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Delhi Earthquake: उत्तर भारत और दिल्ली के लिए कितना बड़ा खतरा है हिंदूकुश में आ रहे भूकंप

दिल्ली-NCR पर भूकंप का बड़ा खतरा हमेशा से बना है. बना भी रहेगा. इसके पीछे तीन प्रमुख वजहें हैं. दिल्ली से हिंदूकुश और हिमालय के बीच जो Red Line है, वो बेहद संवेदनशील है. दोनों ही जगहों पर अगर 7 या 8 तीव्रता का भूकंप आता है, तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भारी तबाही मच सकती है.

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 12 मई 2015 को नेपाल में 7.3 तीव्रता का भूकंप आया. दिल्ली की जमीन इतनी जोर से हिली को लोग दफ्तरों से बाहर निकल आए. कनॉट प्लेस की ये तस्वीर उसी दिन की है. (फोटोः गेटी)
12 मई 2015 को नेपाल में 7.3 तीव्रता का भूकंप आया. दिल्ली की जमीन इतनी जोर से हिली को लोग दफ्तरों से बाहर निकल आए. कनॉट प्लेस की ये तस्वीर उसी दिन की है. (फोटोः गेटी)

दिल्ली-NCR में भूकंप का बड़ा खतरा क्यों? क्यों हिंदूकुश और हिमालय में आने वाले भूकंपों से कांपने लगती है देश की राजधानी. दिल्ली को बड़े भूकंपों में नुकसान का खतरा इसलिए हैं क्योंकि... 

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पहली वजह... राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र हिमालयी टकराव जोन से मात्र 250 किलोमीटर दूर है.
दूसरी वजह... दिल्ली-NCR से तीन प्रमुख फॉल्ट लाइन्स गुजरती हैं. 
तीसरी वजह... दिल्ली-NCR का बड़ा इलाका भूकंप के चौथे जोन में हैं. 

अब इन वजहों को डिटेल में समझिए... 

इंडियन टेक्टोनिक प्लेट (Indian Tectonic Plate) जहां पर तिब्बत की प्लेट (Tibetan Plate) से टकराती है, उसे हिमालयन टकराव क्षेत्र (Himalayan Collission Zone) कहते हैं. ये जोन दिल्ली-NCR से मात्र 250 किलोमीटर दूर मौजूद है. यानी चीन की तरफ हर साल 15 से 20 मिलीमीटर बढ़ रही भारतीय प्लेट से जो ऊर्जा निकलती है, उससे भूकंप आता है. या फिर 1000 किलोमीटर दूर मौजूद हिंदूकुश में कोई भूकंप आता है, तब भी दिल्ली हिलने लगती है. राजधानी भौगोलिक तौर पर दो संवेदनशील स्थानों के बीच मौजूद है. 

Delhi Earthquake
इस नक्शे में दिखाया गया है कि कहां-कहां फॉल्ट, रिज, बाउंड्री हैं. दिल्ली में कब-कब बड़े भूकंप आए. (फोटोः Nature/Brijesh K. Bansal, Kapil Mohan, Mithila Verma and Anup K. Sutar)

दिल्ली-NCR की जमीन के नीचे असल में दो अलग-अलग तरह के मूवमेंट और टकराव वाले ब्लॉक्स मौजूद हैं. साधारण भाषा में कहें तो दिल्ली-एनसीआर की जमीन के नीचे प्लेटों के बीच मौजूद कमजोर इलाके हैं. इन्हें फॉल्ट (Fault) कहते हैं. जमीन के अंदर पश्चिम दिशा में रिवर्स फॉल्टिंग हो रही है. पूर्व में यह सामान्य स्थिति में है. सामान्य का मतलब ये नहीं कि वहां भूकंपीय हलचल नहीं होगी. लेकिन पश्चिम की तुलना में कम है. 

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इन ब्लॉक्स को उत्तरपूर्व-दक्षिणपश्चिम में दिल्ली हरिद्वार रिज/महेंद्रगढ़-देहरादून फॉल्ट (DHR-MDF) बांटता है. इसे दिल्ली सरगोदा रिज (DSR) पश्चिम में काट रही है. जिसकी वजह से थ्रर्स्ट फॉल्ट बन गया है. आसपास कुछ छोटी फॉल्ट लाइन्स भी हैं. ये सभी फॉल्ट लाइन और रिज अंदर से बेहद कमजोर हैं. इसलिए जब भी हिंदूकुश और हिमालय से भूकंप की लहरें चलती हैं तो दिल्ली बुरी तरह से कांपने लगती है. 

दिल्ली भूकंप के चौथे जोन में है. यानी सबसे खतरनाक पांचवें जोन से ठीक नीचे वाला जोन. दिल्ली का यह जोन इसलिए निर्धारित किया गया है, क्योंकि दिल्ली इंट्राप्लेट इलाके के ऊपर बसा है. इसलिए यह मॉडरेट और हाई रिस्क वाले भूकंपों के क्षेत्र में आता है. इंट्राप्लेट इलाका (Intraplate Region) यानी एक ही टेक्टोनिक प्लेट के अंदर अलग-अलग तरह से आने वाले भूकंपों का असर दिल्ली-NCR पर पड़ता है. इसलिए राजधानी की जमीन तेजी से हिलने लगती है. 

Delhi Earthquake
दिल्ली में कब-कब आए बड़े भूकंप. (फोटोः Nature/Brijesh K. Bansal, Kapil Mohan, Mithila Verma and Anup K. Sutar)

हिंदूकुश पर 5 तीव्रता का भूकंप, 10 मिनट में हिलने लगेगी दिल्ली

अगर हिंदूकुश या हिमालय पर 5 या उससे ज्यादा तीव्रता का भूकंप आता है, तो उसकी पहली लहर मात्र 5 से 10 मिनट में दिल्ली की धरती को हिला देगी. यह निर्भर करता है भूकंप की गहराई पर. अगर भूकंप की गहराई कम है, जैसे हाल-फिलहाल में नेपाल, तुर्की या पाकिस्तान में आए थे. तो झटका कम देर के लिए लेकिन जल्दी महसूस होगा. अगर गहराई ज्यादा है, जैसा 21 मार्च 2023 की रात अफगानिस्तान में आया, तो दिल्ली की जमीन ज्यादा देर तक कांपती रहेगी. ये जरूरी नहीं दिल्ली-NCR में भी रिक्टर पैमाने पर उसकी तीव्रता पांच ही रहे. वह कम होती चली जाती है.  

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पहले दिल्ली के जमीन के नीचे की स्थिति समझनी होगी

Nature जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक गंगा बेसिन करीब 2.50 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके में फैला है. यह भारतीय प्रायद्वीप के उत्तरी मैदानी किनारे और हिमालय के बीच में मौजूद है. इसकी शुरुआत पश्चिम में स्थित दिल्ली-हरिद्वार रिज से लेकर पूर्व में मौजूद मुंगेर-सहरसा रिज तक है. दिल्ली की जमीन अरावली-दिल्ली फोल्ड बेल्ट यानी 54.40 करोड़ से 250 करोड़ साल पहले बने पहाड़ी इलाके और गंगा बेसिन के पश्चिमी किनारे के नजदीक है. 

यमुना नदी के मैदानी इलाके में जमीन की परत नरम है. इस नरम परत की वजह से भी भूकंप की लहर ज्यादा पता चलती है. अगर परत ठोस होती तो लहर कम पता चलती. दूसरी बात ये है कि दिल्ली में जो फॉल्ट लाइन्स हैं, उनकी गहराई करीब 150 किलोमीटर है. उधर अफगानिस्तान में जो भूकंप आया उसकी गहराई 156 किलोमीटर थी. यानी अगर जमीन के अंदर से देखें तो दिल्ली की फॉल्ट लाइन लगभग उसी गहराई में जो अफगानिस्तान के भूकंप के केंद्र की गहराई के समानांतर है. यानी लहर ज्यादा देर तक पता चलती है.

India Earthquake
भारतीय टेक्टोनिक प्लेट लगातार तिब्बत की प्लेट यानी चीन की तरफ खिसक रही है. इस थ्रीडी नक्शे में आपको यह नजारा देख सकते हैं. कैसे भारतीय जमीन चीन की जमीन को धक्का दे रही है. उधर से भी फोर्स आ रहा है. (फोटोः गेटी)

पाताल से आने वाले चुंबकीय झटके भी हिलाते हैं दिल्ली को

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दिल्ली-NCR को हिलाने का काम सिर्फ टेक्टोनिक प्लेटों का उतार-चढ़ाव और टक्कर ही नहीं करता. बल्कि कई बार धरती के केंद्र से आने वाली चुंबकीय तरंगें करती है. असल में गंगा बेसिन के नीचे ट्रांस हिमालयन कंडक्टर (THC) है. यह एक कंडक्टिव स्ट्रक्चर है. जो गंगा बेसिन पर नीचे से चुंबकीय तरंगों का वार करती है. THC 45 किलोमीटर चौड़ी और जमीन के नीचे 15 किलोमीटर की गहराई में मौजूद है. यह इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड है. 

कुल कितने फॉल्ट है दिल्ली-NCR के आसपास

दिल्ली-NCR के आसपास महेंद्रगढ़-देहरादून फॉल्ट, दिल्ली-हरिद्वार रिज, मोरादाबाद फॉल्ट, सोहना फॉल्ट, मथुरा फॉल्ट और ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट हैं. जमीन के अंदर मौजूद यही कमजोर कड़ियां एकदूसरे को हिलाती रहती है. इनमें से एक भी फॉल्ट लाइन पर अगर भूकंप की लहर टकराती है, तो वो बाकी सभी को हिलाकर रख देती हैं. जिसकी वजह से दिल्ली-NCR की जमीन थरथराने लगती है. 

दिल्ली में किस तरह के भूकंप का असर होता है

दिल्ली-NCR की जमीन नीयर फील्ड अर्थक्वेक (Near Field Earthquake) और फार फील्ड अर्थक्वेक (Far-Field Earthquake) दोनों में हिल जाती है. नीयर फील्ड यानी जो दिल्ली के आसपास भूकंप आते हैं. जैसे 1720 में दिल्ली में ही आया 6.5 का भूकंप. 1956 में 6.7 तीव्रता का भूकंप, जिसका केंद्र बुलंदशहर था. या फिर 1960 में गुरुग्राम में आया 4.8 तीव्रता का भूकंप. फार फील्ड यानी दूर से आने वाली भूकंपीय लहरें, जैसे नेपाल, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, हिंदूकुश या फिर हिमालय. 

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Delhi Earthquake
IIT Kanpur के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया ये नक्शा बता रहा है कि कैसे हमारी प्लेट खिसक रही है. 

कैसे पता चलता है दिल्ली को कि भूकंप आया है

जमीन हिलने से तो दिल्ली-NCR को यह पता चल जाता है कि भूकंप कैसे आया. लेकिन दिल्ली-NCR में और आसपास 25 सिस्मिक टेलिमेट्री नेटवर्क बनाया गया है. नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी (NCS) को इस नेटवर्क से सीधे रीयल टाइम डेटा मिलता है. 

हिमालय में 7 तीव्रता का भूकंप आए तो दिल्ली का क्या होगा?

आमतौर पर 7 तीव्रता का भूकंप दो तरह का नुकसान करता है. पहला होता है एपिसेंट्रल डैमेज यानी जहां भूकंप का केंद्र है उसके 50 से 70 किलोमीटर की रेंज में. ये भूकंप की मुख्य लहर की वजह से होता है. यहां मुख्य लहर तेजी से चारों तरफ फैलना शुरू करती है. इसे सरफेस वेव कहते हैं. ये 200 से 400 किलोमीटर तक चली जाती हैं. कई बार दूरी बढ़ भी जाती है. अगर हिंदूकुश में इतनी तीव्रता का भूकंप आता है, तो दिल्ली में तबाही तय है. क्योंकि सरफेस वेव दो-तीन मंजिले की इमारतों को तो नहीं गिराती. अगर वो कमजोर न हो तो. सरफेस वेव से 15 मीटर से ऊंची इमारतों को नुकसान पहुंचता है. 

DTE में छपी रिपोर्ट में इसका उदाहरण भी है. 26 जनवरी 2001 को गुजरात के भुज में 8.1 तीव्रता का भूकंप आया था. लेकिन उसका असर 310 किलोमीटर दूर अहमदाबाद की ऊंची इमारतों पर भी देखने को मिला था. काफी नुकसान हुआ था. दिल्ली तो हिमालय के टकराव क्षेत्र से 280 से 350 किलोमीटर की दूरी पर ही है. यानी हिमालय या हिंदूकुश पर 7 या 8 तीव्रता का भूकंप आता है तो दिल्ली-NCR इलाके में भारी तबाही होने की आशंका है. 

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Tectonic Plates
जमीन के नीचे जब प्लेट हिलती है तो ऊपर की परत इस तरह से घाटियों और पहाड़ों में बदल जाती है. (फोटोः गेटी)

हिमालय में आ चुके हैं 8 तीव्रता के भूकंप

12 जून 1897 में असम में, 4 अप्रैल 1905 में कांगड़ा में, 14 जनवरी 1934 को बिहार-नेपाल भूकंप और 15 अगस्त 1950 में असम में भूकंप. यानी दिल्ली के आसपास हिमाचल, उत्तराखंड या पाकिस्तान के किसी इलाके में तीव्र भूकंप आता है तो दिल्ली-NCR की ऊंची इमारतें ताश के पत्तों की तरह गिर जाएंगी. 

क्यों आता है भूकंप? 

टेक्टोनिक प्लेटों के हिलने, टकराने, चढ़ाव, ढलाव से लगातार प्लेटों के बीच तनाव बनता है. ऊर्जा बनती है. अगर हल्के-फुल्के भूकंप आते रहते हैं, तो ये ऊर्जा रिलीज होती रहती है. ऐसे में बीच-बीच में बड़े भूकंपों के आने की आशंका रहती है. अगर ऊर्जा का दबाव ज्यादा हो जाता है और यह एकसाथ तेजी से निकलने का प्रयास करता है, तो भयानक भूकंप सकते हैं. 

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