीमारियां न्यूरोडिजेनरेटिव डिसीज हैं, जिसमें खराब प्रोटीन का हाथ होता है.

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उम्मीद जताई जा रही है कि तापमान भले ही कैसा भी हो, लेकिन इस प्रोसेस को कॉपी करके उम्र बढ़ाई जा सकेगी. वैसे अध्ययन में इसपर कोई बात नहीं हुई कि क्या आर्टिफिशियल टेंपरेचर से भी उम्र बढ़ सकती है. जैसे क्या एसी में रहने वालों की उम्र ज्यादा हो सकती है, या इसके लिए कुदरती मौसम ही चाहिए होता है. 

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लैब्स में अमरता पर भी काम चल रहा है. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

वैसे जाते हुए ये समझना भी जरूरी है कि आखिर हम बूढ़े क्यों होते हैं. इसपर वैज्ञानिकों के अलग-अलग तर्क हैं. कोई इसे न्यूरॉन्स के खत्म होने से जोड़ता है, तो कोई प्रोटीन से. एक बड़ा तर्क DNA से जुड़ा है. कोशिकाओं के DNA में मिलने वाले क्रोमोजोम के दोनों तरफ टेलिमियर नाम की सेफ्टी वॉल होती है. जैसे-जैसे कोशिकाएं संख्या में बढ़ती हैं, ये सुरक्षा परत बंटकर छोटी होती जाती है. इससे बुढ़ापे के लक्षण आने लगते हैं, जैसे बालों में सफेदी, त्वचा का बदलना या आंखों का कमजोर होना. एक वक्त ऐसा आता है, जब सुरक्षा परत एकदम कम हो जाती है, यानी मौत करीब आ चुकी. 

बुढ़ापे और मौत की कोई निश्चित वजह अब तक पता नहीं लग सकी. ये अवस्था कई कारणों का मिला-जुला नतीजा हो सकती है. इस बीच वैज्ञानिक उम्र बढ़ाते हुए अमर हो जाने का सीक्रेट भी खंगाल रहे हैं. हाल ही में कुछ एक्सपर्ट्स ने दावा किया कि साल 2030 में जीवित लोग साल-दर-साल अपनी उम्र बढ़ा सकेंगे, और 2045 के बाद अमरता भी संभव हो सकेगी. इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद भी ली जा रही है. कोशिश है कि बुढ़ापे को रोककर रिवर्ज एजिंग शुरू हो जाए, यानी उम्र पीछे की तरफ लौटकर थम जाए, हालांकि अब तक इसमें किसी बड़ी कामयाबी का दावा कहीं से नहीं आया.

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